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वैदिक संपत्ति

वैदिक संपत्ति 340 वैदिक आर्यों की सभ्यता, जड़ सृष्टि से उत्पति

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे…

जाति, आयु और भोग

योगशास्त्र में लिखा है कि ‘सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भाग.’ अर्थात् पूर्वकर्मानुसार प्राणियों को जाति, बायु और भोग मिलते हैं। प्रत्येक प्राणी किसी न किसी जाति का होता है। जाति की पहिचान बतलाते हुए न्यायशास्त्र में गौतम मुनि कहते हैं कि ‘समानगसवात्मिका जातिः’ अर्थात् जिसका समान प्रसव हो वह जाति है। समान प्रसव वह कहलाता है कि जिसके संयोग से वंश चलता हो। गाय और बैल के संयोग से वंश चलता है इसलिए वे दोनों एक जाति के हैं, परन्तु घोड़ी और कुत्ते से वंश नहीं चलता, इसलिए ये दोनों एक जाति के नहीं हैं। इस जाति की दूसरी पहिचान आयु है। जिन जिन प्राणियों का समान प्रसव है, उनकी आयु भी समान ही होती है। जितने दिन प्रायः गाय जीती है, उतने ही दिन प्रायः बैल भी जीता है, पर जितने दिन घोड़ी जीती है, उतने ही दिन कुत्ता नहीं जीता ।

जाति की तीसरी पहिचान भोग है। जिनका समान प्रसव और समान आयु है, उनके भोग भी समान ही होते हैं। गाय और बैल का समान प्रसव और समान आयु है, इसलिए दोनों के भोग भी आहारविहार भी समान ही हैं। परन्तु घोड़ी और कुत्ते का जहाँ समान प्रसव और समान आयु नहीं है, वहाँ भोग भी समान नहीं है। घोड़ी घास खाती है और कुत्ता घास नहीं खाता, किन्तु मांस खाता है। तात्पर्य यह कि प्रत्येक जाति का प्रसव, आयु और भोजन एक समान ही होता है और इन्हीं तीनों गुणों से प्रत्येक योनि पहिचानी जाती है। इसलिए मनुष्यों को उचित है कि वे जिस प्राणी से काम लेना चाहें, उसकी जाति के अनुसार उपके भोगों को देते हुए उस की पूर्ण आयु तक जीने का मौका दें।

जिस प्रकार किसी सजा पाये हुए कैदी के लिए तीन बातें नियत होती हैं, उसी प्रकार प्राणियों को जाति, आयु और भोग दिये गये हैं। कैदी के लिए लिखा होता है कि यह अमुक श्रेणी की जेल में जाय, अमुक आहारविहार के साथ अमुक काम करे और अमुक समय तक वहाँ रहे। यहाँ कैदी की श्रेणी ही प्राणियों की जाति है, कैदी का काम और आहारविहार ही प्राणियों के भोग हैं और कैदी की मियाद ही प्राणियों की आयु है। जिस प्रकार कैदी को उसके भोग देकर ही उतने दिन तक अमुक जेल में रक्सा जा सकता है, उसी प्रकार इन समस्त प्राणियों को भी उनके भोग देकर ही उनसे उनकी आयु भर काम लिया जा सकता है। यदि जेल दरोगा कैदी के भोग और स्वास्थ्य अर्थात् आयु में विघ्न डाले, तो वह अपराधी समझा जाता है। क्योंकि राजा का यहअभिप्राय नहीं है कि कैदी मार डाला जाये। इसी प्रकार वे मनुष्य जो प्राणियों को दुःख देते हैं, परमात्मा के न्याय के विरुद्ध करते हैं, अतएव पापी हैं। जैसे अन्य प्राणियों के भोग और आयु में बाधा पहुँचाना पाप है, वैसे ही मनुष्यों की समानता में भी बाधा पहुंचाना पाप है।


• कुछ लोग जाति का अर्थ ब्राह्मण, क्षत्री आदि, आयु का अर्थ फलित ज्योतिष के अनुसार वर्ष, मास, दिन आदि और भोगका अर्थ सुखदुःख अर्थात् प्रारब्ध आदि करते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं है। क्योंकि यहाँ समान प्रसव से स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्राह्मण, और क्षत्राणी का समान प्रसव होता है, इसलिए दोनों एक ही जाति के हैं, अलग नहीं। इसी तरह आयु और भोग भी भिन्न योनियों से ही सम्बन्ध रखते हैं, घड़ी पल अथवा प्रारब्ध आदि से नहीं ।


जिस प्रकार एक समान प्रसव जाति समान आयु को प्राप्त करके समान भोगों को भोगती है, उसी प्रकार हम मनुष्यों को भी समझना चाहिये कि समस्त मनुष्य भी समान प्रसव और समान आयुवाले हैं, इसलिए उन के भी भोग समान ही होना चाहिये ।

जो कायदा समान प्रसव, समान आयु और समान भोगवाले मनुष्यों और प्राणियों के अपराध और दण्डों तथा जेलों और सजाद्यों का है, वही कायदा ऋणी और धनी के लेन देन का है। मनुष्य जब किसी का ऋणी होता है, तो महाजन भी उसको अपने घर में रखकर और उससे काम कराकर ही अपना रुपया वसूल करता है और ऋणी को जिन जिन पदार्थों की आवश्यकता होती है, वे पदार्थ महाजन ही देता है। क्योंकि वह जानता है कि विना रुपया दिये यदि वह भूत से मर जायगा या अन्य दुःखों से घबराकर कहीं चला जायगा, तो मेरा रुपया डूब जायगा । इसलिए यदि मनुष्यों को मनुष्यों, पशुचों और वृक्षों से लेना है, तो उन्हें हर प्रकार से सुखी रखना चाहिये। सुखी रखने का कायदा सृष्टि ने बतला दिया है कि प्रत्येक प्राणी की जाति, आयु और भोग नियत हैं, अतः तुम उसके भोगों को देते हुए और उसकी पूर्ण आयु तक रक्षा करते हुए अपना ऋण लेते चले जाओ और ऐसा प्रबश्व करो कि कभी किसी प्राणी की अकाल मृत्यु न हो।
क्रमशः

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