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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

शिवाजी महाराज का मुगलों से पहला युद्ध

जिस समय दक्षिण भारत में शिवाजी महाराज का उदय हो रहा था , उस समय उत्तर भारत में मुगल सत्ता दिल्ली पर अपना अधिकार किए हुए थी । वैसे तो मुगलों के प्रत्येक शासक या बादशाह ने हिंदुओं के प्रति निर्दयता और निर्ममता का प्रदर्शन करने वाली नीतियों का अनुगमन किया , परंतु शिवाजी के समकालीन औरंगजेब की नीतियां तो अत्यंत निर्दयता पर आधारित थीं । इतिहास में औरंगजेब अपनी क्रूरता , निर्ममता , असहिष्णुता और सांप्रदायिक नीतियों के लिए जाना जाने वाला बादशाह है । उसके शासनकाल में उसके हिंदू दमनकारी शासन का विरोध करने के लिए दक्षिण से शिवाजी का उठना न केवल भारत के दीर्घकालीन स्वाधीनता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटना है , अपितु शिवाजी के भीतर छिपे एक महान देशभक्त और क्रूर शासक से टकराने की उनकी साहस भरी नीति का भी परिचायक है। औरंगजेब या उसके पूर्वज इस देश को अपना देश न मानकर और इस देश के निवासियों को अपनी प्रजा न मानकर अपना अत्याचारपूर्ण शासन कर रहे थे । उस अत्याचारपूर्ण शासन को चुनौती देना किसी शिवाजी के ही वश की बात थी । इस असंभव कार्य को शिवाजी जिस प्रकार पूरा कर रहे थे , उसे उसी रूप में इतिहास में सम्मानित किया जाना अपेक्षित है । जिस शासक को उस समय चुनौती देना हर किसी के वश की बात नहीं थी , उस असंभव को संभव करने वाले शिवाजी थे । इतिहास में उन्हें इसी रूप में सम्मान मिलना चाहिए।
मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के पश्चात दक्षिण भारत की ओर गया ।उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही ज्ञात था कि वह हिंदू राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में दक्षिण भारत में शक्ति संचय कर अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे हैं । अतः शिवाजी पर नियंत्रण रखने के लिए औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था । वर्तमान प्रचलित इतिहास लेखकों के माध्यम से हमें पता चलता है कि शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने 3 वर्ष तक वहां लूटपाट की ।इस प्रकार की मुस्लिम शासकों की लूटपाट को हमारे इतिहासकार उस समय की एक सामान्य घटना मानकर उपेक्षित करने का अक्षम्य कार्य करते हैं , जबकि वास्तव में अपने देशवासियों के साथ होने वाली इस लूटपाट और मारकाट ने ही हमारे अनेकों शिवाज़ियों का अलग – अलग समय पर निर्माण किया। दूसरी बात यहां पर यह भी समझने की है कि यदि लूटपाट एक अनैतिक कार्य था तो उसे समाप्त करना हमारे देश के लोगों का मौलिक अधिकार था । अपने इस मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए भारत के लोग शिवाजी जैसे साहसी नेतृत्व के साथ उठ रहे थे तो यह उनका स्वराष्ट्रवाद था , स्वराज्यवाद था , स्वदेशीवाद था । भारतीय इतिहास का यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि यहां के स्वराष्ट्रवाद ,स्वराज्यवाद और स्वदेशीवाद को प्रारंभ से ही विदेशी सत्ताधीशों ने एक अपराध के रूप में परिभाषित किया । जिसे इतिहासकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से मान्यता प्रदान की । यही कारण रहा कि शिवाजी जैसे महानायक का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान समाप्त करने का हर संभव प्रयास किया गया । जबकि मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष किए जाने की राष्ट्रीय भावना को राष्ट्रधर्म के साथ या राष्ट्रभक्ति के साथ जोड़कर देखना इतिहासकार का कार्य होता है । इस कसौटी पर यदि शिवाजी और शिवाजी जैसे भारत के अनेकों स्वतंत्रता सेनानियों को कसकर देखा जाएगा तो पता चलता है कि उनका कार्य वंदनीय था , क्योंकि वह जनता को लूटपाट और मारकाट करने वाली राज्यसत्ता से मुक्त कर देना चाहते थे।
शाइस्ता खान को औरंगजेब ने शिवाजी के सर्वनाश के लिए भेजा था । औरंगजेब के लिए शिवाजी आंख की किरकिरी बन चुके थे । वह नहीं चाहता था कि शिवाजी नाम का कोई व्यक्ति उसे इस भूमंडल पर भी कहीं दिखाई दे । वह शिवाजी को ‘ पहाड़ी चूहा ‘ कहा करता था । अतः वह इस चूहे को पकड़ कर समाप्त करने की किसी भी सीमा को पार कर सकता था । शिवाजी यह भली प्रकार जानते थे कि उनका सामना किस क्रूर तानाशाही से है ? – अतः वह भी अपने स्तर पर औरंगजेब और उसके लोगों की हर चाल से सावधान रहने का प्रयास निरंतर करते रहे । 
औरंगजेब को उसकी योजना में असफल करने के लिए एक बार शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ शाइस्ता खान और उसकी सेना पर हमला कर दिया था , तब शाइस्ता खान अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ । इतना ही नहीं शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 4 उँगलियाँ भी खोनी पड़ी । इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया था । उसके बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया था ।

