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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति भाग -339 *अध्ययन और विचार*

 

यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक से सभी सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन उगता भारत

गतांक से आगे…

हम कुदरत में देखते हैं कि बहुत ही छोटी सी गलती की सजा बहुत ही अधिक मिलती है, यद्यपि गलती को छोटा नहीं कहा जा सकता । रास्ता चलते समय जरा सा चूक हो जाने पर मनुष्य गिर जाता है और अपने हाथ पैर तोड़ बैठता है। इसी तरह एक वेश्यागामी जरा सा चूकने पर ऐसी ऐसी व्याधियों में पड़ जाता है कि जिनसे उसका सारा जीवन ही नष्ट हो जाता है। थोड़े पाप में बढ़ी सजा के इस नियमानुसार मनुष्य जब पाप करके नीच योनियों में जाता है, तो उसे एक-एक योनि में कई-कई बार जन्म लेना पड़ता है और समस्त योनियों का चक्कर लगा करके ही मनुष्य योनि में आने का मौका मिलता है। इस बीच में यदि किसी दुष्ट द्वारा अकाल ही में फिर मारा जाता है, तो उस अत्याचारी मनुष्य से बदला लेने के लिये आप तत्काल के ईश्वरी नियमानुसार किसी हिंस्र योनि में जन्म लेकर अपने कर्मों को भी भोगता है और उस दुष्ट का भी संहार करता है। इसके अतिरिक्त जब सारा मनुष्यसमाज अत्याचारी हो जाता है और बे हिसाब प्राणियों का नाश कर देता है, तो नवीन उत्पन्न होनेवालों के लिए मातापिता ही का अभाव हो जाता है।

फल यह होता है कि पैदा होनेवाले बचे हुए थोड़े से ही माता पिताओं के द्वारा बहुत बड़ी संख्या में जन्मग्रहण करते हैं और आहारन्यूनता से अकाल में मरते हैं और फिर उन्हीं योनियों में उत्पन्न होते हैं। कहने का मतलब यह कि मनुष्ययोनि से हटने पर प्राणी बड़े चक्कर में पड़ जाता है और वहाँ से लौटना कठिन हो जाता है। इधर मनुष्य बात-बात में गलती करता है और छोटी गलती में बड़ी सजा के नियमानुसार कर्मफल भोगने के लिये दूसरी योनियों में जल्दी-जल्दी जाता है और वहाँ देर तक रहता है। परिणाम यह होता है कि आमद कम और खर्च अधिक होने के कारण पशुसमुदाय की वृद्धि और मनुष्यसमुदाय की न्यूनता बनी रहती है। इस बात को एक दृष्टान्त से समझना चाहिये। कल्पना कीजिये कि आपने कुछ कपड़े धोबी को घोने के लिये दिये, पर यह जल्दी से धोकर न लाया और आपको दूसरे कपड़े फिर देने पड़े। किन्तु फिर भी घुलकर जल्दी से न आये और फिर देने पड़े। इस तरह दो चार बार ही में घर के सब कपड़े धोबी के यहाँ जमा हो गये। अब कुछ दिन में वह चार छै कपड़े लाया, पर तब तक आपने और भी दस कपड़े मैले कर डाले और धोबी को दे दिये। फल यह हुआ कि आपके घर से धोबी के घर में कपड़े अधिक हो गये। जो हाल इस उदाहरण का है, वही मनुष्ययोनि की कमी और अन्य योनियों की अधिकता का है। यह सिलसिला अनादिकाल से चला आता है और अनन्त काल पर्यन्त चला जायगा। इसलिए उपयुक्त शंका कर्मयोनि और भोगयोनि के सिद्धान्त को असिद्ध नहीं कर सकती और न इस बात को हटा सकती है कि कर्मयोनि मनुष्य ही इन भोगयोनियों में जाता है। आर्यों ने अपने अध्ययन, अध्यापन और श्रवण-मनन के द्वारा अपनी सभ्यता के मूलाबार मोक्ष के प्रशस्त मार्ग का इस प्रकार निश्चय किया है। उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया है कि अज्ञान और अभिमान से जो काम किये जाते हैं, उनसे प्राणियों को दुःख होता है और उस दुःख का प्रतिफल देने के लिए नाना प्रकार की योनियों में जन्म धारण करना पड़ता है, इसलिए किसी भी प्राणी को चाहे वह मनुष्य, पशुपक्षी, कीटपतङ्ग, तृणपल्लव आदि कोई हो कभी भी कष्ट न देना चाहिये। परन्तु लोग कहते हैं कि जब यह सिद्ध हो चुका कि समस्त पशुपक्षी, कीटपतङ्ख और तृणपल्लव, पूर्वजन्म के अपराधी है- मनुष्य के ऋणी हैं- तब फिर इनके सुखदुःख और हानि लाभ की बात सोचना ही बेकार है। हम जिस तरह चाहें, उनका उपयोग कर सकते हैं और अपना ऋण ब्याज के सहित वसूल कर सकते हैं। इस वसूली में यदि उनका वध भी करना पड़े तो कोई पाप की बात नहीं है।

सुनने में ये बातें किसी अंश में ठीक प्रतीत होती हैं, पर विचार करने से ज्ञात होता है कि इस प्रकार का आरोप करनेवालों ने न तो अपराध और दण्डविधान ही पर ध्यान दिया है और न ऋण भौर ऋणदाता पर ही। अपराव और दण्डविधान वादी और प्रतिवादि के अधीन नहीं, प्रत्युत वे न्यायाधीश के प्राचीन है। प्रत्येक अपराधी अपने वादी का अपराधी नहीं है, प्रत्युत वह उस विधान का अपराधी है जो न्यायाधीश की ओर से स्थिर किया गया है। इसलिए किसी वादी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने प्रतिवादी को अपनी मर्जी से कुछ भी कष्ट दे। यह अधिकार न्यायाधीश ही को है कि वह जो कुछ दण्ड- जुर्माना करे, उसमें से अमुक भाग वादी को भी दिला दे, पर वादी अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं ले सकता। इसी तरह ऋणदाता भी ऋणी से तकाजा ही कर सकता है, उसे दण्ड नहीं दे सकता और न उसको मारकर उसके चमड़े से अपना रुपया ही वसूल कर सकता है। ऐसी दशा में कोई भी मनुष्य किसी भी पशु आदि प्राणी को न तो कष्ट ही दे सकता है और न उसका वध ही कर सकता है। इसलिए मनुष्य को चाहिये कि वह बिना किसी प्राणी को कुछ भी कष्ट दिये, जो कुछ काम लेते बने वह ले ले। काम लेने का सबसे उत्तम नियम इस सृष्टि के नियामक ने खुद ही बना दिया है। उसने प्रत्येक प्राणी की जाति, आयु और भोगों को नियत करके बतला दिया है कि जिस प्राणी से तुम काम लेना चाहो, उसकी जाति के अनुसार उसको पूर्ण आयु जीने दो और उसकी जाति के अनुसार उसका जो कुछ भोग नियत हो वह भोगने के लिए रुकावट पैदा न करो, किन्तु उसके भोगों को जुटाने का बन्दोबस्त करो ।
आलोक – अगले अंक में जाति आयु और भोग के विषय में बताएंगे।
क्रमशः

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