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(कृष्णा रंजन – विभूति फीचर्स)

जो जाना जा सकता है वह संसार है। जानने से जो छूट जाता है, वह सत्य है। जो पाया जा सकता है वह पदार्थ है। जो पाने से छूट जाता है, वह परमात्मा है, इसीलिये ईश्वर एक पहेली है। उसे खोजने वाला खोजते-खोजते स्वयं खो जाता है,तब वह मिलता है। उसे पाने के लिए स्वयं को खोना पहली शर्त है, तब कौन, किसे, कैसे और कहां मिला? उसका कोई रंग, रूप, कद, काठी नहीं है। वह न कुछ (नथिंग) है। शून्य है। महाशून्य है।

प्रकृति लीन होते-होते मिटते-मिटते परमात्मा बन जाती है और परमात्मा प्रकट होते-होते प्रकृति बन जाता है। हवा, पानी, धरती, आकाश, चन्द्र, सूर्य, दिन-रात्रि, सर्दी-गर्मी आदि को प्रकृति कहते हैं। वह जब न रहे तब प्रकृति है, प्रकृति न रहे तो परमात्मा। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

मनुष्य को बीज कहा गया है ईश्वर का। कैसे, जरा ध्यान में लें, मैं जो आप लोगों के सम्मुख बैठा हूं।

इसके पूर्व मैं कहां था? कैसे आया? इसके पूर्व मैं मां के गर्भ में था। एक बात साफ हुई कि हम मां के गर्भ से यहां आये। उसके पहले हम कहां थे? कैसे मां के गर्भ में आये?

मां के गर्भ के पूर्व हम माता-पिता के शुक्राणु में थे। शुक्राणु के भी पहले हम माता-पिता के रक्त में थे यह भी स्पष्ट हुआ। रक्त के पूर्व हमारा होना कहां था, हम कहां थे? पूर्व में हम हवा, पानी, सर्दी, गर्मी, चन्द्र, सूर्य, रात, दिन तथा धरती और आकाश में थे। तब हम कौन हुए।

इसलिए यह सिद्ध होता है कि आदमी बीज है भगवान का। परमात्मा की रोशनी जब भी उतरी है आदमी पर ही उतरी है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर क्राईस्ट प्रमाण हैं।

वह परमात्मा है, हममें आत्मा है। वह चैतन्य है चेतना हमारे पास है। वह भगवान है, हममें ध्यान है। हम जीव हैं वह शिव हैं। आदमी रिमोट कन्ट्रोलर है, बीज है भगवान का।

बीज में वृक्ष की संभावनायें हैं जो दिखाई नहीं पड़ता है। बीज को वृक्ष में रूपान्तरित किया जाता है। खेती होती है। वह बीज मिट जाता है। मिट्टी में खो जाता है। मिल जाता है। तब वह अंकुरित होता है। जाग जाता है। पौधे से वह स्वमेव ही वृक्ष बन जाता है। ठीक इसी तरह जिसने स्वयं की अस्मिता को विलीन कर दिया।

बीज का खोना सार्थक होता है। वह वृक्ष बन गया। नदी बहते समुद्र में खो जाती है तो इसका खोना कितना सार्थक होता है। यह समुद्र हो गई। ठीक इसी तरह हमने यदि जीवन को संसार में गंवा दिया तो हमारा जन्म और जीवन दोनों व्यर्थ गया। यदि हमने अपना जीवन परमात्मा में गंवा दिया तो कितना सार्थक हुआ।

आश्चर्य की बात यह नहीं है कि हमने परमात्मा को पा लिया। उसे हमने खोया ही कब था। उससे हम वंचित ही कब हुए थे।

मछली पानी में जन्म लेती है, वहीं वह जीती है और उसी में मर जाती है। मछली यदि कहे कि वह पानी को देखना चाहती है तो उसे पानी दिखाया जा सकता है। तालाब या नदी के किनारे मछली को पानी से बाहर निकालकर रख दिया जा सकता है। वह जब बाहर छटपटायेगी, तब उसे पानी दिख पड़ेगा।

हमें ईश्वर कैसे दिखाया जा सकेगा। हम तो उसी में जन्मे-जीवन जीते और मर जाते हैं। उसका कोई किनारा भी नहीं होता। वह असीम है। वह दृष्टा है। देखने वाला है, दृश्य नहीं है। हमारे भीतर देखने वाला बैठा है इसीलिये हम कहते हैं देखेंगे। हमने स्वयं के भीतर जो बैठा है उसे नहीं देखा। परमात्मा को देखना तो दूर की कौड़ी हुई।

परमात्मा खोज है। अनुभव है। वह शब्द या पदार्थ नहीं है। आत्मा की उच्चतम स्थिति को ही परमात्मा कहा गया है। हमने कहा कि सत्य कठिन है। परमात्मा दुश्वार है। उसे पाने के लिये बड़ी कठिनाइयां होती हैं। सत्य या परमात्मा इसलिये कठिन लगता है, क्योंकि हमने सत्य को शब्द और परमात्मा को पत्थर बना दिया। पदार्थ बना दिया और उसमें हम सत्य या परमात्मा खोजेंगे तो कैसे बात बनेगी। हम यह भी मानते हैं कि वह कण-कण में है, फिर भटकने का क्या कारण? वह अभी है और यहीं है। अभी नहीं तो वह कभी नहीं है। यहीं नहीं है तो कहीं नहीं है।