सूरत की लूट :

औरंगजेब को उस समय आंखें दिखाना हर किसी के बस की बात नहीं थी । उसके मामा और सेनापति शाइस्ता खान को जब शिवाजी महाराज ने निर्णायक रूप से पराजित किया तो इस जीत से शिवाजी की शक्ति और भी अधिक सुदृढ़ हो गयी थी । परंतु शाइस्ता खान भी अपने स्वामी और बादशाह औरंगजेब की दृष्टि में अपना सम्मान बनाए रखना चाहता था । अतः वह भी नहीं चाहता था कि वह दक्षिण से इस ‘पहाड़ी चूहे ‘ से पराजित होकर लौटे । वह जानता था कि यदि वह पराजित होकर लौटता है तो उसका भांजा और हिंदुस्तान का बादशाह औरंगजेब उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा ? 
अपनी इसी मानसिकता के वशीभूत होकर 6 वर्ष पश्चात शाइस्ताखान ने अपने 15,000 सैनिकों के साथ मिलकर छत्रपति शिवाजी के कई क्षेत्रों को जला कर नष्ट कर दिया था । शिवाजी ने जब शाइस्ता खान के इस दुस्साहस को देखा तो उन्हें भी यह सहन नहीं हुआ । शिवाजी ‘ जैसे को तैसा ‘ की नीति में विश्वास रखते थे । वह जानते थे कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने से ही दुष्ट की दुष्टता समाप्त की जा सकती है , या उसका सही प्रतिशोध उससे लिया जा सकता है ।अतः शाइस्ता खान को उसके दुस्साहस का पाठ पढ़ाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस भारी विनाश की क्षतिपूर्ति के लिए मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट आरंभ कर दी । सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था । शिवाजी ने 4 हजार सैनिकों के साथ सूरत के व्यापारियों को लूटा । उन्होंने शाइस्ता खान को बता दिया कि हिंदुस्तान में शिवाजी जैसी शक्ति के बौद्धिक चातुर्य और कूटनीतिक दांव पेंच से वह बच नहीं सकता । शिवाजी शाइस्ता खान के दुस्साहस का सही प्रतिशोध लेना जानता है और यदि उसने भविष्य में फिर ऐसी मूर्खता की तो उसे भविष्य में भी इसका सही प्रति उत्तर दिया जाएगा। मुगलों और तुर्कों का यह इतिहास रहा है कि वह जब – जब भी भारत के किसी भी कोने में हमला के लिए पहुंचे तो उन्होंने लूटपाट के पश्चात जनसंहार के भी आदेश दिए । परंतु सूरत की लूट में छत्रपति शिवाजी महाराज ने ऐसा नहीं किया , क्योंकि वह जिस परंपरा में पले और ढले थे , उसमें जनसंहार को महापाप माना जाता था । शिवाजी के इस महागुण को इतिहास में सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। भारतीयता को सम्मानित करने और भारतीय इतिहास परंपराओं को सही संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए ऐसा किया जाना नितांत आवश्यक है। शिवाजी ने सूरत को लूटा , लेकिन उन्होंने उन ठिकानों पर ही अपनी लूट को केंद्रित रखा , जहां लूटने से शाइस्ता खान को कष्ट हो सकता था या उसे नष्ट करने में उन्हें सहायता मिल सकती थी । उन्होंने जनसाधारण के साथ किसी भी प्रकार का कोई दुर्व्यवहार नहीं किया । 

