चित्रकूट धाम के आसपास के प्रमुख तीर्थस्थल

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आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

चित्रकूट उतर मध्य भारत का एक बेहद खूबसूरत शहर है। जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच विंध्य पर्वत और घने जंगलों से घिरा हुआ है। इस जगह पर लोग आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ-साथ शांति की तलाश में आते हैं। त्रेता युग में भगवान श्री रामचंद्र जी के वन जाते समय 12 साल यहां बिताए थे। उन्हें वापस लाने और राज्य अभिषेक के लिए श्री भरतलाल जी सपरिबार यहां पधारे थे। उस समय उन्होंने पांच दिनों में संपूर्ण चित्रकूट धाम के विभिन्न तीर्थों के दर्शन किए थे। तब से पंच दिवसीय श्री चित्रकूट धाम की यात्रा प्रचलित हुई। इस संदर्भ में श्री रामचरितमानस अयोध्याकांड का निम्नलिखित दोहा प्रमाण है-
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।
कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।

प्रमुख तीर्थस्थल :-

श्री चित्रकूट धाम तीर्थ क्षेत्र के प्रमुख तीर्थस्थल निम्न लिखित है –

(1) श्री रामघाट-

मां मंदाकिनी के पावन तट पर अनेक घाटों में सर्व प्रमुख श्री रामघाट का वर्णन आता है। यहीं पर भगवान श्री राम जी ने अपने पूज्य पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध कर्म संपन्न किया था इसी घाट पर संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी को मौनी अमावस्या के पावन पर्व पर भगवान श्री राम जी के बाल स्वरूप के दर्शन हुए थे इस संबंध में एक दोहा प्रचलित है-
चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक देत रघुवीर।।
रामघाट में डुबकी लगाने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। रामघाट पर भगवा वस्त्र में संतों द्वारा अगरबत्ती की सुगंध और पवित्र मंत्रों का भजन आत्मा को शांत और स्पर्श करता है। यहां शाम तक इस जगह की सुंदरता का आनंद नौका विहार से ले सकते हैं और सुंदर दीयों की रोशनी, घंटी की आवाज़ और पवित्र मंत्रों के साथ आरती में भाग ले सकते हैं।यहीं पर गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा के निकट नित्य सायंकाल मां गंगा की भव्य आरती का आयोजन होता है।

(2)मत्तगजेंद्र शिव मंदिर-

श्री चित्रकूट धाम में यह शिव मंदिर सर्वाधिक प्राचीन एवं सुप्रसिद्ध मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि यहां भगवान शिव के पार्थिव लिंग की स्थापना स्वयं सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी के द्वारा की गई थी। ऐसा भी माना जाता है कि भगवान मत्तगजेंद्र शिवजी श्री चित्रकूट धाम के तीर्थ देवता है। भगवान श्री राम जी ने उन्हीं की अनुमति से चित्रकूट में निवास किया।

(3) श्री राघव प्रयाग घाट-

श्री चित्रकूट धाम में निर्मोही अखाड़ा के निकट मां मंदाकिनी मां पयस्विनी और गुप्त रूप से मां सरयू का पावन संगम होता है। जिसे श्री राघव प्रयाग घाट के नाम से जाना जाता है। तीर्थराज प्रयाग स्वयं पवित्र होने के लिए प्रत्येक 12 वर्ष के उपरांत काक वेश में यहां आते हैं और स्नान करके हंस बनकर यहां से जाते हैं।

(4)जानकीकुंड-

श्री कामदगिरि प्रमुख द्वार से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर जानकीकुंड नाम की बस्ती है जो चित्रकूट सतना राजमार्ग पर स्थित है। यहां पर एक प्रसिद्ध श्री राम जानकी मंदिर है तथा उसी के समीप लगभग 85 सीढ़ी नीचे उतरने पर मां मंदाकिनी के तट पर सुप्रसिद्ध जानकीकुंड तीर्थ स्थित है। ऐसी मान्यता है कि इस कुंड में मां जानकी (सीता माता) नित्य स्नान करती थी। इसीलिए इसका नाम जानकी कुंड पड़ा। यहां पर मां जानकी जी के पावन चरण चिन्ह के दर्शन होते हैं ।

