*गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य का विश्लेषण*

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Dr DK Garg

यधपि गौतम बुद्ध ने चार वेद नहीं पढ़े थे। क्योंकि प्रारम्भ से ही उनके मन में वेद ज्ञान के प्रति भ्रांतिया पैदा कर दी गयी थे। परन्तु गौतम बुद्ध द्वारा जो चार आर्य सत्य बताए है वह चारो वेदो के प्रति उनकी श्रद्धा और इन चार वेदों में मुख्यत क्या है ,ये बताया है। महात्मा बुद्ध ने स्वयं को आर्य परम्परा के अन्तर्गत माना है और आर्य संस्कृति के उपदेष्टा के रूप में प्रस्तुत किया है ।
महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन में कोई नया मत नहीं चलाया था । उस समय समाज में रूढ़िवादी,पाखंड और वेद , यज्ञ और धर्म के नाम जो विकृतियाँ , कुरीतियाँ , पाखण्ड , अन्धविश्वास , क्रूर और जटिल कर्मकाण्ड एवं जातिवादीय अन्याय पनपे हुए थे उनको मिटाने के लिए उनका सुधार आन्दोलन था । उन्होंने अपने उपदेशों में वैदिक धर्मशास्त्रों , उपनिषदों और योगदर्शन के सदाचारों का ही प्रस्तुतीकरण किया है ।

गौतम बुध ने उपरोक्त चार आर्य सत्य में चारो वेदो के मार्ग पर ही चलने की बात अपने तरीके से कही है । लेकिन दुर्भाग्यवश वाममार्गियों ने छल कपट के चलते ,एक नया मत सुरु करने के लिए वेद शब्द हटा दिया और मनगढंत चार आर्य सत्य लिख दिए। वेद क्या कहते है ,ये समझे
जैसे –
१ -ऋग्वेद – ऋग्वेद में कुल 10633 मंत्र हैं। इस सृष्टि मानव जीवन हेतु आवश्यक समस्त जानकारियाँ पारिभाषिक रूप में ऋग्वेद में प्रदान की गई है। ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद है।
2. यजुर्वेदः-यह द्वितीय वेद खण्ड है। इसकी मंत्र संख्या कुल 1975 है। ऋग्वेद में जो परिभाषायें दी गई हैं, उनका व्यवहारिक पक्ष इस वेद खण्ड में प्रस्तुत किया गया है। सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था वेद के अनुसार किस प्रकार की होनी चाहिये, यह वेद खण्ड इन जानकारियों से समन्वित है। यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद है
3. सामवेदः- यह वेद का तीसरा खण्ड है जो कलेवर में सबसे छोटा है, इसकी मंत्र संख्या 1875 है। ऋग्वेद के अधिकांश मंत्रों की पुनरावृत्ति से यह खण्ड भरपूर है। सामवेद में प्रमुख रूप से प्रेम या करूणा पक्ष पाया जाता है। गीत संगीत का भी इस वेद खण्ड से संबंध है।गान्धर्व वेद इसका उपवेद है
4. अथर्ववेदः- यह वेद का चतुर्थ खण्ड है जिसकी मंत्र संख्याकुल 5933 है। वेद का एक पाठक अथर्ववेद तक पहुंचते-पहुंचते काफी परिपक्व मानसिकता पा चुका होता है, अतः इस वेद खण्ड में मानव जीवन का वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया गया है। मानव शरीर एक अद्भुत वैज्ञानिक यंत्र है जिसके माध्यम से एक सामान्य मनुष्य अवस्थात्मक उत्थान करके कैसे कैसे महान् और आश्चर्यजनक वैज्ञानिक कार्य कर सकता है,यह जानकारी इस वेद खण्ड में प्रमुखता से दी गई है। इहलोक के आरंभ में ऋषि अङ्गिरा पर इस वेदखण्ड का प्रकाश हुआ था,जिसकी साक्षी अलग से अनेकानेक ऋषियों ने दी है।

वर्तमान समय में विश्व में जितने धर्म व धर्ममत पाये जाते हैं तथा जो भी ज्ञान विज्ञान आज पाया जाता है, वेद उन सबके मूल में है अर्थात् उनका जनक है ।फलतः वेद के महत्व को आज पूरा विश्व स्वीकार करता है। हम सबके आदि पूर्वज भगवान् मनु ने कहा है-
“वेदोऽखिलो धर्ममूलम् ” अखिल धर्म का मूल है।”मनुस्मृति 2/6″
भगवान् बुध्द ने कहा है :-“समं समादाय वतानि जन्तु, उच्चावचं गच्छति सञ्जसत्तो।
विद्धा च वेदेहि समेच्च धम्मं, न उच्चावचं गच्छति भूरिपो” -सुत्तनिपात 292
“अपनी इन्द्रियों के आधीन होकर अपनी इच्छा से कुछ काम तथा तप करते हुए लोग ऊँची-नीची अवस्था को प्राप्त करते है, किन्तु जो विद्धान वेद को प्राप्त होकर धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है,वह भूरि प्रज्ञ इस प्रकार डांवाडोल नहीं होता।”

