भारत के शौर्य पुत्रों की शौर्य गाथा का प्रतीक कारगिल दिवस

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प्रो. मनोज कुमार

युद्ध किसी समस्या का हल नहीं होता है लेकिन जब बात देश की अस्मिता, सुरक्षा और सम्प्रभुता पर आए जाए तो एकमात्र विकल्प युद्ध शेषरह जाता है। 25 वर्ष पहले भारत के चिर-परिचित दुश्मन पाकिस्तान ने दोनों देशों को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया। दो माह की लम्बी लड़ाई के बाद भारत युद्ध फतह करने में कामयाब रहा. भारतीय नौजवानों ने अपने खून से भारत माता के माथे पर शौर्य का टीका लगाकर उसके मान में श्रीवृद्धि की। इस कारगिल युद्ध, जिसे ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है। 26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। इस दिन को हर वर्ष विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। करीब दो महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जाँबाजी का ऐसा उदाहरण है जिस पर हर भारतीय देशवासी को गर्व होना चाहिए। करीब 18 हजार फीट की ऊँचाई पर कारगिल में लड़ी गई इस जंग में देश ने लगभग 527 से ज्यादा वीर योद्धाओं को खोया था वहीं 1300 से ज्यादा घायल हुए थे। युद्ध में 2700 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और 750 पाकिस्तानी सैनिक जंग छोड़ के भाग गए।

भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है। पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पार करके भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने दावा किया कि लडऩे वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी। लगभग 30,000 भारतीय सैनिक और करीब 5000 घुसपैठिए इस युद्ध में शामिल थे। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर हमला किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से पाकिस्तान को सीमा पार वापिस जाने को मजबूर किया। यह युद्ध ऊँचाई वाले इलाके पर हुआ और दोनों देशों की सेनाओं को लडऩे में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। परमाणु बम बनाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ यह पहला सशस्त्र संघर्ष था।

पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने रुशष्ट करके भारत की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की थी। हालांकि इंडियन आर्मी के बहादुर जवानों ने न सिर्फ पाकिस्तान को इस लड़ाई में धूल चटाई, बल्कि शौर्य की एक ऐसी मिसाल पेश की जो इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बना गई। इस युद्ध की शुरुआत 3 मई 1999 को ही हो गई थी जब पाकिस्तान ने कारगिल की ऊंची पहाडिय़ों पर 5 हजार से भी ज्यादा सैनिकों के साथ घुसपैठ कर कब्जा जमा लिया था। भारत सरकार को जब घुसपैठ की जानकारी मिली तब पाकिस्तानी सैनिकों को खदेडऩे के लिए ऑपरेशन विजय चलाया गया। पाकिस्तान ने दावा किया था कि इस लड़ाई में लडऩे वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेजों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी।

8 मई 1999 को पाकिस्तान की 6 नॉर्दर्न लाइट इंफैंट्री के कैप्टन इफ्तेखार और लांस हवलदार अब्दुल हकीम 12 सैनिकों के साथ कारगिल की आजम चौकी पर कब्जा जमाए बैठे हुए थे। उन्होंने देखा कि कुछ भारतीय चरवाहे कुछ दूरी पर अपने मवेशियों को चरा रहे थे। पाकिस्तानी सैनिकों ने आपस में इन चरवाहों को बंदी बनाने को लेकर चर्चा की, लेकिन जब उन्हें लगा कि ऐसा करने की सूरत में चरवाहे उनका राशन खा जाएंगे, तो उन्होंने उन्हें वहां से जाने दिया। कुछ देरा बाद ये चरवाहे भारतीय सेना के 6-7 जवानों के साथ वहां वापस लौटे, और पाकिस्तान के नापाक इरादों की पोल खुल गई।

पाकिस्तान का मकसद यही था कि भारत की सुदूर उत्तर की टिप पर सियाचिन ग्लेशियर की लाइफ लाइन को किसी तरह काट कर उस पर नियंत्रण किया जाए। पाकिस्तानी सैनिक उन पहाडिय़ों पर आना चाहते थे जहां से वे लद्दाख की ओर जाने वाली रसद के जाने वाले काफिलों की आवाजाही को रोक दें और भारत को मजबूर हो कर सियाचिन छोडऩा पड़े। दरअसल, मुशर्रफ को यह बात बहुत बुरी लगी थी कि भारत ने 1984 में सियाचिन पर कब्जा कर लिया था। उस समय वह पाकिस्तान की कमांडो फोर्स में मेजर हुआ करते थे। उन्होंने कई बार उस जगह को खाली करवाने की कोशिश की थी लेकिन कामयाब नहीं हो पाए।

कारगिल की लड़ाई शुरू में भारत के लिए काफी मुश्किल साबित हो रही थी, लेकिन बोफोर्स और एयर फोर्स की एंट्री ने पूरी तस्वीर ही बदल दी। बोफोर्स तोपों के हमले तो इतने भयानक और सटीक थे कि उन्होंने पाकिस्तानी चौकियों को पूरी तरह तबाह कर दिया था। पाकिस्तानी सैनिक बिना किसी रसद के लड़ रहे थे और भारतीय सैनिकों की दिलेरी के आगे उनकी एक नहीं चल पा रही थी। वहीं, कारगिल में वायु सेना की सबसे बड़ी भूमिका मनोवैज्ञानिक थी क्योंकि पाकिस्तानी सैनिकों को जैसे ही ऊपर से भारतीय जेटों की आवाज सुनाई पड़ती, वे बुरी तरह घबरा जाता थे और इधर उधर भागने लगते थे।