(5)स्फटिक शिला-

जानकीकुंड से लगभग 2 किलोमीटर दक्षिण में मां मंदाकिनी के सुरम्य तट पर सघन वृक्षों से आच्छादित परम रमणीय स्फटिक शिला नामक तीर्थ है। यहां पर आज भी एक विशाल शिला पर भगवान श्री राम जी के चरण चिन्ह अंकित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे के भेष में मां सीता जी पर अपनी चोंच का प्रहार किया था। जो भगवान श्री राम जी के द्वारा दंडित हुआ।

(6)अत्रि-अनुसुइया आश्रम-

श्री चित्रकूट धाम में स्थित अपने दीर्घकालिक आवास को त्यागने के उपरांत भगवान श्री सीताराम लक्ष्मण जी महर्षि अत्रि मुनि के आश्रम गए। महर्षि अत्रि और माता अनुसुइया ने भगवान श्री रामचंद्र जी को अपने पुत्र की भांति अपनाया। माता अनुसुइया ने मां जानकी जी को यहीं पर स्त्री धर्म की शिक्षा दी है। मां मंदाकिनी गंगा का मूल स्रोत अत्रि अनुसुइया आश्रम ही माना जाता है। मां मंदाकिनी गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने वाली परम सती माता अनुसुइया जी ही हैं। जिन्होंने अपने सतीत्व धर्म के बल पर भगवान की तीनों प्रधान विभूतियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) को अपने पुत्र बनाकर झूला झुला दिया। अनुसूया की कहानी के अनुसार जब उन्होंने पवित्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर पर कुछ विशेष जल छिड़का और इससे उनके अवतार हुए। आज भी यहां के लोकगीतों में गाया जाता है कि-
माता अनुसुइया ने डाल दियो पालना।
झूल रहे तीनों देव बन कर के लालना।।

(7)अम्बरीष आश्रम (अमरावती)-

महर्षि अत्रि के आश्रम से विदा होकर भगवान श्री राम जी ने एक तापस आश्रम में पहुँचकर रात्रि विश्राम किया। उस अमरावती नामक आश्रम में भगवान श्री राम जी के पूर्वज राजर्षि अम्बरीष ने घोर तपस्या की थी। घने जंगलों के बीच स्थित इस आश्रम की प्राकृतिक छटा अत्यंत रमणीय है। कुछ वर्ष पूर्व श्री स्वामी जी के नाम से विख्यात एक महान संत ने दीर्घ काल तक यहां तप साधना की है। इसी तीर्थ के निकट भगवान श्री राम जी ने विराध नामक असुर का वध किया था। उस स्थान को विराध कुंड के नाम से जाना जाता है।

(8) सरभंग आश्रम-

श्री वाल्मीकि रामायण के अनुसार विराध कुंड से डेढ़ योजन (लगभग 5 किलोमीटर) की दूरी पर महामुनि सरभंग का निवास स्थान है। महर्षि सरभंग एक बार ब्रह्मलोक की यात्रा के लिए जा रहे थे कि अचानक उन्हें भगवान श्री राम जी के आगमन का समाचार प्राप्त हुआ। जिसे सुनकर उन्होंने ब्रह्मलोक जाना स्थगित कर दिया । श्री रामचरितमानस में महर्षि सरभंग का प्रसंग अत्यंत कारुणिक एवं मर्मस्पर्शी है। महर्षि सरभंग जी ने भगवान श्री रामचंद्र जी से कहा कि जिन नेत्रों से मैंने आपके दर्शन कर लिए हैं उनसे अब इस संसार को नहीं देखना है। इसलिए आप थोड़ी देर और ठहर जाइए। मैं योग अग्नि में स्थित होकर अपने प्राणों को आपके चरणों में समर्पित कर देना चाहता हूं। महर्षि सरभंग जी की भक्ति एवं तपोशक्ति अनन्य थी। इस तीर्थ में एक पवित्र जल स्रोत भी है।इस तीर्थ में एक बार स्नान कर लेने मात्र से सौ बार गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है। जिसके संबंध में कहा जाता है कि-
सौ बार गंगा, एक बार सरभंगा।

