आत्मा शरीर में कहां रहती है? 5

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पंचम किस्त।
तेतिरियोपनिषद की आत्मा के संबंध में चर्चा चतुर्थ किस्त में की गई थी ।अब तैत्तिरीय उपनिषद के अग्रिम प्रष्ठों पर जो चर्चा आत्मा के विषय में की गई है उस
पर दृष्टिपात करते हैं।

आत्मा शरीर में कहां रहती है।
गतांक से आगे।

देखो प्रष्ठ संख्या 394 ,395 एकादशोपनिषद प्रख्यात वैदिक विद्वान महात्मा नारायण स्वामी जी के द्वारा व्याख्यायित किया गया है।
“ब्रह्मवित्त अंतर्मुख होकर हृदययाकाश को ब्रह्म की प्राप्ति का स्थान जानकर उस ब्रह्म को उस स्थान में प्राप्त कर लेता है। और उसे प्राप्त करके अपने समस्त कामनाओं के सिद्ध भी कर लेता है।”
फिर वही विषय जो हम मुंडको उपनिषद, कठोपनिषद और एतरेय उपनिषद में पढ़ चुके हैं कि आत्मा हृदयाकाश में रहती है। और परमात्मा से उसका साक्षात्कार वहीं पर होता है।
पृष्ठ संख्या 457
“ब्रह्म जीव दोनों निश्चित रूप से देह में हृदयाकाश में स्थित प्रणव (ओम) के जप से जाने जा सकते हैं।”
इस प्रकार ईश्वर और जीव( अर्थात आत्मा) एक ही स्थान पर रहते हैं जो हृदय में रहते हैं।
प्रष्ठ संख्या 470, 471 पर निम्न वर्णन आता है।
“मनुष्यों के अंगुष्ठमात्रहृदय में जीवात्मा के अंदर सदा पूर्ण ब्रह्म स्थित है। वह हृदय ,बुद्धि, मन से जानने योग्य है जो इसको जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।”
पृष्ठ संख्या 473
“आत्मा परमात्मा इस जीव की हृदय रूपी गुफा में छिपा हुआ स्थित है।”
पृष्ठ संख्या 482
“जो इस हृदय में स्थित को हृदय व मन से उसे जानते हैं”
अब यह भी शंका उठ रही होगी पाठकों के मन मस्तिष्क में कि आत्मा हृदय में तो रहती है यह तो मान लिया लेकिन उसका परिमाण क्या है ?और उसका लिंग क्या है?
इसके लिए देखे हैं प्रष्ठ संख्या 487
यदि बाल के सौवें भाग का और फिर उसके भी सौ भाग को कल्पना किए हुए का एक हिस्सा अर्थात बाल के अग्रभाग के 10 सहस्त्रवें भाग के परिमाण वाला जीव जानना चाहिए ।”
यह जीवात्मा का परिमाण है। जो एक बाल के अग्रभाग का सौवां और फिर उसका भी सौवां भाग करें उसके बराबर अर्थात नहीं के बराबर परिमाण आता है। इससे यह सिद्ध होता है की आत्मा का कोई परिमाण नहीं होता। आत्मा में कोई अणु परमाणु नहीं होता। आत्मा अमर है, अखंड है।

अब आत्मा के लिंग के विषय में पढ़ें,”
यह जीवात्मा न स्त्रीलिंगी है और उन्हें पुरुष लिंगीऔर नहीं यह नपुंसक लिंगी है ।जिस जिस शरीर को ग्रहण करता है उसे उसके साथ वह रखा जाता है अर्थात उससे युक्त हो जाता है।”
स्पष्ट हुआ की आत्मा का कोई लिंग नहीं है।
अब अग्रिम किस्त में बृहदारण्यक उपनिषद के आधार पर चर्चा करेंगे।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट ।
अध्यक्ष उगता भारत समाचार पत्र,
ग्रेटर नोएडा।
चलभाष
9811838317
7827681439

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