ओ३म् “धर्म का सत्यस्वरूप एवं मनुष्यों के लिये धर्म पालन का महत्व”

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संसार में धर्म एवं इसके लिये मत शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। यदि प्रश्न किया जाये कि संसार में कितने धर्म हैं तो इसका एक ही उत्तर मिलता है कि संसार में धर्म एक ही है तथा मत-मतान्तर अनेक हैं। संसार में यह पाया जाता है कि विज्ञान के सब नियम सब देशों और सब मनुष्यों के लिये एक समान होते हैं और सब मनुष्य देश, काल व परिथितयों से ऊपर उठकर उनका पालन करते है। इसी प्रकार से धर्म के सभी सत्य सिद्धान्त संसार के सब मनुष्यों के लिये समान रूप से जानने एवं पालन करने योग्य होते हैं। धर्म से विपरीत सिद्धान्तों को अधर्म कहा जाता है। मत व धर्म में अन्तर यह होता है कि धर्म तो ईश्वर द्वारा प्रवर्तित होता है परन्तु मत व पन्थ किसी मनुष्य या सामान्य मनुष्यों से किंचित विद्वान व्यक्ति, पुरुष व आचार्य द्वारा प्रवर्तित होता है। मत की अनेक बातें सत्य हो सकती हैं जो उनमें पूर्व प्रचलित वेद धर्म व वैदिक-परम्पराओं से प्राप्त की गई होती हैं। उन मान्यताओं का उन-उन मतों की स्थापना व प्रचलन से पूर्व वेदों में विधान रहता ही है। उनमें से कुछ मान्यताओं एवं सिद्धान्तों को भी मत-पंथ के आचार्य अपने मत में स्थान देते हैं। इनसे इतर भी मतों के आचार्य अपनी विद्या व अविद्यायुक्त अनेक मान्यताओं को भी अपने मत में मिला कर मत व पंथ को चलाते हैं। संसार के मतों पर दृष्टि डालें तो सभी इसी कोटि में आते हैं। वैदिक सिद्धान्त है कि मनुष्य का आत्मा अल्प ज्ञान रखने वाला होता है। मनुष्य के सभी कार्यों में भी न्यूनता होती है। अतः मनुष्यों द्वारा प्रवर्तित मतों में भी गुण व दोष का होना स्वाभाविक है। यही कारण था कि मतों के विधान के विपरीत पृथिवी को गोल व सूर्य की परिक्रमा करने वाली बताने पर यूरोप के एक वैज्ञानिक की प्रताड़ना की गई थी।

संसार में वेद से इतर कोई भी मत ईश्वर द्वारा प्रवर्तित व प्रादूर्भूत नहीं है। केवल वेद मत ही ऐसा मत है जिसे परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न कर संसार में प्रवर्तित किया था। वेदों का आविर्भाव ईश्वर से हुआ है। वेद ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया को ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए परमयोगी वेदर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास में विस्तार से समझाया है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी एवं सर्वज्ञ है। वह अनादि, अमर, अविनाशी तथा अनन्त है। वह मनुष्य की जीवात्मा के बाहर एवं भीतर भी विद्यमान रहता है। अतः वह जीवों को उनकी आत्मा के भीतर प्रेरणा द्वारा ज्ञान दे सकता है व दिया करता है। इसी प्रक्रिया से परमात्मा ने चार आदि ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को उत्पन्न कर उन्हें वेदों का ज्ञान दिया था। उन ऋषियों को ईश्वर की प्रेरणा प्राप्त होने का ज्ञान था जिसका उन्होंने सृष्टि के आरम्भ काल से ही प्रचार किया जो ऋषि दयानन्द तक अपने सत्यस्वरूप में पहुंचा व प्राप्त हुआ था। उसी ईश्वर प्रदत्त वेदज्ञान को मनुष्यों के उपयोगी एवं आचरणीय होने के कारण धर्म कहा जाता है। धर्म का अर्थ यही है कि जिसे मनुष्य धारण करें व उसकी शिक्षाओं, मान्यताओं एवं परम्पराओं को अपने आचरण में लायें। वेद निहित धारण करने योग्य गुणों को धारण करने से ही वेदों को धर्म ग्रन्थ तथा वेदों द्वारा प्रचलित मान्यताओं, सिद्धान्तों व जीवन शैली को ही वैदिक धर्म कहा जाता है। वर्तमान समय में जब विद्वान वेदों की परीक्षा करते हैं तो वेद पूर्णतः अविद्या व अज्ञान से रहित और मनुष्यों के सम्पूर्ण विकास में सहायक सिद्ध होते हैं। वेदाध्ययन एवं वेदाचरण करने से मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। यह सिद्धान्त वेद व ऋषियों की ही देन है। किसी मत-मतान्तर के आचार्य को इस सिद्धान्त का ज्ञान नहीं था। इस कारण यह मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में नहीं पाया जाता। इसका विकारयुक्त स्वरूप ही कहीं-कहीं पाया जाता है। ऐसा होना मत-मतान्तरों की न्यूनता है कि वह अपने अनुयायियों को वेदानुकूल सद्कर्मों से वंचित कर उन्हें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के लाभों से न केवल वंचित करते हैं अपितु परजन्म में वेद धर्म के पालन के होने वालें लाभों से भी दूर करते हैं।