(9) सुतीक्ष्ण आश्रम-

महर्षि सुतीक्ष्ण परम तेजस्वी महर्षि अगत्स्य के शिष्य थे। उनके आगाध प्रेम की स्थिति को देखकर भगवान श्री राम जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें मनचाहा वरदान प्रदान किया। गुरु शिष्य परंपरा में सुतीक्ष्ण जी ऐसे अनूठे साधक थे। जिन्होंने अपने गुरुदेव को भगवान श्री राम जी के दर्शन गुरु दक्षिणा के रूप में करवाये। वर्तमान में सुतीक्ष्ण आश्रम सरभंग आश्रम से 7 किलोमीटर की दूरी पर है। सरभंग आश्रम से सुतीक्ष्ण आश्रम मार्ग पर यहां से 2 किलोमीटर पहले सिद्धा पहाड़ नामक एक पर्वत है जिसे अस्थि समूह के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि राक्षसों ने ऋषि-मुनियों को मारकर उनका आहार कर लिया था और उनके कंकाल का एक पूरा पहाड़ बना दिया था। चित्रकूट क्षेत्र में ऋषि मुनियों की ऐसी दुर्दशा देखकर भगवान श्री राम जी के नेत्रों मे अश्रुविंदु छलक आए और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मैं इस पृथ्वी से असुर समूह का समूल नाश कर दूंगा।

(10) अघमर्षण कुंड धारकुंडी आश्रम-

महाभारत के अनुसार अघमर्षण कुंड वह स्थान है जहां पर एक यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से धर्म संबंधी अनेक प्रश्न पूछे थे। यह प्रसंग यक्ष-युधिष्ठिर संवाद के नाम से जाना जाता है। यहां पर स्नान करने से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है। यह तीर्थ धार कुंडी नामक स्थान में स्थित है। धारकुंडी में एक जल स्रोत की धारा एक कुंड में गिरती है। यह दृश्य बड़ा ही मनोहारी है।

( 11) गुप्त गोदावरी-

विंध्य पर्वत श्रंखला के रमणीक अंचल में स्थित प्रकृति द्वारा निर्मित गुप्त गोदावरी की गुफाएं नैसर्गिक कला-कौशल का अत्यन्त दुर्लभ नमूना हैं। यहां पर दर्शन करके ऐसा लगता है कि जैसे प्रकृति रूपी चित्रकार ने अपनी जादुई तूलिका से कल्पना लोक का एक सर्वश्रेष्ठ चित्र बनाया है। यहां पर दो गुफाओं में से एक शुष्क है और दूसरी में जल प्रवाहित होता है। शुष्क गुफा में सीता कुंड, धनुष कुंड, सुईया माता और श्री राम दरबार के दर्शन होते हैं। दूसरी जल प्रवाह वाली गुफा के द्वार पर पंचमुखी शिवलिंग के दिव्य दर्शन हैं। गुफा के अंदर प्रवेश करने पर शेषनाग के फण, दूध धारा एवं श्री राम तथा लक्ष्मण कुंड आदि के दर्शन करके तीर्थयात्री अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। कहा जाता है कि भगवान राम और लक्ष्मण ने एक बार अपनी गुप्त बैठकें की थीं, जो कि गुफा में मौजूद सिंहासन जैसी संरचनाओं द्वारा स्पष्ट रूप से मान्य है। यहां पर विभिन्न कुंडों में प्राप्त जल स्रोत गुप्त रूप से पवित्र गोदावरी नदी के प्रकट होने का प्रमाण देते हैं। इन गुफाओं के दर्शन करके श्रीरामचरितमानस का वह दोहा स्मृति पटल पर अंकित हो जाता है कि –
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।
राम कृपानिधि कुछ दिन बास करहिंगे आइ।।

