ओ३म् “मनुष्य धर्मानुसार तथा सत्य असत्य को विचार कर ही आचरण करें”

IMG-20240730-WA0024

============
परमात्मा ने मनुष्य को सबसे मूल्यवान् वस्तु उसके शरीर में बुद्धि के रूप में दी है। बुद्धि से हम ज्ञान को प्राप्त कर उसके अनुसार आचरण करते है। जिस मनुष्य की बुद्धि जितनी विकसित व शुद्ध होती है, वह उतना ही अधिक ज्ञानी कहा जाता है। सत्य ज्ञान के अनुरूप आचरण करना ही मनुष्य का धर्म वा कर्तव्य होता है। इसके विपरीत आचरण असत्य, पाप व अधर्मयुक्त आचरण कहलाता है। इस संसार में परमात्मा एक न्यायाधीश के रूप में सर्वत्र सर्वव्यापक सत्ता के स्वरूप में विद्यमान है। वह सर्वान्तर्यामी भी है। वह सब मनुष्यों सहित प्राणीमात्र के कर्मों को देखता व यथावत् रूप में जानता है। हमारे मन में जो विचार उत्पन्न होते हैं, उन्हें भी वह जानता है। उसका न्याय सत्य पर आधारित है। सत्य का आचरण करने वालों को वह अनेक प्रकार से प्रोत्साहित व पुरस्कृत करता है और असत्य व पाप का आचरण करने वालों को वह पाप कर्मों को छोड़ने की प्रेरणा करने के साथ किये गये पाप कर्मों का यथोचित दण्ड देता है। परमात्मा का न्याय ऐसा है जहां किये हुए पाप कर्मों को क्षमा नहीं किया जाता। कई मतों की मान्यता है कि ईश्वर उनके मतों के अनुयायियों के पापों को क्षमा करता है। यह मान्यता वेदज्ञान व तर्कों के विरुद्ध है। इसका कारण अज्ञानता व अपने मत के अनुयायियों की संख्या वृद्धि किया जाना प्रतीत होती है। इससे तो पता चलता है कि उन मतों को ईश्वर के सत्य व यथार्थ गुण, कर्म तथा स्वभाव का ज्ञान ही नहीं है। यह नियम है कि बिना सदाचारी व ज्ञानी गुरु के किसी को ज्ञान नहीं हो सकता। ज्ञान की एक कसौटी हमारे विचार व मान्यताओं का वेदानुकूल होना भी है। जो मनुष्य वेदों व उनकी सत्य शिक्षाओं को नहीं जानते, वेदों व वैदिक सत्साहित्य का अध्ययन नहीं करते, वह लोग सत्य ज्ञान को प्राप्त नहीं हो सकते। वेद व वैदिक साहित्य सहित मत-मतान्तरों के ग्रन्थों का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर, आत्मा और सृष्टि के विषय में जो सत्य ज्ञान वैदिक साहित्य में उपलब्ध होता है, वह किसी मत-मतान्तर के ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं होता। महर्षि दयानन्द ईश्वर, आत्मा और सृष्टि के अधिकांश रहस्यों को इसी कारण से जान सके क्योंकि वह वेदों के मर्मज्ञ होने सहित समस्त वेदांगों, उपांगो एवं इतर वैदिक ज्ञान से सुपरिचित थे। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश में सभी मतों की समीक्षा की है और बताया है कि सभी मतों में जो सत्य बातें हैं वह वेदों से ही वहां गई हैं और जो अविद्यायुक्त बातें हैं वह उनकी अपनी-अपनी हैं। यह तथ्य है कि वेद से अनभिज्ञ कोई व्यक्ति, मत, आचार्य एवं आध्यात्मिक व सांसारिक गुरु उस सत्य ज्ञान को प्राप्त नहीं हो सकता जो एक वेदाध्ययन करने वाले को होता है।