वेदों में मनुष्यों के लिये धारण करने योग्य सभी सत्य गुणों का वर्णन है जिससे मनुष्य की आध्यात्मिक एवं सांसारिक उन्नति होती है। आध्यात्मिक उन्नति के लिये आवश्यक होता है कि मनुष्य को ईश्वर, आत्मा व सृष्टि के सत्यस्वरूप का यथोचित ज्ञान प्राप्त हो। यह केवल वेद व ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थों के अध्ययन से ही सम्भव है। इस कारण संसार में सभी मनुष्यों का धर्म एक ही है और वह वैदिक धर्म है। ऋषि दयानन्द ने सभी मतों की परीक्षा कर बताया है कि सभी मतों में सत्यासत्य मिश्रित है, उनमें विद्या के साथ अविद्या भी विद्यमान है। अतः मनुष्यकृत कोई भी मत-पन्थ का ग्रन्थ व कार्य पूरी तरह से पवित्र, निर्दोष व पूर्ण विद्या से युक्त नहीं है। पूर्ण केवल परमात्मा है और उनका ज्ञान एवं उनके कार्य भी पूर्ण है। अतः धर्म का पालन ईश्वर से प्राप्त ज्ञान व आचरण के सिद्धान्तों के पालन से ही हो सकता है। धर्म की सबसे छोटी व सारगर्भित परिभाषा यह है कि सत्य का आचरण करना ही मनुष्य का धर्म है। पूर्ण सत्य वेदों के अध्ययन से ही प्राप्त होता है। सभी ऋषियों ने एक मत से वेदों को सब सत्य विद्याओं का ग्रन्थ स्वीकार किया है। प्राचीन काल में हमारे ऋषियों ने वेदों के आधार पर ही मनुस्मृति, उपनिषद, दर्शन आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। इन सभी ग्रन्थों के अध्ययन एवं पालन से मनुष्य जीवन को सफल जीवन बनाने में सहायता मिलती है। वेदों में सभी मनुष्यों व उनके सभी कर्तव्यों का विधान मिलता है। ऐसा निर्दोष ज्ञान संसार के किसी ग्रन्थ व आचार्य से उपलब्ध नहीं होता। अतः वेद व वेदानुकूल ऋषि ग्रन्थों का भ्रान्ति रहित ज्ञान ही धर्म कहा जाता है। यही कारण था कि सृष्टिकाल में आरम्भ में वेदों के उत्पन्न होने पर भी इसके बाद से आज तक वैदिक धर्म प्रचलित है। कुछ अज्ञानी लोगों ने वेद व वैदिक संस्कृति को नष्ट करने के अनेक प्रयत्न किये परन्तु वह इस कार्य में सफल नहीं हुए। संसार में किसी भी मनुष्य व उनके समूहों में यह शक्ति नहीं है कि वह ईश्वर द्वारा प्रवर्तित सत्य को नष्ट कर सकें। ऐसा अनिष्ट कार्य कभी सफल होने वाला नहीं है। जब तक सृष्टि है तब तक वेद व सत्य संसार में विद्यमान रहेंगे। यदि वेदभक्तों के आलस्य व प्रमाद के कारण कभी वेद अर्थात् वेदज्ञान विलुप्त हो भी गया तो संसार से विद्या, आध्यात्मिक ज्ञान लुप्त व नष्ट होने से संसार सज्जन मनुष्यों के रहने योग्य नहीं होगा, ऐसी आशंका होती है।