आगरा में आमन्त्रित और पलायन :

औरंगजेब चाहता था कि शिवाजी को किसी भी प्रकार से गिरफ्तार कर लिया जाए । वह अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भांति – भांति के षड्यंत्र रच रहा था । इसके लिए उसने अपने कई व्यक्तियों की नियुक्ति विशेष रूप से कर दी थी । वह किसी भी प्रकार से शिवाजी को अपने दरबार में उपस्थित हुआ देखना चाहता था । अतः उसकी ओर से शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया । औरंगजेब एक षड्यंत्र के अंतर्गत अपने महान शत्रु शिवाजी को अपने दरबार में एक हिंदू राजा जयसिंह की ‘ जयचंदी ‘ सोच का लाभ उठाकर उपस्थित करने में सफल हो गया । 
शिवाजी को औरंगजेब के दरबार में लाने वाला जय सिंह ही था । उसने शिवाजी का विश्वास जीता और उन्हें अपना बनाकर औरंगजेब से मिलाने की योजना समझायी । शिवाजी अपने किलेदारों को सतर्क कर और अपनी माता जीजाबाई को अपने प्रशासन की बागडोर सौंपकर आगरा के लिए जयसिंह के साथ चलने पर सहमत हो गए । माता जीजाबाई की सहायता के लिए शिवाजी ने पेशवा मोरोपंत पिंगले और सेनापति प्रतापराव गुर्जर को नियुक्त कर दिया था । शिवाजी को औरंगजेब के दरबार में ले जाते हुए अपने इस कृत्य पर जय सिंह का हृदय तो कांपता था , पर उसका मन उसे साहस बंधाता और वह शिवाजी को निरंतर मिथ्या भाषण करके भ्रमित करता जाता कि आगरा में उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाएगा । 
11 मई 1666 को जब शिवाजी औरंगजेब के दरबार में पहुंचे तो उनकी अगवानी के लिए कुमार रामसिंह और फिदाई खान को औरंगजेब की ओर से लगाया गया । मुख्य द्वार पर कुमार रामसिंह और गिरधारी लाल उन्हें लेने के लिए पहुंचे । स्वागत सत्कार के पश्चात शिवाजी महाराज अपने लिए बनाए गए एक विशेष कक्ष में चले गए । अगले दिन उन्हें दरबार में उपस्थित होने के लिए कहा गया। 
एक वर्णन के अनुसार उस दिन शहंशाह औरंगजेब का जन्म दिन था और उस दिन मुगल दरबार में उत्सव के पान बांटे जा रहे थे – सरदारों उमरावों में । शिवाजी को भी एक पान दिया गया । शहजादा ,राजाओं , सरदारों को खिलअत बांटी गई । इस पर शिवाजी दुखी और बहुत नाराज हो गए । उनकी आंखों में आंसू आ गए । शहंशाह ने यह देखकर कुमार से कहा — शिवा से पूछो उसे क्या तकलीफ है ? 
शिवाजी ने कहा — तुम देख रहे हो , तुम्हारे बाप ने देखा है, तुम्हारे बादशाह ने देखा है । मैं किस प्रकार का आदमी हूं और फिर भी तुमने जानबूझकर मुझे इतनी देर खड़े रखा । मैं तुम्हारी मनसब छोड़ता हूं । मुझे खड़ा ही रखना था तो सही सम्मानपूर्ण स्थान पर खड़ा करना चाहिए था । यह कहकर शिवाजी ने पीठ फेरी और अपनी जगह से सरदारों की पंक्ति में जाने लगे । तब कुमार ने उनका हाथ पकड़ लिया । शिवाजी ने उसे झटक दिया और एक ओर जाकर