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निवेदन : ये लेखमाला 20 भाग में है। इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश एवं अन्य वैदिक विद्वानों के द्वारा लिखे गए लेखों की मदद ली गयी है। कृपया अपने विचार बताये और उत्साह वर्धन के लिए शेयर भी करें।
भाग-13
Dr DK Garg
जैन मत में उपवास और लम्बे समय तक भूखे रहना ही तप और मोक्ष्य का माध्यम?

जैन मत में पर्वों और व्रतों की संख्या प्रतिवर्ष 250 से भी अधिक है। ये व्रत-उपवास मात्र देवताओं को प्रसन्न करके भौतिक कामनाओं की पूर्ति के लिए ही नहीं, बल्कि मोक्ष रूपी अनंत सुख को प्रदान करने के लिए बताये जाते हैं।

गुणरत्न संवत्सर तप के दौरान 480 दिनों में 407 दिन उपवास किया जाता है, लेकिन हंसरत्नविजयजी ने अपना तप 494 दिन तक किया और इस दौरान 407 की जगह 423 दिन उपवास किया।
`एकान्तर’, ‘दुकान्तर’ और ‘तीनान्तर’ कहलाने वाली इस प्रक्रिया में हर महीने व्रत के दिन बढ़ते जाते हैं। मसलन, 12वें महीने भोजन के दिन महज 3 दिन रह जाते हैं। इसे लेकर हंसरत्नविजयजी कुल 14 वर्षों में 1722 दिन उपवास कर चुके हैं।
चातुर्मास (वर्षा काल) के दौरान जैन धर्मावलंबी एक महीने का उपवास रखते हैं। वह भी केवल दिन के समय गुनगुने पानी के सहारे। इस विशेष उपवास को मास खमण कहते हैं। जैन धर्म के उपवासों में किसी भी तरह का फल या फलारस भी निषेध होता है। विशेष परिस्थितियों में सिर्फ उबाल कर थारा हुआ या धोवन पानी सूर्योदय के बाद से सूर्यास्त पूर्व तक लिया जा सकता है। इस प्रकार का उपवास तिविहार उपवास कहलाता है। चौविहार उपवास में तो पानी का भी निषेध होता है। उपवास वाले दिन से पहले वाली रात्रि से ही भोजन का त्याग शुरू हो जाता है जो अगले दिन भर और रात भर जारी रहता है। अठई आठ दिनों के लिए रखा जाने वाला उपवास है। प्रोषधोपवास में पर्व के दिनों चारों प्रकार के आहार का त्याग कर करके धर्म ध्यान में दिन व्यतीत करना होता है।

जैन धर्म के अनुसार व्रत-उपवास समस्त पापनाशी, अनेक पुण्य, मोक्ष और स्वर्ग के कारण हैं।

विश्लेषण : एक कहावत है -भूखे भजन ना होई गोपाला.
उपवास के नाम पर कोई काम नहीं करना सिर्फ एक स्थान पर बैठे रहना ,इन्द्रियों को प्रसिद्धि के लिए जबरन कष्ट देना ,अपनी जय -जय करवाना आदि क्या उपवास या तप है ?
इसका और मतलब है की जैन मत को अपनाने वाला आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहिए क्योंकि बेचारा मजदूर ,रोज कमाने खाने वाला बाबू के लिए ये उपवास संभव नहीं है और इसलिए उसको मुक्ति की आशा भी नही करनी चाहिए।
क्योकि जैन मत में जितना लब्म उपवास ,उतना ही बड़ा 1008 वाला तपस्वी।
आयुर्वेद उपवास के विषय में क्या कहता है? उपवास शरीर शुद्धि के आवश्यक बताया गया है। इसलिए योग में भी उपवास की महत्ता का बखान अनेको बार किया जाता है।उपवास के लिए तीन कारण से जरुरी है –.1.पेट में गड़बड़ हो और चिकित्सा की दृष्टि से जरूरी हो ।
2.भोजन कम मात्रा में उपलब्ध हो तो मिलकर थोड़ा थोड़ा लें ले।

3 शतपथ ब्राह्मण १/१/१/७ के अनुसार “उपवास” का अर्थ गृहस्थ के लिए प्रयोग हुआ है जिसमें गृहस्थ के यज्ञ विशेष अथवा व्रत विशेष करने पर विद्वान लोग उनके घरों में आते हैं अर्थात उनके समीप (उप) रुकते (वास) हैं। इसलिए विद्वानों का सत्संग करना भी उपवास कहलाता है । उपवास के समय भूखा रहना अर्थात निराहार रहने का तात्पर्य शतपथ ब्राह्मण १/१/१/८ के अनुसार विद्वान के घर पर आने पर उनके भोजन ग्रहण करने के पश्चात ही गृहस्थी को भोजन ग्रहण करना चाहिए अर्थात तब तक निराहार रहना चाहिए।
आयुर्वेद के अनुसार ज्यादा और लम्बे उपवास से इससे शरीर के अंग कमजोर होते चले जाते है। भूख सबसे पहले भोजन को पचाती है। जो हमने खाया वो पचाती है। उसका रस शरीर में सोखती है। इस पाचन के कारण भूख लगना शुरू होती है।उसके बाद भूख रोगों को पचाती है। इससे रोग खत्म होते हैं। इसके बाद भी कुछ न खाया जाए तो भूख आंतों को पचा डालती है।फिर भूख खत्म हो जाती है। आंते पड़े हुए मल का ही फिर से पाचन करने लगती हैं। शरीर में मल के पाचन से रोग पनपते हैं। पाचन कमजोर हो जाता है और शरीर कमजोर होने लगता है।और अंत में मृत्यु हो जाती है
भूख का प्रदर्शन क्या तप है ? तप के विषय में भी कुछ लोगों को भ्रान्ति है । जैन मत के अनुसार अपने शरीर को ज्यादा से ज्यादा कष्ट देना ही तप होता है । इस तरह के तप को शास्त्रों में तामसिक तप कहा है । जैसे- अपने चारों ओर अग्नि जलाकर तपना, जल में एक पैर पर खड़े रहना, महीनों तक भूखे रहना, मिट्टी का खड्डा खोदकर उसमें समाधि लगाना, नंगे पैर रहना, कई रातों तक न सोना, भूमि पर पैर न रखना आदि । ये सब तप के विकृत, दूषित और भ्रष्ट रुप हैं।
ये ना समझे की वह इन दिनों कोई ईश्वर स्तुति कर रहा है या ज्ञान वर्धन के लिए स्वाध्याय।पल पल उसका ध्यान भोजन और भूख की तरफ ही रहता है।ईश्वर ने भूमि पर सभी प्राणियों को उनकी आवश्यकता अनुसार भोजन दिया है, और श्रम द्वारा उत्पादकता बढ़ाने के लिए बुद्धि और शक्ति दी है।क्या परमपिता परमात्मा ,जगत का रचयिता भूखे रहने और इन्द्रियों को कमजोर करना , निठल्ले रहने से खुश होगा?कभी नही।

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