धर्म-अध्यात्म में ऐसे-ऐसे छल-कपट चलते हैं !

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स्वामी सत्यपति परिव्राजक

एक वर्ग है, जो व्याख्यान देता रहता है उसका कभी टेप रिकार्ड सुनने को मिलता है। वह कहता है हमको क्लेश क्यों सताते हैं ? हमारे ऊपर काम-क्रोध आक्रमण क्यों करते है ? हमको ये दुःख क्यों सताते हैं ? वह कहता है ये इसलिए सताते हैं कि हम स्वयं को यह नहीं मानते कि हम ब्रह्मस्वरूप हैं, आनन्दस्वरूप है। यह मानने के पश्चात् बेड़ा पार हो जाता है। यदि ऐसी स्थिति में जाते हैं तब आनन्द प्राप्त हो जाएगा। सारे क्लेश समाप्त हो जाएँगे। जब वह यह उपदेश देता है तो सुनने वाले कहते हैं, बहुत अच्छा बोल रहा है यह व्यक्ति। तो ऐसी-ऐसी कितनी धाराएँ सुनेंगे आप !

ये जो जैन मत वाले हैं, वे कहते हैं सुनो भाइयों ! सृष्टि बनी-बनाई चली आ रही है। इसका कोई कर्त्ता नहीं है। अच्छा ! तो कर्म का फल कैसे मिलता है ? वे कहते हैं कर्म का फल कर्म ही दे देता है। किसी ने शंका की कि जैसे चोर ने चोरी की, अब वह कर्म तो समाप्त हो गया, पुनः फल कैसे देगा ? चोर तो चोरी करके भाग गया। जो होनी थी, वह हो गई, वह कर्म का फल कैसे देगी? पुनः वे व्याख्या परिवर्तित करते हैं। कहते हैं – नहीं, वह जो चोरी का संस्कार पड़ा है, वह उसको फल देगा। शंका उठाने वाला कहता है – अच्छा ! यह बताओ, संस्कार चेतन तो है नहीं, पुनः चेतन न होने से मरने के पश्चात् उसको गधे, घोड़े की योनि में कैसे ले जाएगा ? उसको कैसे पता चलेगा कि वहाँ जाना है ? कोई उत्तर नहीं और हजारों, लाखों लोग लट्टू हैं ।

विपश्यना वाले को पूछो ही मत। वे तो इस विषय में सुनने को ही तैयार नहीं। उनसे कहो कि यह तो बता दो आत्मा-परमात्मा क्या है ? तो कहेंगे आत्मा-परमात्मा की बात अभी आप नहीं कर सकते। यह हमारा बहुत प्रारम्भिक विषय है। पहले इसको देखो कि दुःख कहाँ हो रहा है ? शरीर में यह देखो। कहाँ-कहाँ आपके शरीर में पीड़ा हो रही है। देखते रहो उसको। श्वास पर ध्यान दो, श्वास कहाँ चल रहा है ? मौन रहना घण्टों तक। घण्टों बैठाते हैं और लोगों को इतना भी नहीं बताते कि ईश्वर ऐसा है अथवा आत्मा ऐसा है। वहाँ वास्तविकता क्या है ? वे छल-कपट का प्रयोग करते हैं। वे ईश्वर को नहीं मानते पर यह नहीं बताते कि हम ईश्वर को नहीं मानते हैं। यदि वे ऐसा कहें तो भारत के जो लोग उनसे प्रभावित हैं, उनमें से उनके पास एक-दो व्यक्तियों का जाना भी कठिन हो जाएगा।

ऐसे छल-कपट चलता है। मौन बैठाएँगे लम्बे काल तक। बैठे हुए लोग कहते हैं बड़ा आनन्द आया। भला जब न किसी से बात करनी, न कोई विद्या पढ़नी और अकेले छ:छः घण्टे बैठेगा तो कुछ समय के लिए राग-द्वेष से बचेगा ही। उससे शान्ति मिलेगी। किसी प्रकार का कोई विचार ही नहीं करना। बस ! शान्ति से बैठे रहो। सोचना ही नहीं है किसी विषय को। ऐसे करते हुए उनको दिखता है कि न राग-द्वेष हैं, न संसार की बात है। न किसी से कहना और न ही किसी की सुनना। न कोई पाठ स्मरण करना। चुपचाप रहो तो और क्या होगा ? आनन्द आएगा। अनजाने लोगों को बड़ा अच्छा लगता है तो वे कहने लगते हैं बड़ी शान्ति मिलती अच्छा ! हाँ ! बहुत शान्ति मिलती है।

[स्रोत : बृहती ब्रह्ममेधा, द्वितीय भाग, पृष्ठ ५५५-६, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]

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