(12) माण्डव्य आश्रम (मड़फा) –

गुप्त गोदावरी से 5 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में एक पहाड़ी के समतल शिखर पर स्थित माण्डव्य ऋषि का अति प्राचीन आश्रम मड़फा के नाम से विख्यात है। यह तीर्थ नैसर्गिक सुषमा का एक अनूठा केंद्र है। इस पर्वत में अनेक गुफाएं, झरने तथा पापमोचन नामक पवित्र सरोवर है। विभिन्न जनश्रुतियों से प्रमाणित होता है कि भगवान श्री राम जी ने यहां कुछ काल तक रुक कर विश्राम किया था। पौराणिक तथ्यों से ज्ञात होता है कि माण्डव्य ऋषि परम तपस्वी एवं उच्च कोटि के अध्यात्मिक विभूति थे।

(13)अगत्स्य आश्रम (सारंग)-

यह तीर्थ सुरम्य पर्वत शिखरों, प्राकृतिक जल-स्रोतों एवं प्रकृति की मनोहारी छटा का एक अनुपम स्थान है। ऐसी मान्यता है कि महर्षि अगत्स्य ने यहां पर दीर्घकाल तक तप किया एवं उनके प्रिय शिष्य महर्षि सुतीक्ष्ण ने यहीं पर उन्हें भगवान श्री राम जी के दर्शन कराए। ऐसी लोक मान्यता है कि सारंग पर्वत के अंदर बनी हुई गुफा में वे धनुष बाण छुपाकर रखे गए थे जिनके द्वारा बाद में रावण का वध किया गया। दृष्टव्य है कि भगवान श्री विष्णु के धनुष का नाम सारंग ( शार्ङ्ग ) है। संभवत इसी कारण से इस तीर्थ का नाम भी सारंग पड़ा। यहाँ पर रामकुंड, लक्ष्मण कुंड, रामशिला (राम बैठका) एवं सीता रसोई जैसे तीर्थ स्थल आज भी विद्यमान हैं।

(14) वनदेवी (मां जानकी जी का चरण चिन्ह)-

श्री कामतानाथ भगवान के मंदिर से हनुमान धारा जाते हुए नयागांव और श्री हनुमान धारा के ठीक मध्य में मां वनदेवी का मंदिर आता है। जहाँ चित्रकूट वन की अधिष्ठात्री देवी मां वनदेवी की प्रतिमा विद्यमान है। समीप ही एक मंदिर में मां जानकी जी का चरण चिन्ह के दर्शन होते हैं। चित्रकूट क्षेत्र में मिलने वाले भगवान सीताराम जी के चरण चिन्हों में यह चिन्ह सबसे ज्यादा स्पष्ट हैं। यहां पर दर्शन करते हुए श्री रामचरितमानस के अयोध्या कांड की वह चौपाई स्मरण हो जाती है-
बनदेबीं बनदेव उदारा ।
करिहहिं सास ससुर सम सारा।।

(15 ) हनुमान धारा –

लोक मान्यता है कि लंका दहन के पश्चात श्री हनुमान जी के शरीर में अत्यधिक जलन की अनुभूति हुई। इस दाह जनित पीड़ा के निवारण के लिए हनुमान जी ने अपने प्रभु श्री राम जी से निवेदन किया। तब भगवान श्री राम जी ने श्री चित्रकूट धाम के संकर्षण पर्वत पर स्थित इस हनुमंत तीर्थ में कुछ समय निवास करके तप करने की आज्ञा प्रदान की। साथ ही साथ वहां पर्वत शिखर में अपने वाण का प्रहार करके एक जलधारा प्रकट की। जो श्री हनुमंत लाल जी के श्रीविग्रह के वाम स्कंध पर प्रवाहित होती है।
एक कुंड में भगवान हनुमान के देवता पर गिरने वाले पानी की एक धारा है । प्राचीन काल में इस तीर्थ तक पहुंचने के लिए भूतल से लगभग 365 सीढ़ियाँ हुआ करती थी। यहीं पर सीढ़ियों के प्रारंभिक स्थल के दाहिनी ओर एक बावड़ी (विशाल कूप) भी स्थित है। अब से करीब 35-40 साल पहले एक नवीन जलधारा प्रकट हुई जहां पर श्री पंचमुखी हनुमान जी की दिव्य प्रतिमा विराजमान है। प्राचीन काल की निर्मित सीढ़ियां बहुत ऊंची और असुविधा पूर्ण थी। कालांतर सुविधा पूर्ण सीढ़ियों का निर्माण किया गया। अभी कुछ समय पूर्व ही यहां तक पहुंचने के लिए उड़न खटोला सेवा (रोप-वे) प्रारंभ हो चुकी है।

