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अयोध्या में बीजेपी का हारना: एक विश्लेषण

आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी

कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है, लेकिन दिल्ली के रास्ते में पी एम श्री नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ा अवरोध लखनऊ बन गया । इस बार के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को उत्तर प्रदेश में करारी हार का सामना करना पड़ा है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने 2024 के आम चुनाव में अयोध्या में अपनी पकड़ कायम ना रख सकी। जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी टाट – पट्टी में रहते थे तो बीजेपी अयोध्या में राम की गरिमा मय देवत्थान बनाने के संकल्प को लेकर दो सदस्य संख्या को बढ़ाते- बढ़ाते कई बार प्रदेश और केंद्र में अपना बहुमत बना कुशल पूर्वक सरकार चलाई थी। वर्तमान में माननीय श्री नरेंद्र मोदी जैसे कुशल प्रधान मंत्री और माननीय श्री योगी आदित्यनाथ जी जैसे मुख्य मंत्री को जनता की सेवा का अवसर पाने में अयोध्या की पुनर्स्थापना में महत्व पूर्ण भूमिका रही। देश प्रदेश तथा अंतराष्ट्रीय जगत में इस प्रकरण को बहुत ही अहमियत मिली, परन्तु 2024 के आम चुनाव में भाजपा ने अपनी स्थिति बरकरार बनाए रखने में विफल रही । उत्तर प्रदेश की सबसे हॉट सीट बनी फैजाबाद-अयोध्या लोकसभा सीट तथा उससे लगे हुए अंबेडकर नगर,बस्ती ,खलीलाबाद सुलतानपुर अमेठी रायबरेली,गोंडा वा कैसरगंज आदि
पर भी भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। यूपी के सियासी मैदान में अखिलेश यादव और राहुल गांधी एक साथ आए । एक बार पहले भी आए थे तब ये कामयाब नही हो सके थे लेकिन इस बार की अपने मकसद में कामयाब होते देखे जा रहे हैं। भाजपा पिछले एक दशक में सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। इस सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद विजय प्राप्त कर चुके हैं। इसके कारणों और परिस्थितियों पर एक बार विहंगम दृष्टि डालना अनुचित ना होगा।