बैठ गए । कुमार उनके पीछे पीछे आए और उन्होंने शिवाजी को समझाने का प्रयास किया , पर शिवाजी ने उसकी एक न मानी । औरंगजेब शिवाजी महाराज को राजा या उसके समकक्ष मानने को तैयार नहीं था । यही कारण रहा कि उसने शिवाजी को अपने दरबार में बैठने का उचित स्थान भी नहीं दिया । अपने साथ हुए इस अपमान को देखकर शिवाजी भांप गए कि वह गलत स्थान पर आ गए हैं । उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया है । शिवाजी अपने साथ हुए इस दुर्व्यवहार को देखकर आगबबूला हो उठे । इसके विरुद्ध उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया । औरंगजेब इसी अवसर की प्रतीक्षा में था । वह चाहता था कि किसी प्रकार शिवाजी कोई ऐसा कार्य कर बैठे जिससे उन्हें गिरफ्तार करने का उसे अवसर उपलब्ध हो जाए । अतः औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया और शिवाजी पर 500 सैनिकों का पहरा लगा दिया । अब भारत के पौरुष ,वीरता और साहस का प्रतीक शिवाजी नाम का यह योद्धा तत्कालीन क्रूर तानाशाही की जेल में बंद था । क्रूर तानाशाही सोच रही थी कि इस महायोद्धा को जेल में बंद कर वह इसकी वीरता और साहस को प्रतिबंधित कर अब भारत पर निष्कंटक हो शासन करेगी , परंतु नियति कुछ और ही कराना चाहती थी । फलस्वरूप शिवाजी इस विपरीत परिस्थिति में घबराए नहीं , अपितु वह अपने कुछ अज्ञात मित्रों के सहयोग से औरंगजेब की जेल से निकलने की युक्तियां बनाने लगे । कुछ ही दिनों बाद 1666 को शिवाजी महाराज को जान से मारने का औरंगजेब ने इरादा बनाया था । लेकिन अपने बेजोड़ साहस और युक्ति के साथ शिवाजी और संभाजी दोनों कैद से भागने में सफल हो गये ।यह उनका बौद्धिक चातुर्य ,आत्मविश्वास और उनके भीतर भरे साहस का ही प्रतिफल था कि वह औरंगजेब जैसे अत्याचारी और क्रूर बादशाह की जेल से मुक्त हो कर भागने में सफल हो गए । बादशाह औरंगजेब को शिवाजी महाराज के बौद्धिक चातुर्य के सामने झुकना पड़ा और वह बहुत काल पश्चात तक भी यह समझ नहीं पाया था कि अंततः शिवाजी उसके जेल से भागने में सफल कैसे हुए ,? 
औरंगजेब की जेल से सफलतापूर्वक भाग निकलने के पश्चात छत्रपति शिवाजी महाराज ने संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ दिया था । स्वयं शिवाजी महाराज बनारस चले गये थे और बाद में सकुशल राजगढ आ गये । शिवाजी महाराज को जेल से भगाने में औरंगजेब ने जयसिंह पर संदेह व्यक्त किया और उसने विष देकर उसकी हत्या करा दी । जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद शिवाजी ने मुगलों से दूसरी बार संधि की । 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा था, यहाँ से शिवाजी को 132 लाख की संपति हाथ लगी और शिवाजी ने मुगलों को सूरत में फिर से हराया था ।