(16 ) सीता रसोई (जमदग्नि तीर्थ)-

संकर्षण पर्वत के समतल शिखर पर श्री हनुमत् धारा तीर्थ से लगभग 60 सीढ़ियाँ ऊपर यह मनोहर स्थान स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि इस तीर्थ में मां जानकी जी ने चित्रकूट स्थित ऋषि-मुनियों को भोजन कराया था। यहां पर मंदिर के गर्भ गृह में भगवान श्री सीता राम लक्ष्मण जी की प्रतिमाएं विराजमान हैं तथा पास में ही चूल्हा और बेलन आदि रसोई के उपकरण प्रतिष्ठित है जोकि मां जानकी जी की अतिथि सेवा का आज भी प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा भी माना जाता है कि इसी तीर्थ में श्री जमदग्नि ऋषि ने दीर्घ काल तक अपनी तप साधना संपन्न की।

(17) देवाङ्गना तीर्थ-

श्री हनुमान धारा तीर्थ से लगभग 1 किलोमीटर पूर्व संकर्षण पर्वत के अंचल में ही यह तीर्थ स्थल सुशोभित है। यहां का पर्वतीय दृश्य तथा जलप्रपात अत्यंत मनोरम हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम जी के वनवास काल में उनके दर्शनों के लिए न केवल चित्रकूट तीर्थ स्थित ऋषि-मुनि एवं वनवासी कोल भील ही पधारे थे बल्कि स्वर्ग लोक की अप्सराएं (देवाङ्गनाएं) भी भगवत दर्शन के लिए श्री चित्रकूट धाम पधारीं और इसी स्थान पर उन्होंने भगवान श्री राम जी के दर्शन प्राप्त किए। यहां निर्जन वन अंचल में स्थित एक मंदिर में एक नारी मूर्ति के दर्शन होते हैं जो देवराज इंद्र की पुत्र-वधू एवं देव कुमार जयंत की पत्नी जयंती (देवाङ्गना) की मूर्ति है उसने यहां दीर्घकाल तक तप किया था। यह तीर्थ श्री चित्रकूट धाम के निर्माणाधीन हवाई-अड्डे के निकट ही स्थित है।

(18) कोटि तीर्थ-

देवाङ्गना तीर्थ स्थल से 1 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में पूर्वोक्त संकर्षण पर्वत पर ही कोटि तीर्थ नामक एक तीर्थ स्थल विद्यमान है। इस तीर्थ में भी एक झरना निरंतर निर्झरित होता रहता है एवं समीप ही एक प्राकृतिक जल-स्रोत भी है। प्राचीन चित्रकूट माहात्म्य के अनुसार इस तीर्थ में स्नान करने से करोड़ों अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि यहां पर समस्त तीर्थों ने अपने आधिदैविक स्वरूप में उपस्थित होकर भगवान श्री राम जी के दर्शन प्राप्त किए। इसलिए इस तीर्थ को कोटि तीर्थ कहा जाता है।यहां पर श्री हनुमान जी की एक दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है जोकि अत्यंत सिद्धिदात्री बताई जाती है।

(19) बाँकेसिद्ध तीर्थ-

कोटि तीर्थ से 1 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में पूर्वोक्त संकर्षण पर्वत पर ही बांके सिद्ध नाम का एक अत्यंत मनोरम तीर्थ स्थल स्थित है। संस्कृत भाषा के शब्द वाक् सिद्धि का अपभ्रंश रूप ही बांकेसिद्ध कहलाता है जिसका अर्थ है वाणी की सिद्धि। यहां पर तप करके अगणित साधु-संतों ने वाणी की सिद्धि प्राप्त की। महासती मां अनुसुइया के अनुज भगवान कपिल मुनि ने भी यहां पर सुदीर्घ काल तक तप किया। यह स्थल अपने प्राकृतिक सौंदर्य, देव निर्मित अद्भुत कंदरा तथा निर्मल जलप्रपात के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर भगवान शिव की एक प्राचीन दिव्य मूर्ति विराजमान है।