चुनाव हारने के प्रमुख कारण:-

1.माननीय प्रधान मंत्री और मुख्यमंत्री की अतिसक्रियता:-
जब देश और प्रदेश के मुखिया जहां ज्यादा सक्रिय रहेंगे वहां स्थानीय सांसद और विधायक की पकड़ ढीली हो जायेगी।वह लोगों में अपनी इमेज नही बना पाएगा। वह आम जनता से दूर होता जायेगा। इस कारण एसटी स्थानीय सांसद और विधायक अपना कर्तव्य बखूबी से निभाने में विफल रहे।
2. पुराने जन प्रतिनिधियों का सहयोग ना ले पाना :-
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अयोध्या आंदोलन के प्रणेता माननीय आडवाणी जी,विनय कटियार जी, उमा भारती जी ,रितंभरा जी,मुरली मनोहर जोशी जी, कल्याण सिंह जी आदि का सहयोग नहीं लिया गया। सब कोई प्रधान मंत्री और मुख्यमंत्री की सक्रियता के कारण अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन ना कर सके।
3. विकास योजनाएं जनता को पसन्द नहीं :-
अयोध्या में रामलला मंदिर के निर्माण के साथ करोड़ों की विकास योजनाओं को पूरा कराया गया। पिछले दिनों पीएम मोदी ने 15,700 करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास-लोकार्पण किया था। अयोध्या में भव्य रेलवे स्टेशन का पुननिर्माण किया गया है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्‌डा का विकास किया गया ।अयोध्या रामलला मंदिर के साथ-साथ सड़कों से लेकर गलियों तक को दुरुस्त किया गया।अयोध्या में विकास करना कोई काम नहीं आया। अयोध्या में 2017 के बाद से हर साल दिवाली पर दीपोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रकार के आयोजनों का भी प्रभाव नहीं दिखा। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया। इसके बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त 2020 को रामलला के मंदिर की आधारशिला रखने अयोध्या आए। कोरोना के खतरे के बीच रामलला का मुद्दा देश भर में गरमाया। 22 जनवरी को इस साल रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। इस समारोह में भाग लेने पीएम नरेंद्र मोदी पहुंचे थे। उनके साथ-साथ देश भर से विशिष्ट लोगों का यहां आगमन हुआ। ये सब जन आयोजन ना होकर सरकारी आयोजन बन गए।
4. राम लहर काम ना आई :-
राम मंदिर का मुद्दा वैसे तो पूरे देश के लिए अहम था, लेकिन उत्तर प्रदेश के लिहाज से कुछ सीटों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव था। अब फैजाबाद सीट तो केंद्र में थी ही, इसके अलावा गोंडा, कैसरगंज, सुल्तानपुर, अंबेडकरनगर,बस्ती सीट पर भी राम मंदिर का काफी प्रभाव था। यह सारी सीटें फैजाबाद के आसापास ही पड़ती हैं, ऐसे में माना जा रहा था यहां से बीजेपी को ज्यादा चुनौती नहीं रही। इस क्षेत्र के चुनावी नतीजों ने सभी को हैरान कर दिया है। जिस अयोध्या को लगातार राम नगरी कहकर संबोधित किया गया, जहां पर सबसे ज्यादा बीजेपी ने राम के नाम पर वोट मांगा, उसी सीट को
राम विरोधी समाजवादी पार्टी ने हथिया लिया है।
5. ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा , फोकस सिर्फ अयोध्या धाम पर :-
बीजेपी ने अयोध्या धाम के विकास पर सबसे ज्यादा फोकस किया।सोशल मीडिया से लेकर चुनाव-प्रचार में अयोध्या धाम में हुए विकास कार्यों को बताया गया लेकिन बीजेपी ने अयोध्या के ग्रामीण क्षेत्रों पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अयोध्या धाम से अलग ग्रामीण क्षेत्र की तस्वीर बिल्कुल अलग रही। ग्रामीणों ने इसी आक्रोश के चलते बीजेपी के पक्ष में मतदान नहीं किया।
6.जमीनों का अधिग्रहण :-
अयोध्या में रामपथ के निर्माण के लिए जमीन का अधिग्रहण किया गया। कई लोगों के घर-दुकान तोड़े गए। निराशाजनक पहलू यह रहा कि कई लोगों को मुआवजा नहीं मिला। इसकी नाराजगी चुनाव परिणाम में साफ नजर आ रही है। कुछ ऐसी ही स्थिति चौदह कोसी परिक्रमा मार्ग के चौड़ीकरण में भी देखने को मिली। बड़ी संख्या में घर- दुकान तोड़े गए लेकिन प्रभावितों को उचित नहीं मिला।
7. प्रत्याशी को एंटी इन्कंबैंसी का असर :-