वेद धर्म ही सत्य धर्म है। वेद धर्म का पालन करने से मनुष्यों को अनेक लाभ होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह होता है कि वेदानुयायियों को ईश्वर का सहाय एवं आशीर्वाद प्राप्त होता है। मनुष्य की शत्रुओं से, अज्ञान से, रोगों से तथा दुष्ट विचारों आदि से रक्षा होती है। धर्म पालन व ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना से उपासक मनुष्य का ज्ञान वृद्धि को प्राप्त होता है। वह स्वस्थ रहते हैं एवं बलशाली होते हैं। वेदानुयायी की आयु का नाश व न्यूनता न होकर पूर्ण व दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। वेदमार्ग पर चलने वाला मनुष्य सद्कर्मों को करने से सुख व आनन्द का अनुभव करता है। उसको परजन्म में भी श्रेष्ठ देव मनुष्य योनि में जन्म प्राप्त होकर सुखों की प्राप्ति होती है। ऋषि दयानन्द ने अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर यह भी बताया है कि वेदानुयायी निश्चय ही ईश्वर का उपासक होता है। उपासना से उसके आत्मिक बल में वृद्धि होती है। सभी उपासकों को परमात्मा से आत्मिक बल की प्राप्ति भी होती है। इस बल के प्राप्त होने पर मनुष्य मृत्यु के समान वृहद दुःख के प्राप्त होने पर भी घबराता नहीं है अपितु ईश्वर की स्तुति, भक्ति व उपासना करते हुए अपने प्राणों का त्याग करता है। यही मनुष्य की सबसे श्रेष्ठ गति होती है।

संसार के इतिहास में अंकित है कि जब कई महापुरुष व आचार्य संसार से विदा हुए तो वह सन्तुष्ट व प्रसन्न नहीं थे। उनको मृत्यु का दुःख व अभिनिवेश क्लेश सता रहा था। वह मरना नहीं चाहते थे। इसके विपरीत ऋषि दयानन्द व अन्य ऋषियों की मृत्यु पर विचार करते हैं तो ज्ञात होता है कि उन्हें मृत्यु से पूर्व मृत्यु का ज्ञान हो गया था और उन्होंने ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने प्राणों का त्याग किया। अतः वेदज्ञान को आत्मसात कर उसके अनुसार ही आचरण व व्यवहार करना मनुष्य का धर्म है जिससे उसे जीवन में सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं और मृत्यु के बाद भी पुनर्जन्म होने पर इस जन्म से भी अधिक सुख प्राप्त होते हैं। वेद व वैदिक धर्म ही वरणीय एवं आचरणीय है। सभी वैदिक धर्मियों का कर्तव्य है कि वह ज्ञान व विवेक से युक्त होकर वैदिक धर्म का प्रचार करें, संसार से अविद्या को हटायें और लोगों में वैदिक मान्यताओं का प्रचार कर सबको सन्मार्ग में प्रवृत्त करें जिससे सारा संसार दुःखों से मुक्त होकर सुख व सद्गुणों को प्राप्त कर सके। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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