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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

क्रांतिकारी जतिंद्र नाथ दास की भूख हड़ताल का वह दिन

मित्रो ! भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के अनेकों ऐसे महान नक्षत्र हैं जिन्होंने अपनी दिव्य आभा से भारत के तत्कालीन नभमंडल को अपनी तेजोमयी ज्योति से ज्योतित कर अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान भी दिया । ऐसा ही एक नाम है जतिंद्रनाथ दास का, जिन्हें उनके साथी क्रांतिकारी ‘जतिन दा’ कहकर पुकारते थें। हमारे इस क्रंतिकारी नेता ने बहुत छोटी अवस्था में ही बलिदानी परंपरा का निर्वाह करते हुए अपना बलिदान दिया था । वे 16 वर्ष की अवस्था में ही बंगाल के क्रांतिकारी दल ‘अनुशीलन समिति’ में सम्मिलित हो गये थे।

उनका जन्म कोलकाता के एक साधारण बंगाली परिवार में 27 अक्टूबर 1904 को हुआ । महात्मा गाधी के असहयोग आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। कलकत्ता के विद्यासागर कॉलेज में पढ़ने वाले जतिंद्र को विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते हुए गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 6 महीने की सजा हुई। शीघ्र ही जतिन्द्रनाथ प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सचिन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए। जिसके बाद वे क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएश्न’ के सदस्य बन गये।

1925 में अंग्रेजों ने उन्हें ‘दक्षिणेश्वर बम कांड’ और ‘काकोरी कांड’ के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया। जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे बुरे व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। जब जतींद्रनाथ की बिगड़ने लगी तो अंग्रेज सरकार ने डरकर 21 दिन बाद उन्हें रिहा कर दिया।

उन्होंने सचिंद्रनाथ सान्याल से बम बनाना सिखा और क्रांतिकारियों के लिए बम बनाने लगे। उन्होंने हर स्थिति में भगत सिंह का साथ दिया। भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद लाहौर षडयंत्र केस में जतिंद्र को भी अन्य लोगों के साथ पकड़ लिया गया।

उन दिनों जेल में भारतीय राजनैतिक कैदियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। इसके विरोध में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त आदि ने लाहौर के केन्द्रीय कारागार में भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी। जब इन अनशनकारियों की स्थिति बिगड़ने लगी, तो इनके समर्थन में अन्य कई क्रांतिकारियों ने भी अनशन प्रारम्भ करने का विचार किया।

फिर सब ने जतिंद्र को भी हड़ताल में शामिल होने के लिए कहा, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि मैं अनशन तभी करूंगा, जब मुझे कोई इससे पीछे हटने को नहीं कहेगा। मेरे अनशन का अर्थ है, ‘जीत या फिर मौत!’

जतिंद्र नाथ के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन प्रारम्भ कर दिया। उनके अनशन की अवधि जैसे-जैसे बढ़ती जाती थी वैसे वैसे ही अंग्रेज अधिकारी उनकी भूख हड़ताल को तुड़वाने के प्रयास करते जा रहे थे । उन्हें खुश करने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय कैदियों को अच्छा भोजन भी देना आरंभ कर दिया और उनके साथ अच्छा व्यवहार भी करने लगे , परंतु इसके उपरांत भी जितेंद्र अपनी अपनी भूख हड़ताल को तोड़ने को तैयार नहीं थे ।

उनकी भूख हड़ताल को तुड़वाने के सारे प्रयास व्यर्थ ही गए ।

जेल प्रशासन ने उनके छोटे भाई किरणचंद्र दास को उनकी देखरेख के लिए बुला लिया; पर जतिंद्रनाथ दास ने उसे इसी शर्त पर अपने साथ रहने की अनुमति दी कि वह उनके संकल्प के बीच नही आएगा।

हड़ताल का 63वां दिन था। बताया जाता है कि उस दिन उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज था। उन्होंने सभी साथियों को साथ में बैठकर गीत गाने के लिए कहा। अपने छोटे भाई को पास में बिठाकर खूब लाड़ किया। उनके एक साथी विजय सिन्हा ने उन का प्रिय गीत ‘एकला चलो रे’ और फिर ‘वन्दे मातरम्’ गाया।

यह गीत पूरा होते ही जतिंद्र ने इस संसार से विदा ले ली। वह दिन था 13 सितंबर 1929 और सिर्फ 24 साल की उम्र में भारत माँ का यह सच्चा सपूत अपने देश के लिए बलिदान हो गया। सुभाष चंद्र बोस ने उनकी मृत्यु के उपरांत उन्हें भारत का युवा दधीचि कहकर सम्मानित किया था।

महान क्रन्तिकारी दुर्गा भाभी ने जेल से बाहर आने के बाद जतिंद्र की शव-यात्रा का नेतृत्व किया। हर एक स्टेशन पर ट्रेन रोकी गयी। यहाँ लोगों ने जुलुस निकाला और इस सच्चे सेनानी के दर्शन किये।

सचमुच मेरी मां (भारती )शेरांवाली है।
मेरी मां के शेरों की शान निराली है ।।

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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