गुरु ग्रंथ साहब में लिखा है –“असंख्य ग्रंथ मुखि वेदपाठ” यानि की “असंख्य ग्रंथों में भी मुख्य वेदपाठ है।” -जपुजी, १७
स्वयं रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है :-“वंदउँ चारिहुँ वेद भव वारिधि वोहित सरिस।’ – – बालकाण्ड सोरठा 14 (ङ)
“मैं चारों वेदों की वंदना करता हूँ ,जो संसार सागर से पार उतरने के लिये नौका के समान है।”
भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है :-“त्रैगुण्य विषया वेदा”
“वेद तीन गुणों के विषय से भरपूर है।”-गीता अ.2/श्लोक45 गीता के विषय में यह बात प्रसिध्द है कि वेद में मानव जीवन से जुड़े सूक्ष्म तत्वों पर विचार किया गया है। वेद को निरंतर पढ़ने तथा सुनने से वे तत्व मनुष्य के अंदर स्वाभाविक रूप से अपना स्थान बनाते चले जाते हैं तथा उसे हर समय एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। वेद में एक जीवन व्यवस्था [System of Life] बताई गई है जो मानव व्यवहार का मूल है। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त जीवन का एक सम्पूर्ण कार्यक्रम वेद में उपस्थित है। वेद एक
ऐसा अलौकिक ग्रंथ है जो मनुष्य के जीवन के साथ चलता है। वह चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से युक्त जीवन व्यवस्था प्रदान करता है। जिसमें एक मनुष्य निरंतर अवस्थात्मक उत्थान करता हुआ मनुष्य से ऋषि, देव, ब्रह्म तथा विशिष्ट ब्रह्म अवस्था तक प्राप्त कर सकता है।
पौरुष की अभिवृध्दि स्वाभाविक व वैज्ञानिक रूप से होती है। वेद पुरुष और औरत दोनों को समान महत्व प्रदान करके उनकी स्वाभाविक शारीरिक रचना तथा प्रकृति के अनुकूल अलग-अलग कार्यक्षेत्र प्रदान करता है। जहां वे एक दूसरे के पूरक व सहयोगी होते हैं।

