अग्नि अर्थात् ऊर्जा की वृद्धि कैसे करें?

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अग्नि अर्थात् ऊर्जा क्या है?
हम अग्नि, ऊर्जा, से क्या आशा करते हैं?
अग्नि अर्थात् ऊर्जा की वृद्धि कैसे करें?

अच्छिद्रा सूनो सहसो नो अद्य स्तोतृृभ्यो मित्रमहः शर्म यच्छ।
अग्ने गृणन्तमंहस उरुष्योर्जो नपात्पूर्भिरायसीभिः ।।
ऋग्वेद मन्त्र 1.58.8 (कुल मंत्र ६८१)

(अच्छिद्रा) दोष रहित (सूनो) पुत्र (सहसः) पूर्ण बल के लिए (नः) हमारी (अद्य) आज (स्तोतृृभ्यः) परमात्मा का स्तुतिगान करते हुए (मित्रमहः) सबके मित्र (शर्म) निर्बाध सुख (यच्छ) हमें उपलब्ध करवाओ (अग्ने) सर्वोच्च ऊर्जा, परमात्मा (गृणन्तम्) पूजा करने वाला (अंहसः) पापों से (उरुष्य) सुरक्षित करो (उर्जो) शक्ति और बल को (नपात्) न गिरने योग्य (पूर्भिः) सुरक्षित करो (आयसीभिः) लोहे जैसे संरक्षण के साथ। 

व्याख्या:-
अग्नि अर्थात् ऊर्जा क्या है?
हम अग्नि, ऊर्जा, से क्या आशा करते हैं?

अग्नि, आग या ऊर्जा, सर्वोच्च ऊर्जा परमात्मा का पुत्र है और उन सबका मित्र है जिन्हें एक श्रद्धालु, परमात्मा का महिमागान करते हुए, त्रुटिहीन और बाधारहित सुखों और प्रसन्नताओं के लिए प्रार्थना करता है कि वे उसे आज ही प्राप्त हों। अग्नि की पूजा करने वाले को पापों से बचाया जाना चाहिए। ऐसे श्रद्धालु के लिए परमात्मा ही एक मात्र ऐसी शक्ति है जो उसकी शक्ति और बल को नीचे गिरने से बचाती है। परमात्मा लौहयुक्त रक्षक की तरह उसका संरक्षण करता है।

जीवन में सार्थकता: –
अग्नि अर्थात् ऊर्जा की वृद्धि कैसे करें?

हम अग्नि के बल को प्राप्त करने के लिए अग्नि की पूजा करते हैं और उसका आह्वान करते हैं। वास्तव में हमारे प्रसन्न और सुखी जीवन के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रतिक्षण हमारे निकट ही उपलब्ध रहती है। हमें केवल इस अनुभूति की आवष्यकता होती है कि ऊर्जा उस सर्वोच्च ऊर्जा, परमात्मा का ही अंग है। अतः जब भी और जिस किसी भी उद्देष्य के लिए हमें ऊर्जा की आवष्यकता हो हमें उसका आह्वान करना चाहिए और उसे प्राप्त करना चाहिए। आह्वान करने के लिए एक ही कला और विज्ञान है कि हम जीवन में पवित्र बनकर रहें, इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण स्थापित करें और दिव्यता की कामना करें। हमें सदैव सर्वोच्च ऊर्जा, परमात्मा के साथ गहरे हृदय से सद्भावनात्मक प्रेम करना चाहिए। अपने व्यक्तिगत आत्मा अर्थात् जीवात्मा और सर्वोच्च सर्वव्यापक आत्मा अर्थात् परमात्मा के प्रति अपने जीवन में, अपने गहरे हृदय आकाष में, चेतना जागृत किये बिना हमें कभी स्थाई प्रसन्नता प्राप्त नहीं हो सकती और समस्याओं और विवादों से छुटकारा भी प्राप्त नहीं हो सकता।
 


अपने आध्यात्मिक दायित्व को समझें

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