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बिखरे मोती

ऐ खुदा ! मैं इस काबिल तो नहीं,

‘ विशेष ‘ जब तुम्हें किसी सभा में सम्मानित किया जाय तो कृतज्ञता इस प्रकार ज्ञापित करें :-

ऐ खुदा !
मैं इस काबिल तो नहीं,
कि कोई दिल से नवाजे मुझे,
लगता है तोफ़ा भेजा है तूने ,
यही सोचकर
नज़रें मैंने झुका दीं।
ऐ वाहिद!
तू इतना बता मुझे,
तुझे मेरी खूबी किसने बता दी?॥2663॥
वाहिद- साधक

‘विशेष शेर ‘संसार के स्वभाव के संदर्भ में :-

तुमने किताबों से सीख है,
हमने हालातों से सीखा है।
दुनियाँ में खुदा का नाम सच्चा है,
बाकी तो धोखा ही धोखा है॥2664 ॥

‘विशेष शेर’ विषमताओं की भट्टी में जब नक जीवन तपता नहीं, तक तक मनुष्य का व्यक्तित्त्वा निखरता नहीं है:-

युवाओं में ताकत तो होती है,
मगर तजुर्बा नहीं होता।
जब तक सोना तपता नहीं,
कुन्दन नहीं होता॥2665॥

पूजा अथवा कोई पुणे का कार्य करने की उर्मियाँ यदि मन में हिलोरें मारने लगे, तो उन्हें प्रभु की प्रेरणा समझो..

             'दोहा '

हरि-नाम की उर्मियाँ,
चित में मारें हिलोर ।
प्रेरक की ये प्रेरणा,
चलो प्रभु की ओर॥2666॥

‘विशेष शेर’ अनन्त कामनाओं के
संदर्भ में : :-

खूब तरसाया है
तेरी ख्वाइशों ने ही तुझे । अब तू भी इन ख्वाहिशों को तरसती छोड़ दे॥2667॥

एक उर्दू शायर

‘विशेष ‘ ईश्वर का दीदार चर्म-चक्षुओं से नहीं अपितु दिव्य-दृष्टि से होता है: –

दिव्य- दृष्टि से दिखे,
भगवन तेरा स्वरूप ।
तुरिया में जब मन टिकै,
साधक हो तद् रूप॥2668॥

‘ विशेष ‘ ईश- कृपा से ही ईश का दीदार होता है:-

यज्ञ दान तप वेद से,
दिखै न सृजन हार।
ईश कृपा से ईश का,
होता है. दीदार॥2669॥

तत्वार्थ:- भाव यह है कि यज्ञ, , तथा महान कार्य करने से तथा वेदो के निरंतर अध्य्यन करने से परमपिता परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता बेरे वरन् प्रभु की कृपा से ही प्रभुका दीदार होता है ।अतः प्रभु का दीदार
करना है तो उसके कृपा पात्र बनो।
तृष्णा के संदर्भ में ‘शेर’

जिन्दगी में दो मसले,
कभी हल न हुए।
न नींद ही पूरी हुई,
न ख्वाब ही मुकम्मल हुए॥2670॥
‘अनजान’

माँ की मुराद के संदर्भ में ‘शेर’

ए पूनम के चाँद !
आज तेरा यौवन शरूर पर है,
मेरा भी चाँद जवां हो गया है,
अब मैं भी उसका ब्याह रचांऊंगी ।
है प्रभु ! वह घड़ी वेग भेज दें,
मैं भी बनने के गीत गाँऊगी2671॥

आत्मस्वरूप के संदर्भ में ‘शेर’

ऐ बशर !
वृद्ध होना तो मजबूरी है,
मगर आत्मज्ञान होना,
तो निहायत जरूरी है॥2672॥

*न चेद वेदी महती विनस्टी अर्थात् जिसने परमपिता परमात्मा अथवा अपने आत्म स्वरूप को नहीं जाना उसने मनुष्य जीवन को पाकर स्वयं की बहुत बड़ी हानी की है।
क्रमशः

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