(20) श्री रामशैया तीर्थ-

श्री कामदगिरि प्रदक्षिणा प्रमुख द्वार से भरतकूप के सीधे रास्ते में खोही गांव से लगभग 2 किलोमीटर आगे श्री रामशैया तीर्थ विद्यमान है। एक अज्ञात पहाड़ी के अंचल में हरे भरे खेतों के मध्य एक विशाल पाषाण शिला एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। जिस पर भगवान श्री सीताराम जी के विश्राम के चिन्ह अंकित हैं। उस शिला पर भगवान श्री राम जी के धनुष-बाण और जटाओं के निशान, श्री भरत लाल जी के द्वारा प्रणाम करने के निशान तथा भगवान श्री सीताराम जी के श्री विग्रह के निशान आज भी स्पष्ट दृष्टिगत होते हैं जिनके दर्शन करके श्रद्धालु तीर्थ यात्रियों के मन में सहसा ही एक भाव आता है कि मेरे प्रभु ने लोक कल्याण के लिए कितने कष्ट सहे। ऐसे परम उदार परमात्मा को भूल जाने वाला जीव वास्तव में ही बड़ा अभागा है।

(21) अनादि तीर्थ भरतकूप-

यह परम पवित्र अनादि तीर्थ स्थल भरतकूप नामक बस्ती से लगभग 2 किलोमीटर दूर विंध्य-पर्वतश्रंखला के द्रोणाचल नामक पर्वत की तलहटी में स्थित है। श्री रामचरितमानस के अनुसार भरत जी जब अपने प्रभु श्री राम जी को मनाने के लिए श्री अवध धाम से श्री चित्रकूट धाम पधारे तब वह अपने साथ समस्त तीर्थों का जल अपने प्रभु भगवान श्री राम जी के अभिषेक के लिए लाए थे किंतु जब प्रभु श्री राम जी ने उनके अयोध्या लौटने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया और स्वयं उन्हें 14 वर्ष तक अपने प्रतिनिधि के रूप में अयोध्या साम्राज्य का राज्य-भार संभालने के लिए राजी कर लिया। तब उस जल को आगामी 14 वर्षों तक संभाल कर रखने की आवश्यकता हुई। उस समय महर्षि अत्रि जी ने श्री भरत लाल जी को वह संपूर्ण तीर्थों का जल इसी कूप में स्थापित करने के लिए निर्देश दिया। इस प्रकार इस पवित्र तीर्थ के जल में सभी तीर्थों का पवित्र जल सन्निहित है।तभी से यह कूप भरत जी के नाम पर भरतकूप कहलाया। यह तीर्थ एक विशाल वटवृक्ष एवं एक मंडप के द्वारा आच्छादित है। यहां पर स्थित मंदिर में भगवान श्री राम दरबार के साथ श्री भरत लाल एवं राज महिषी देवी मांडवी की प्रतिमाएं भी विशेष रूप से प्रतिष्ठित हैं। इस तीर्थ के संदर्भ में श्री रामचरितमानस के अयोध्या कांड के एक दोहे में विशेष संकेत रूप से कहा गया है-

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिय अनूप।।

( 22) भरत मिलाप मंदिर :-

भगवान राम को जिस समय वनवास मिल उस दौरान चार भाइयों के मिलन स्थल के रूप में इस जगह को जाता है, भरत मिलाप मंदिर चित्रकूट का एक बहुत ही बड़ा और महत्वपूर्ण मंदिर है। कामदगिरि की परिक्रमा के साथ स्थित, इस मंदिर की यात्रा यहाँ अवश्य करनी चाहिए। यहां भगवान राम और उनके परिवार के पैरों के निशान भी देखे जा सकते हैं।