पाकिस्तान ने इस युद्ध की शुरूआत 3 मई 1999 को ही कर दी थी जब उसने कारगिल की ऊँची पहाडिय़ों पर 5,000 सैनिकों के साथ घुसपैठ कर कब्जा जमा लिया था। इस बात की जानकारी जब भारत सरकार को मिली तो सेना ने पाक सैनिकों को खदेडऩे के लिए ऑपरेशन विजय चलाया। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 का भी इस्तेमाल किया। इसके बाद जहाँ भी पाकिस्तान ने कब्जा किया था वहाँ बम गिराए गए। इसके अलावा मिग-29 की सहायता से पाकिस्तान के कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलों से हमला किया गया। इस युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बमों का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान करीब दो लाख पचास हजार गोले दागे गए। वहीं 5,000 बम फायर करने के लिए 300 से ज्यादा मोर्टार, तोपों और रॉकेटों का इस्तेमाल किया गया। युद्ध के 17 दिनों में हर रोज प्रति मिनट में एक राउंड फायर किया गया। बतायाक ऐसा युद्ध था जिसमें दुश्मन देश की सेना पर इतनी बड़ी संख्या में बमबारी की गई थी।

भारत ने बहुत कुछ खोया, पर पाकिस्तान बर्बाद हो गया

कारगिल की लड़ाई में भारत ने जहां बहुत कुछ खोया, वहीं पाकिस्तान पूरी तरह बर्बाद होकर रह गया। इस जंग में जहां भारत के 527 सैनिक शहीद हुए थे, वहीं पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के मुताबिक उनके 2700 से 4000 सैनिक मारे गए थे। जंग के बाद पाकिस्तान में राजनैतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ गई और नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर परवेज मुशर्रफ सत्ता पर काबिज हो गए। वहीं, भारत में जंग ने देशप्रेम को उफान पर ला दिया और अर्थव्यवस्था को भी काफी मजबूती मिली।

इंडियन आर्मी के बहादुर जवानों ने न सिर्फ पाकिस्तान को इस लड़ाई में धूल चटाई, बल्कि शौर्य की एक ऐसी मिसाल पेश की जो इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बना गई। इस लड़ाई की शुरुआत 3 मई 1999 को ही हो गई थी जब पाकिस्तान ने कारगिल की ऊंची पहाडिय़ों पर 5 हजार से भी ज्यादा सैनिकों के साथ घुसपैठ कर कब्जा जमा लिया था। भारत सरकार को जब घुसपैठ की जानकारी मिली तब पाकिस्तानी सैनिकों को खदेडऩे के लिए ऑपरेशन विजय चलाया गया। पाकिस्तान ने दावा किया था कि इस लड़ाई में लडऩे वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेजों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी।

भारत ने एलओसी क्यों नहीं पार की?

भारत के पास कारगिल युद्ध में जीत के बाद पीओके पर कब्जा करने का मौका था और भारत ऐसा कर भी सकता था लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया. इसकें पीछे कई कारण है. इनमें से सबसे प्रमुख कारण यह है कि भारत 1971 के शिमला समझौते के तहत एलओसी की स्थिति को बनाये रखना चाहता था. अमेरिका और चीन सहित दुनिया के कई देशों ने पाकिस्तान की इस घुसपैठ को आक्रामक रूप में देखा क्योंकि पाकिस्तान ने एलओसी पार कर लिया था. भारत ऐसा नहीं करना चाहता था क्योंकि यह एक नए युद्ध की शुरुआत भी हो सकती थी. यदि भारत ऐसा करता तो पाकिस्तान के पास पाकिस्तानी सेना को पंजाब, जैसलमेर जैसे पश्चिमी क्षेत्रों में मोर्चा खोलने का बहाना मिल जाता. पाकिस्तान ये भी नहीं मान रहा था कि कारगिल में उसकी ही सेना लड़ रही है. इसलिए अगर भारत सीमित ऑपरेशन रखेगा तो इससे युद्ध नहीं होगा इसलिए भारत ने ऐसा नहीं किया.

कारगिल युद्ध इतिहास के पन्नों में पाकिस्तान की पराजय और भारत की विजय के रूप में दर्ज है। भारत से दुश्मनी मोल लेने वाले इसके पहले भी अन्य देशों ने पराजय का मुँह देखा है और पाकिस्तान को 25 वर्ष पहले एक बार फिर पराजय का मुँह ताकना पड़ा. भारत की नीति शांति की रही है लेकिन बात जब देश पर आती है तो वह आने वाले समय में ऐसे कई कारगिल विजय हासिल करने के लिए तैयार है. भारत माता के माथे पर शौर्य और विजय का टीका लगाकर हमारे वीर जवान संदेश देते हैं हमसे जो टकराएगा, मिट्टी में मिल जाएगा. विजयी सैनिकों का भारत इश्तकाबाल करता है और जिन्हें खोया उनके प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि व्यक्त करता है.

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