जिन्हें स्वयं में परमात्मा का अनुभव नहीं होता, उन्हें पत्थरों में, पदार्थों में परमात्मा का अनुभव कैसे होगा। हम स्वयं को छोड़कर संसार भर में उसे खोजते फिरते हैं। हमें पत्थर, लकड़ी, शीशे, रांगे में ईश्वर होने का पूरा भरोसा होता है। स्वयं पर नहीं।

शब्दों में बड़ी भ्रान्ति होती है। जब कबीर, चैतन्य, सूर ने कहा कि उन्हें मिल गया या प्राप्त हो गया। हमने समझा कहीं खो गया था जो उन्हें मिल गया या प्राप्त हो गया। ठीक नदी की सूखी रेत की तरह, गड्ढा है। उसमें से कचरा हटा दें। सूखे पत्ते हटा दें नीचे से पानी झांकता है। हम इसे बताने या कहने के लिये यही कहेंगे कि पानी मिल गया। इसका अर्थ हुआ कि पानी वहां था। कुछ पत्ते कचरों से वह ढंक गया था। उसे हटाते ही पानी नीचे से झांकता है। इसी तरह खोजियों को परमात्मा की अनुभूति हुई और उन्होंने घोषणा की कि ईश्वर मिल गया। हमने समझा बाहर से मिला।

जिन खोजियों को भी सत्य या परमात्मा की अनुभूति हुई, उन लोगों ने तीर्थ या मंदिर के भीतर जाकर नहीं स्वयं के भीतर जाकर घोषणा की कि उन्हें मिल गया। स्वयं रास्ता है सत्य का। हमारा मन है कि हम किसी से सुनकर सत्य को पा लेना चाहते हैं। कुछ ग्रन्थ, किताबें पढ़कर हम ईश्वर को प्राप्त कर लेना चाहते हैं। यह कैसे हो सकेगा। हम कहते हैं वह बहुत दूर है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, हिमालय जाना पड़ेगा। हमें यह भी तो समझ लेना चाहिए कि हमारे पास जो है वह क्या है। कौन है जिसने जन्म लिया। बच्चा रहा, जवान हुआ, बूढ़ा होकर मर जाता है। कोई नहीं जान सका, समझ सका?

हमने बचपन को देखा है। जवानी और बुढ़ापे को भी देखा है। बचपन आया और चला गया। जवानी आई और चली गई। बुढ़ापा आया और गया। हम आये न गये। कौन हैं हम। सुख-दु:ख की घड़ी आई और वह भी बीत गई। हम नहीं बीते-बात क्या है।

हम जो हैं उसे जानना नहीं चाहते कि हम क्या हैं। जो नहीं है, उसमें हम जीवन जी रहे हैं। विसंगतियों का यह भी कारण है। ध्यान और देह के संयोग को ही योग कहा जाता है। कभी आप अपनी ओर ध्यान दें। शरीर कहीं और सक्रिय है। ध्यान कहें या चेतना कह लें, कहीं और है। अध्यापक कहता है कि ध्यान से सुनो, ध्यान से देखो। छात्र कान से सुन रहा है, आंख से देख रहा है यह ध्यान क्या कौतुक है। बातें बन जाती हैं, क्योंकि छात्र और अध्यापक एक ही धरातल के होते हैं। दोनों नहीं जानते कि ध्यान क्या है।

आदमी, जो है, वही होकर आनंदित होगा। जो नहीं है, वह होकर आनंदित वह आदमी न हो सकेगा।

आदमी की बीमारी कहें या और कुछ। उसे जो होना था, वह नहीं हो पाया। वह वही हो गया है, जो उसे नहीं होना था, इसलिए उसकी एक महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षा उत्पन्न होती है कि मैं कुछ हो जाऊं। किसी भी तरह। कैसे भी कुछ हो जाऊं। इसी कसरत में वह, वह हो गया जो उसे नहीं होना था। संभवत: धर्म की यही समझ है कि तुझे जो होना है हो जा। तेरे भीतर जो बीज है वह वृक्ष हो जाए, फले और फूले। दरअसल, धर्म करने की नहीं, होने की प्रवृत्ति है। भीतर सत्य या परमात्मा है। बाहर पदार्थ है, संसार है। हम जो करते हैं वह सब बाहर-बाहर। भीतर का क्या हुआ। प्रश्र करने का नहीं, होने का है। आप हैं कहां? आपकी चेतना, ध्यान कहां है? शरीर करने के लिये है। चेतना या ध्यान में होना है।
करने के लिये बाहर की दौड़ में होंगे। होने के लिये अन्तर्यात्रा करनी पड़ेगी। हमारे पास बाहर संसार का भूगोल अवश्य है। भीतर की यात्रा का एटलस या भूगोल हमारे ज्ञान में नहीं है। इसलिये भी हमारा होना कठिन लगता है। अतएव हमने करने में रस पैदा कर लिया।

धर्म, कर्म काण्ड करने की प्रकृति का पोषक है। करने से राहत अवश्य मिलती है कि हमने कुछ किया। इससे अधिक और कुछ नहीं। धर्म के जगत में ऐसे विभिन्न किस्मों के राहत कार्य चलने लगे हैं, जिसमें जजमान, पुरोहित, धर्माचार्य, स्वयंसेवकों तथा अन्य लोगों का हित होता है। धर्म होने के लिये है। ईश्वर आडम्बर नहीं है बल्कि अपनी चेतना को बाहर से भीतर की ओर उन्मुख करना है। (विभूति फीचर्स)

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