ऋषि दयानन्द ऋषि, योगी एवं वेदों के मर्मज्ञ थे। उन्होंने परीक्षा कर वेदों को ईश्वरीय ज्ञान पाया व इसे सत्य की कसौटी पर कस कर अपने अमर ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश” में प्रस्तुत भी किया है। उन्होंने वेदों का मंथन कर आर्यसमाज के दस प्रमुख नियमों को बनाया है जिसमें पांचवा नियम है ‘सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें।’ धर्म और सत्य परस्पर समानार्थी एवं एक दूसरे के पर्याय हैं। धर्म वही है जिसमें सत्य निहित हो। सत्य न हो तो कोई भी कृत्य धर्म व धर्मसम्मत नहीं होता। धर्म कर्तव्य को भी कहते हैं। मनुष्य को धर्मानुसार सभी कार्य इस लिये करने हैं क्योंकि ऐसा करने पर वह ईश्वर से पुरस्कृत व प्रोत्साहित होता है। उसे धर्मानुसार आचरण करने पर परमात्मा सुख व उन्नति प्रदान करते हैं। जो मनुष्य असत्य व अधर्म का सेवन तथा आचरण करता है उसे सर्वशक्तिमान एवं सर्वज्ञ ईश्वर की व्यवस्था से दुःख व दण्ड प्राप्त होते हैं। इसी कारण से हमारे देश के ज्ञानी व विवेकी लोग सृष्टि के आरम्भ काल से ही देशवासियों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा करते रहे हैं। वेदों में सत्य के आचरण की ही प्रेरणा है तथा असत्य का त्याग करने का भी विधान है। यही सब मनुष्यों के लिए अभीष्ट है। धर्म व अधर्म अथवा सत्य व असत्य को जानने के लिये मनुष्य को वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन करने सहित वैदिक विद्वानों की संगति करना व उनसे सत्योपदेश ग्रहण करना आवश्यक है। यह समझना भी आवश्यक है कि सब मनुष्य ईश्वर से उपकृत हैं। इन उपकारों के लिये उन्हें ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होने सहित उसके गुण, कर्म व स्वभाव को जानकर तदनुरूप उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करना भी आवश्यक है। ईश्वर की उपासना में सन्ध्या, धारणा, ध्यान, समाधि, ईश्वर का भजन, कीर्तन, चिन्तन तथा सदाचरण करना सम्मिलित है। ऐसा करने से मनुष्य की शारीरिक एवं आत्मिक उन्नति सहित सामाजिक उन्नति होती है। यही ऐसा मार्ग है जो मनुष्य व उसकी आत्मा को सभी संकटों व दुःखों से बचाकर आत्मा के अन्तिम लक्ष्य ‘‘मोक्ष” पर पहुंचाता है। हमारे प्राचीन सभी ऋषि, मुनि, यति, साधु, संन्यासी, साधक, उपासक तथा विद्वान इसी मार्ग पर चलते थे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर कृष्ण तथा ऋषि दयानन्द सहित आचार्य चाणक्य, स्वामी श्रद्धानन्द आदि विश्व प्रसिद्ध महान पुरुष भी इसी मार्ग पर चले थे। इन महापुरुषों का जीवन सभी मनुष्यों के लिये आदर्श एवं अनुकरणीय है। जिन मनुष्यों ने इन महापुरुषों के जीवन को पढ़ा व जाना है तथा उसके अनुसार अपने आचरण में सुधार किया है, उनका निश्चय ही कल्याण हुआ है व आगे भी होगा।