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक :

सन 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरंदर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे । अब शिवाजी स्वयं को विधिवत राजा घोषित करने की योजना पर विचार करने लगे । यह अब उनके लिए उचित भी था। उन्होंने पिछले कई वर्षों से जो संघर्ष मां भारती की सेवा के लिए किया था उसका उचित पुरस्कार उन्हें मिलना ही चाहिए था । वह अब राजा बनने की सारी योग्यताओं को पूर्ण कर रहे थे । अतः उन्होंने एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन अपने राज्याभिषेक के लिए कराने की तैयारियां करनी आरंभ कीं। बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से मिलते हुए प्रमाण भेजे थे । इस कार्यक्रम में विदेशी व्यापारियों और विभिन्न राज्यों के राजदूतों को भी बुलाया गया था । शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की और काशी के पंडित भट्ट को इस समारोह में विशेष रूप से बुलाया गया था । शिवाजी के राज्याभिषेक करने के 12 वें दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया था और फिर दूसरा राज्याभिषेक हुआ ।
कुछ लोगों ने यहां पर शिवाजी महाराज की जाति का प्रश्न उठाया है और यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि उनकी जाति क्षत्रिय नहीं थी , या वह किसी क्षत्रिय कुल या राजवंश से संबंध नहीं रखते थे , इसलिए उनका राज्याभिषेक नहीं हो सकता था । जो लोग ऐसा प्रश्न उठाते हैं या करते हैं उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि भारतवर्ष में वैदिक राज्य व्यवस्था के अंतर्गत किसी भी राजा की जाति कभी नहीं पूछी गई । यहां पर केवल वर्ण देखा गया और क्षत्रियोचित गुणों के किसी भी व्यक्ति को राजा बनने के लिए सुपात्र माना गया शिवाजी महाराज क्षत्रियोचित्र गुणों से भरे हुए थे ।
अतः उनके राजा होने पर कोई प्रश्न नहीं कर सकता था, यद्यपि उस समय कुछ लोगों ने ऐसे प्रश्न किए हैं। हम इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं ,परंतु यह प्रश्न करना भारतीय वैदिक संस्कृति का विकृतिकरण था ।इसे संस्कृतिबोध नहीं कहा जा सकता । भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में ऐसा प्रश्न निरर्थक ही माना जाएगा । दूसरी बात यह है कि जो लोग छत्रपति शिवाजी महाराज की जाति के प्रश्न को कहीं अधिक गंभीर मानते हैं ,और इसी आधार पर उन्हें अभी तक राजा न मानने का प्रमाण पत्र लिए घूम रहे हैं । उनसे हम यह भी पूछ सकते हैं कि जिन विदेशी आतंकवादी हमलावर लोगों के वह गुणगान करते हैं , वह कौन सी जाति के थे और कौन से राजघराने के थे ?- उनमें से कई ऐसे थे जो डाकू दल के नेता के रूप में भारत में घुसे और यहीं पर उन्होंने छोटा-मोटा अपना राज्य खड़ा कर स्वयं को नवाब ,सुल्तान या बादशाह घोषित कर दिया । यदि वे अपने बाहुबल और तथाकथित क्षत्रियबल से साम्राज्य खड़ा करने की योग्यता रखते थे तो शिवाजी महाराज ऐसी योग्यता के पात्र क्यों नहीं ? अतः हमारा मानना है कि शिवाजी महाराज के बारे में उनकी जाति के संबंध में कोई प्रश्न करना भारतीय इतिहासकारों को शोभा नहीं देता ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है .)

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