निवर्तमान सांसद श्री लल्लू सिंह के खिलाफ क्षेत्र में एंटी इन्कंबैंसी थी। लोगों की नाराजगी उनके क्षेत्र में मौजूदगी को लेकर थी। उम्मीदवार से लोगों की नाराजगी उन्हें ले डूबी। उम्मीदवार के प्रति यह गुस्सा लोगों के भीतर बदलाव के रूप में उभरने लगा। वे प्रधान मंत्री मुख्य मंत्री और बड़े बड़े मठों से तो जुड़े पर छोटे तपकों से दूर होते गए।
स्थानीय प्रत्याशी लल्लू सिंह के प्रति लोगो की बहुत नाराजगी रही। बीजेपी हाई कमान ने सांसद लल्लू सिंह पर भरोसा जताते हुए तीसरी बार चुनावी मैदान में उतारा था। यह निर्णय लोगों को अनुकूल ना लगा। भाजपा उम्मीदवार लगातार 10 साल से सांसद थे। उनको बदले जाने का दबाव स्थानीय स्तर के नेताओं की ओर से भी बनाया जा रहा था। इसके बाद भी भाजपा ने इस पर ध्यान नहीं दिया। नया चेहरा ना उतरना ही बीजेपी को यहां भारी पड़ गया। लल्लू सिंह के खिलाफ स्थानीय लोगों को नाराजगी का अंदाजा पार्टी नहीं लगा पाई. नतीजतन बीजेपी को प्रतिष्ठित सीट गंवानी पड़ी। लल्लू सिंह ने चुनाव-प्रचार के दौरान संविधान बदलने का बयान भी दिया था।बयान पर काफी हो-हल्ला मचा था।
8.आवारा पशु को लेकर नाराजगी : –
अयोध्या के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान आवारा पशुओं से खासे परेशान रहे हैं। सरकार ने गोशाला जरूर बनाई हैं लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाल पाई है। आवारा पशुओं के मुद्दे को समाजवादी पार्टी ने मुद्दा बनाया था।
बीजेपी को इस मुद्दे पर नाराजगी झेलनी पड़ी और हार का दंश झेलना पड़ा।
9.जनरल सीट पर दलित उम्मीदवार उतरना :-
जातीय समीकरण को साधने में भाजपा सफल नहीं हो पाई। अखिलेश यादव इस सीट पर पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक यानी पीडीए को एकजुट करने में सफल हो गए। यह भाजपा की हार का कारण बन गई। समाजवादी पार्टी ने एक बड़ा प्रयोग करते हुए मंदिरों के इस शहर से एक दलित को उम्मीदवार बनाया था।उसकी यह रणनीति काम कर गई ।
10.जातिगत समीकरण हावी :-
अयोध्या के जानकारों के मुताबिक जातिगत समीकरण और अयोध्या के विकास के लिए जमीनों का अधिग्रहण को लेकर जनता में जबरदस्त नाराजगी है। इसके साथ ही कांग्रेस का आरक्षण और संविधान का मुद्दा काम कर गया।लल्लू यादव का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो संविधान में बदलाव के लिए बीजेपी को 400 से अधिक सीटें जिताने की बात कर रहे थे। वहीं बसपा का कमजोर होना भी सपा की बढ़त में बड़ा काम किया।
11.मुस्लिम वोटरो की एकजुटता
कांग्रेस-सपा के जिस गठबंधन को 2017 में नहीं चल पाया था, वह गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में जमकर वोट बटोरे हैं. उत्तर प्रदेश के जानकारों के मुताबिक इस चुनाव में मुस्लिम वोट ने एकजुट होकर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया. संविधान और आरक्षण बचाने के मुद्दे को हवा देकर इंडिया गठबंधन ने बीजेपी के कोर हिंदू वोट बैंक को भी बांट दिया। विपक्ष के इस नैरेटिव ने बड़ी संख्या दलितो, पिछड़ों और आदिवासियों को बीजेपी से दूर किया.महंगाई और बेरोजगार के मुद्दे ने भी का मुद्दा भी काम करता दिखा।
12.बड़े शीर्षस्थ नेताओं के कारण ओवर कॉफिडेंस:-
भाजपा यहां पर ओवर कॉन्फिडेंस का शिकार हो गई। बीजेपी ने माना कि उम्मीदवार के चेहरे की जगह अयोध्या में पीएम मोदी का चेहरा चलेगा। यह सफल नहीं हो पाया।
13. स्थानीय सांसद द्वारा जमीन का खरीद फरोख्त:-
स्थानीय प्रत्याशी श्री लल्लू सिंह पर क्षेत्र में जमीन खरीद और फिर उसे ऊंचे दामों में बेचने का आरोप लगा हुआ है।
श्रीराम मंदिर पर फैसले के बाद जमीन खरीद-बिक्री का मामला जोर-शोर से उठा था। इस पर बड़ा जोर दिया गया।
इससे श्री सिंह की छवि धूमिल हुई और उन्हें कम वोट मिले।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

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