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आज का चिंतन

हमारा दिव्य लक्ष्य क्या होना चाहिए?

जब कोई व्यक्ति अपनी गौरवशाली सम्पदा का प्रयोग उचित प्रकार से करता है और उपभोक्तावाद से ऊपर उठ जाता है तो क्या होता है?
हमारा दिव्य लक्ष्य क्या होना चाहिए?
क्या सर्वोच्च दिव्यता हमारे दिव्य लक्ष्यों में हमारी सहायता करती है?

अध ते विश्वमनु हासदिष्टय आपो निम्नेव सवना हविष्मतः।
यत्पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः श्नथिता हिरण्ययः ।।
ऋग्वेद मन्त्र 1.57.2

(अध) अतः, उसके बाद (ते) आपका (विश्वम्) विश्व, सब (अनु) मित्रवत, अनुकूल बनना (ह) निश्चित रूप से (असत) उपभोक्तावाद से ऊपर उठे व्यक्ति के लिए (इष्टय) इच्छित लक्ष्य के लिए, परमात्मा की अनुभूति के लिए (आपः) जल (निम्न) निम्न स्थलों के लिए (इव) जैसे कि (सवना) यज्ञ के लिए गौरवशाली सम्पदा (हविष्मतः) उत्तम आहुतिदाता का (यत्) जब (पर्वते) पर्वतों पर, बादलों पर (न) नहीं (समशीत) निद्रा (हर्यतः) प्रगतिशील व्यकित (इन्द्रस्य) इन्द्र का (वज्रः) वज्र (श्नथिता) शत्रुओं पर प्रहार करते हुए और उनका नाश करते हुए (हिरण्ययः) चमकते हुए (शक्ति में तथा दान में)।

व्याख्या:-
जब कोई व्यक्ति अपनी गौरवशाली सम्पदा का प्रयोग उचित प्रकार से करता है और उपभोक्तावाद से ऊपर उठ जाता है तो क्या होता है?

ऋग्वेद-1.57.1 के अनुसार जब परमात्मा से प्राप्त सम्पदा का उचित प्रयोग करके हमें पूर्ण जीवन मिलता है तो उसके बाद आपका यह संसार निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति के लिए मित्रवत और समर्थनकारी बन जाता है जो उपभोक्तावाद से ऊपर उठ चुका है और ऐसे व्यक्ति को परमात्मा की अनुभूति के इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता मिलती है। यज्ञ कार्यों में आहुतियाँ देने वाले उत्तम दाता की गौरवशाली सम्पदा निम्न स्थलों की ओर जाते हुए जल की तरह होती है जो अनेक उद्देश्यों के लिए लाभदायक होता है। ऐसा प्रगतिशील व्यक्ति अपने मन की वृत्तियों रूपी बादलों पर सोया हुआ नहीं रहता। जिस इन्द्र रूपी व्यक्ति के वज्र उसके शत्रुओं पर प्रहार करते हैं और शक्ति तथा ज्ञान में चमक उठते हैं।

जीवन में सार्थकता: –
हमारा दिव्य लक्ष्य क्या होना चाहिए?
क्या सर्वोच्च दिव्यता हमारे दिव्य लक्ष्यों में हमारी सहायता करती है?

जो लोग परमात्मा के दिव्य पथ का अनुसरण करते हैं तो सर्वोच्च दिव्यता उनके लिए मित्रवत और समर्थक बन जाती है:-
(1) जो परमात्मा द्वारा दी गई गौरवशाली सम्पदा का प्रयोग सबके कल्याण के लिए करते हैं तथा (2) स्वयं को जीवन की मूल आवश्यकताओं तक सीमित रखते हुए उपभोक्तावाद से ऊपर उठ जाते हैं।
सभी रोगों, अपराधों और विनाश का कारण उपभोक्तावाद ही है। जबकि एक वास्तविक प्रगतिशील व्यक्ति दिव्यता की तरंगों के साथ अपना इच्छित लक्ष्य निर्धारित कर लेता है। उसका लक्ष्य परमात्मा की दिव्यताओं के माध्यम से उच्च दिव्य को प्राप्त करना ही होता है। अतः वह दिव्यताओं की सहायता के बावजूद भी रूकता नहीं। उसके सांसारिक लक्ष्य नहीं होते। वह सृष्टि का केवल मात्र उपभोक्ता नहीं होता किन्तु वह सृष्टिकर्ता का प्रेमी होता है। इसीलिए सभी यज्ञ कार्यों में सृष्टिकर्ता उसकी मदद करते हैं।

 


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