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भारतीय संस्कृति

अच्छे गुण कर्म स्वभाव की प्रेरणा मनुष्य को ईश्वर से ही मिलती है

एक बार एक आचार्य अपने शिष्यों की कक्षा ले रहे थे। उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य का उदहारण दिया। गुरु द्रोणाचार्य ने एक बार युधिष्ठिर और दुर्योधन की परीक्षा लेने का निश्चय किया। द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से कहा की जाओ और कहीं से कोई ऐसा मनुष्य खोज कर लाओ जिसमें कोई अच्छाई न हो। द्रोणाचार्य ने फिर दुर्योधन से कहा की जाओ और कहीं से कोई ऐसा व्यक्ति खोज कर लाओ जिसमें कोई बुराई न हो। दोनों को व्यक्ति की खोज करने के लिए एक माह का समय दिया गया। एक माह पश्चात युधिष्ठिर एवं दुर्योधन दोनों गुरु द्रोणाचार्य के पास वापिस आ गए। दोनों अकेले ही वापिस आ गए। द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से खाली हाथ आने का कारण पूछा। युधिष्ठिर ने विनम्रता से द्रोणाचार्य को उत्तर दिया,”गुरु जी मुझे संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसमें कोई न कोई गुण, कोई न कोई अच्छाई न हो। इस सृष्टि में सभी मनुष्यों में कोई न कोई अच्छाई अवश्य हैं। इसलिए मैं ऐसा कोई मनुष्य खोजने में असमर्थ रहा जिसमें कोई अच्छाई न हो। ”
द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से खाली हाथ आने का कारण पूछा। दुर्योधन ने उत्तेजित वाणी से द्रोणाचार्य को उत्तर दिया,”गुरु जी मुझे संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसमें कोई न कोई दुर्गुण, कोई न कोई बुराई न हो। इस सृष्टि में सभी मनुष्यों में कोई न कोई बुराई अवश्य हैं। इसलिए मैं ऐसा कोई मनुष्य खोजने में असमर्थ रहा जो सभी बुराइयों से मुक्त हो।”

आचार्य ने अब अपने शिष्यों से पूछा। एक ही संसार में सभी प्राणियों में युधिष्ठिर सभी प्राणियों में केवल अच्छाई देख पाते हैं और दुर्योधन केवल बुराई देख पाते हैं। इस भेद का कारण बताये?

एक बुद्धिमान शिष्य ने उत्तर दिया, “आचार्य जी। इस भेद का मुख्य कारण परीक्षा लेने वाले की मनोवृति, उसकी रूचि और उसका सोच की दिशा हैं। ”
आचार्य जी ने उत्तर दिया,”बिलकुल ठीक।”व्यक्ति की वृतियां उसके विचारों और कर्मों दोनों पर प्रभाव डालती हैं। इसीलिए वेद मनुष्यों को सात्विक वृत्ति वाला बनाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने का सन्देश देते हैं। यजुर्वेद 3/36 मंत्र में मनुष्य को सात्विक वृतियों की प्राप्ति के लिए अत्यंत शुद्ध ईश्वर से प्रार्थना करने का सन्देश दिया गया हैं। इस संसार में सबसे उत्तम गुण, कर्म और स्वभाव ईश्वर का है। इसीलिए सभी प्राणी मात्र को सर्वश्रेष्ठ गुण, कर्म और स्वभाव वाले ईश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए। अपनी आत्मा में धारण एवं प्राप्त किया हुआ ईश्वर मनुष्यों को अच्छे गुण, कर्म और स्वभाव में प्रवृत करता हैं। मनुष्यों को जैसी उत्तम प्रार्थना करनी चाहिए वैसा ही पुरुषार्थ उत्तम कर्मों और सदाचरण के लिए भी करना चाहिए।

#डॉविवेकआर्य

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