वेद में पारिवारिक जीवन हेतु जो व्यवस्था प्रदान की गई है, वह परिवार के प्रत्येक सदस्य की स्वतंत्रता को बनाये रखते हुए उन्हें संयुक्त रूप से रहने और पारिवारिक सुख-समृध्दि का मार्ग बतलाता है।
वेद में जाति एवं संप्रदाय मुक्त समाज की रचना का मार्ग बतलाया गया है। जहाँ वर्ण व्यवस्था का आधार व्यक्ति की स्वाभाविक रुचि को माना गया है। वेद में जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब की भावना से मुक्त समाज निर्माण का मार्ग पाया जाता है :-
“समानी प्रपा सहवोऽन्नभागः।’
“तुम्हारे पीने का पानी तथा अन्न भाग समान हो’। -अथर्ववेद 3/30/6
वेद एक ऐसे राष्ट्र निर्माण के विषय में बतलाता है,जिसमें राष्ट्र प्रेम हो किन्तु राष्ट्रवाद की बुराईयाँ न हों। राष्ट्र के प्रति एक नागरिक का क्या कर्तव्य है? जनप्रतिनिधि कैसे हों उनका क्या कर्तव्य है? संसद कैसी होनी चाहिए? राष्ट्राध्यक्ष कैसा होना चाहिए? वेद इस विषय में पर्याप्त व्यवहारिक मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है। किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था कैसी होनी चाहिए? कर व्यवस्था कैसी होनी चाहिए? इस विषय में भी वेद पर्याप्त मार्गदर्शन करता है। अनेकों राष्ट्रों के संगठन विश्व का क्या स्वरूप हो इस विषय में वेद विश्वबंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम्की व्यवस्था प्रस्तुत करता है
“यत्र विश्वं भवति एक नीड” ,जहाँ विश्व एकघोसला बन जाता है।’ – यजु./32/8
चिकित्सा के क्षेत्र में वेद की देन आयुर्वेद के महत्व से आज पूरा विश्व परिचित है। जिसमें रोगों के होने के मूल कारण को जानकर उसके समूल नाश का प्रयास किया जाता है। गणित के क्षेत्र में वैदिक गणित आज प्रसिध्दि प्राप्त कर रहा है। जिसके माध्यम से गणना कम समय में तथा त्रुटिहीन की जा सकती है।
युध्द विद्या व अस्त्र शस्त्रों के निर्माण की विद्या धनुर्वेद के रूप में विकसित की गई। परमाण्विक अस्त्र शस्त्रों के निर्माण से संबंधित जानकारी वेदमंत्रों में पाई जाती है। विमानविद्या, खगोलशास्त्र, वर्तमान समय में लोकप्रिय योग विद्या आदि सभी का जनक वेद ही है। आधुनिक युग की सर्वाधिक लोकप्रिय लोकतंत्र किंवा प्रजातंत्र का मूल वेद ही है, जो सहअस्तित्व की शिक्षा प्रदान करता है।
मानव जीवन से जुड़ा कोई भी ऐसा क्षेत्र बाकी नहीं है जिस पर वेद में मार्गदर्शन न दिया गया हो। आवश्यकत्व है उसका युगानुकूल व्यवहारिक उपयोग का। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता चलता है कि आर्यों की सम्पन्नता का मूल कारण वेद पर आधारित राजनैतिक व सामाजिक व्यवस्था ही है। वर्तमान कालखण्ड में वेद के महत्व का पुर्नसंस्थापन हेतु ऋषि दयानंद ने प्रमुख रूप से कार्य किया है। उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में वेद को काफी महत्व प्राप्त है। अनेकों आर्य समाजी विद्वान वेदों का अध्ययन कर वर्तमान जन समुदाय को वेद ज्ञान से परिचित कराने का कार्य कर रहे हैं। महर्षि महेश योगी के द्वारा स्थापित संस्थान भी वेद विद्या से वर्तमान जनसमुदाय को परिचित कराने का कार्य कर रहा है। विभिन्न राष्ट्रों में उपरोक्त संस्थान द्वारा अनेकों कार्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं।
वेद के विषय में कहा जाता है:- “अनंता वैवेदाः।”
“वेद अनंत ज्ञान सम्पन्न है।” -तैत्तरीय उपनिषद
वेदमंत्रों में अनंत ज्ञान है जो कि सूत्रात्मक ढंग से लिखे गये हैं। विभिन्न कालों में वेद की अनेकानेक व्याख्या की गई हैं। वेद की सबसे प्राचीन व्याख्या या भाष्य संहिता ग्रंथ अथवा शाखा ग्रंथ हैं। कुछ विद्वान संहिता ग्रंथों को भी वेद ही मानते हैं किन्तु मूलवेद और संहिता ग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि मूल और व्याख्या में क्या अंतर है। वर्तमान समय में बहुत कम शाखा ग्रंथ उपलब्ध हैं।

महात्मा बुद्ध ने– कर्मकाण्ड एवं आहार – विहार में हिंसा का, आचरण में अधर्म का और सामाजिक व्यवहार में जातीय भेदभाव का बोलबाला था अतः उन्होंने अहिंसा , सदाचार और सामाजिक समरसता के निर्माण पर विशेष बल दिया। उनके प्रवचन मौखिक रूप में दिये थे ।उस प्रवचन काल में बौद्धों के कोई शास्त्र नहीं बने थे । अपने प्रवचनों में वे अनेक बार शास्त्रों की , उनके मार्ग पर चलने की , उनका धर्म ग्रहण करने की प्रेरणा देते हैं । उन शास्त्रों के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं । उनसे पहले , शास्त्र के रूप में वैदिक शास्त्र ही प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित थे । शास्त्रों में सबसे प्रमुख शास्त्र वेद माने जाते थे , अतः शास्त्रों के सम्मान में वेदों का सम्मान स्वतः समाविष्ट हो जाता है ।
महात्मा बुद्ध ने स्वयं को आर्य और अपने को आर्य संस्कृति का पुनरुद्धार कार्य माना था । तपस्या – साधना के पश्चात जिन चार सत्यों का उन्हें बोध हुआ उन्होंने उनको ‘ आर्य – सत्य ‘ नाम दिया था । ऋषि – महर्षि जन आर्य समुदाय के शास्त्रप्रणेता और समाज – सुधारक थे । बुद्ध कहते हैं कि तन – मन – वचन की पवित्रता रखते हुए ऋषियों के मार्ग पर चलो ( २० . ९ ) । इस प्रकार बुद्ध आर्य – शास्त्रकारों का सम्मान भी करते थे और स्वयं को आर्य समुदाय का सदस्य भी मानते थे।

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