महर्षि मनु ने कहा है कि धर्म का मूल वेद है। यह बात सर्वथा सत्य है। जो मनुष्य वेद से दूर होगा वह धर्म को यथार्थ रूप में नहीं जान सकता। वेदाध्ययन कर मनुष्य सच्चा धार्मिक मनुष्य बनता है। वेद ज्ञान प्राप्ति तथा पुरुषार्थी बनने की प्रेरणा करते हैं। धर्म का विज्ञान से किसी प्रकार का विरोध नहीं है। यह दोनों परस्पर पूरक हैं। जो बातें विज्ञान के विरुद्ध हैं वह धर्मानुकूल नहीं हो सकती। धर्म की कोई भी मान्यता ज्ञान, विज्ञान, युक्ति व तर्क के विरुद्ध नहीं होती। यही कारण था कि ऋषि दयानन्द ने धर्म को सत्य पर आधारित बताने के साथ उसकी सभी मान्यताओं की सत्य, तर्क व युक्ति आदि से परीक्षा कर स्वीकार किया। उन्होंने जिन विषयों व मान्यताओं का खण्डन किया उसका कारण उनका वेद विरुद्ध होना, वेदसम्मत न होना, तथा उनका तर्क व प्रमाणों से सिद्ध न होना था। इसी दृष्टि से उन्होंने आर्यसमाज के चैथे नियम में प्रावधान किया कि मनुष्य को सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। ऐसा करके ही मनुष्य सच्चा धार्मिक बनाता है तथा लोक परलोक के अपने जीवन में सफलता प्राप्त करता है। यह बात ईश्वर व हमारे वेद मर्मज्ञ ऋषियों ने अपने ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की है।

धर्म का निर्णय करना हो तो हमें धार्मिक विद्वानों के आचरण के अनुसार अपना आचरण निश्चित करना चाहिये। यदि कभी अनिर्णय की स्थिति हो तो अपनी आत्मा को जो उचित लगे तथा जिससे किसी दूसरे के उचित हितों की हानि न हो, उस कार्य को करने का निर्णय लिया जा सकता है। इस संबंध में ऋषि दयानन्द ने एक नियम यह बनाया है ‘सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें।’ इसका अर्थ यह है कि जिस कार्य से दूसरों के भी हित जुड़े हों, उस विषयक सामाजिक व सर्वहितकारी नियमों का पालन करने में मनुष्य को परतन्त्र अर्थात् नियमों के अधीन रहना चाहिये। जहां जो नियम व कार्य सबके हित का हो, जिससे किसी का अहित न होता हो, उस नियम व कार्य को करने में सब स्वतन्त्र होते हैं। हमने इस लेख में आर्यसमाज के चैथे, पांचवें तथा दसवें नियम का उल्लेख किया है। आर्यसमाज के दस नियम ऐसे हैं जो हमारे जीवन पथ का मार्गदर्शन करने में प्रकाश स्तम्भ की भांति कार्य करते हैं। हमें इन नियमों को जानना चाहिये। इनका यदाकदा पाठ कर विचार करते रहना चाहिये कि क्या हम इनका भली प्रकार से पालन कर रहे हैं? यदि कर रहे हैं तो हमारा आचरण धर्मानुसार व सत्य के अनुकूल होने से हमें निश्चिन्त होकर उस पथ पर आगे बढ़ना चाहिये। इसके साथ ही हमें सत्यार्थप्रकाश, वेद एवं वैदिक साहित्य का भी यथासुविधा स्वाध्याय व अध्ययन करते रहने चाहिये। इसी में जीवन की सफलता का रहस्य छिपा है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
pokerklas
pokerklas
vdcasino
pokerklas
pokerklas
betnano giriş
betasus giriş
pokerklas
pokerklas giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
hititbet
vdcasino giriş
pokerklas giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpas giriş
betpas giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
norabahis giriş
norabahis
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino
vdcasino
meybet
meybet
harbiwin giriş
betnano giriş
norabahis
favorisen giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
meybet
norabahis giriş
norabahis giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
maritbet giriş
maritbet
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet
hititbet
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino
vdcasino
betnano giriş
betoffice giriş
betoffice giriş
hititbet
hititbet
betpark giriş
betpark
betpark
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
hititbet giriş
kavbet giriş
kavbet
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino
vdcasino
timebet giriş
meybet giriş
timebet giriş
meybet giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
kavbet giriş
kavbet giriş
betpark giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis
betnano giriş
betnano giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis giriş
bettilt
norabahis giriş
bettilt
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
grandpashabet giriş
ganobet giriş
ganobet giriş
bettilt giriş
hitbet giriş
betoffice giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
betoffice giriş
betcio giriş
betcio giriş
meritbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş