वैदिक सम्पत्ति – 337 *चेतन सृष्टि का पारस्परिक सम्बन्ध*

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(यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)

प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन ‘उगता भारत’

गतांक से आगे…

इसी तरह जोंक (जलौका) बड़े-बड़े तूफानों को बतला देती है। आप एक गिलास में पानी भरिए और एक जोंक को उसमें डाल दीजिये । यदि तूफान आनेवाला है, जो जॉक पेंदी में बैठ जायगी और यदि तूफान आनेवाला नहीं है तो जोंक पानी के ऊपर ही तैरती रहेगी। किन्तु यदि तूफान अभी दूर है और देर से आनेवाला है तो जोंक पानी के बीचों बीच विकलसी तड़पढ़ाती रहेगी। इसके अतिरिक्त जोंक खराब खून के निकालने का भी काम करती है। इसी तरह अग्निप्रपात, भूकम्प, तूफान और वर्षा आने के पूर्व ही छोटी छोटी चिटियाँ अपने अपने अंडों को लेकर भागती हैं, जिससे वर्षा का ज्ञान होता है। हिमालय के पक्षी बर्फ पड़ने की सूचना देते हैं और संजन पक्षी इस सूचना को हर साल यहाँ तक पहुँचाता है। इसी तरह मंडूक भी पानी सूखने की सूचना देते हैं। एक तालाब का पानी जब सूख जाता है, तो वे दूसरे तालाब को चले जाते हैं और दूरस्थित जल का रास्ता अपने आप जान लेते हैं, तथा जिस पानी में रहते हैं, उस पानी के सूखने की खबर भी वे पहले से ही पा जाते हैं। इन बातों से मनुष्य लाभ उठा सकता है। इसी तरह कबूतर पक्षी तार और डाक का काम देते हैं। जहाँ तार चिट्ठी नहीं जा सकती, वहाँ कबूतर ही खबर पहुँचाते हैं।

     जिस प्रकार ये पशुपक्षी मनुष्य की नाना प्रकार से सेवा करते हैं, उसी तरह वृक्ष भी फलफूल देकर, अन्न देकर, औषधियाँ देकर और वर्षा आदि अनेकों प्रकार के अमूल्य साधनों को देकर मनुष्य की सेवा करते हैं। ये वृक्ष मनुष्यों की ही नहीं प्रत्युत नाना प्रकार के फल फूल, तृण और अन्न आदि देकर पशुक्षियों की भी सेवा करते हैं। कहने का मतलब यह है कि समस्त हीनाङ्ग प्राणी अपने से उत्तमाङ्ग प्राणी की सेवा करके उसके ऋण से मुक्त होते हैं। यह क्रम हमको इन तीन ही प्रधान थोकों में नहीं दिखलाई पड़ता, प्रत्युत यह इन तीनों महाविभागों के अन्तर्गत अवान्तर उपविभागों में भी दिखलाई पड़ता है। जिस प्रकार एक प्रतिभावान् पुरुष के प्रभाव में साधारण बुद्धि के अनेकों बादमी आ जाते हैं और स्वाभाविक ही प्रतिभावान् का आदर और सत्कार करने लगते हैं, उसी प्रकार पशुचों और वृक्षों के अन्तर्गत उनकी समस्त उपशाखाएँ भी एक दूसरी को सहायता देती हैं, बिहादि मांसाहारियों को अपना मांस देकर यदि दूसरे प्राणी सहायता न दें, तो क्या एक दिन भी हिंसक जन्तु संसार में रह सकते हैं? इसी तरह दीमक यदि घर बनाकर सर्प को न दे और कौवा यदि कोयल के बच्चों की परवरिश न कर दे, तो क्या संसार से सर्पों और कोयलों का कहीं पता मिल सकता है? लोग कहते हैं कि यदि बन्दर संसार में न रहें, तो घोड़ों का नाम निशान ही मिट जाय। क्योंकि घोड़ों के असाध्य रोग बन्दरों के सहवास से अच्छे हो जाते हैं। इसी से 'घोड़े की बला बन्दर के शिर' का मसला प्रचलित है। मसला ही प्रचलित नहीं है, किन्तु हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि बड़े बड़े राजाओं के अस्तवलों में घोड़ों के साथ बन्दर भी बंधे रहते हैं। इससे कह सकते हैं कि यह मसला असत्य नहीं है।

जिस प्रकार पशुओं के समस्त अवान्तर भेद परस्पर एक दूसर की सेवा कर रहे हैं, उसी तरह वृक्षों की भी अवान्तर योनियाँ परस्पर सहायता कर रही हैं। यह बात हमको लताओं के देखने से बहुत ही अच्छी तरह स्पष्ट होती है। हम देखते हैं कि प्रायः सभी लताएँ वृक्षों के ही सहारे रहती है। यहाँ तक नागवेल आदि लताभों की तो परवरिश ही दूसरे वृक्षों पर होती है और बबूल वृक्ष की सहायता से तो ऊसर जमीन में भी घास होने लगती है। कहने का मतलब यह है कि समस्त अवान्तर योनियों परस्पर सहाय्य सहायक होकर और अपने से उच्च विभागों का ऋण चुका कर सेवा करती हैं और यह बात घोषणापूर्वक कहती हैं कि इस सृष्टि में एक भी ऐसी योनि नहीं है, जो निरर्थक हो और उसके सार्थक होने का कारण न हो।

         चेतन सृष्टि की इस सुसङ्गठित बनावट से और जड़ सृष्टि के साथ उसके घनिष्ठ सम्बन्ध से प्रतीत होता है कि यह संसार एक बहुत बड़ा यंत्र है, जिसका सूर्य, चन्द्र, पृथिवी वायु और जलादि जड़ सृष्टि वाँचा है और उस इचि में जड़ी हुई समस्त चेतन योनियों उसके संश्लिष्ट पुरवे हैं। इस मंत्र के कारीगर ने इसमें एक भी ऐसा पुरजा नहीं लगाया, जो बेमतलब और अकारण हो, इसलिए इसका उपयोग बहुत ही समझ बूझकर करना चाहिये ।

क्रमशः

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