(23) सूर्य कुंड-

झांसी-प्रयागराज राजमार्ग पर श्री चित्रकूट धाम के निकट प्रसिद्ध बेड़ी पुलिया स्थान से 5 किलोमीटर पूर्व उत्तर दिशा में मां मंदाकिनी के नाभि क्षेत्र में स्थित अथाह जल राशि वाला एक प्राकृतिक जलकुंड ही सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है। कुंड के समीप ही भगवान श्री राम जानकी मंदिर स्थित है जिसे साधु कुलभूषण श्री फलाहारी बाबा जी ने स्थापित कराया था। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान श्री रामचंद्र जी अपने वनवास काल में श्री चित्रकूट धाम पधारे उस समय समस्त देवता उनके शुभ दर्शन के लिए उपस्थित हुए। भगवान श्री राम जी के कुल-पुरुष श्री सूर्य नारायण भगवान भी उस काल में श्री राम जी के दर्शन के लिए पधारे थे। आधुनिक काल में भी पूज्य संत देवरहवा बाबा, अनुसुइया आश्रम के श्री परमहंस जी महाराज एवं पूज्य फलाहारी बाबा जैसे संतो ने दीर्घकाल तक यहाँ पर तपस्या की है।

(24) कामदगिरि पर्वत :–

कामदगिरी एक जंगली पहाड़ी है। इसे चित्रकूट का दिल कहा जाता है। इसकी परिक्रमा के 5 किलोमीटर के रास्ते पर कई मंदिर हैं, जिनमें से एक सबसे प्रसिद्ध भरत मिलाप मंदिर है, जहाँ भरत भगवान राम से मिले और उन्हें अपने राज्य में वापस आने के लिए राजी किया।कामदगिरि चित्रकूट धाम का मुख्य पवित्र स्थान है। संस्कृत शब्द ‘कामदगिरि’ का अर्थ ऐसा पर्वत है, जो सभी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करता है। इस गिरि को रामगिरि और चित्रकूट पर्वत भी कहा जाता है । कहा जाता है कि पर्वतराज सुमेरू के शिखर कहे जाने वाले चित्रकूट गिरि को कामदगिरि होने का वरदान भगवान राम ने दिया था। तभी से विश्व के इस अलौकिक पर्वत के दर्शन मात्र से आस्थावानों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह स्थान अपने वनवास काल के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी का निवास स्थल रहा है। तुलसी दास जी ने लिखा है –
” कामद भे गिरि रामप्रसादा।
अवलोकत अप हरत विषादा’।

(25)गणेश बाग –

कर्वी-देवांगना मार्ग पर सिर्फ 11 किमी की दूरी पर स्थित, गणेशबाग एक वास्तुशिल्प रूप से सुंदर मंदिर, सात मंजिला बावली और एक महल के खंडहर के साथ एक जगह है। पूरे परिसर का निर्माण पेशवा विनायक राव ने ग्रीष्मकालीन विश्राम के रूप में किया था और इसे स्थानीय रूप से मिनी-खजुराहो के रूप में भी जाना जाता है।

( 26) श्री तुलसी जन्म कुटीर (तुलसी मंदिर) –

प्रायः शांत प्रवाह में प्रवहमान मां कालिंदी (श्री यमुना जी) के दक्षिण तट पर स्थित राजापुर गांव में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज का परम पुनीत जन्म स्थल (तुलसी मंदिर) स्थित है। मंदिर में भगवान श्री सीताराम दरबार, गोस्वामी तुलसीदास जी की यमुना जी से प्रकट स्वयंभू श्याम पाषाण प्रतिमा, उनकी चरण पादुका एवं यमुना जी से प्राप्त स्वयंभू शिवलिंग जी के दर्शन प्राप्त होते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी के द्वारा सेवित श्री नरसिंह स्वरूप भगवान शालिग्राम जी का विग्रह विशेष रुप से दर्शनीय है। निकट ही एक अन्य मंदिर में उन्हीं की हस्तलिखित श्रीरामचरितमानस की प्रति का अयोध्या कांड संरक्षित है।

(27) संकट मोचन हनुमान मंदिर(राजापुर)-

श्री हनुमंत लाल जी के द्वारा स्वपनादेश के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी जन्मभूमि राजापुर में किसी शिला पर चंदन से श्री हनुमंत लाल जी की आकृति बनाकर उसका नित्य पूजन किया करते थे। जिसके लिए वह प्रतिदिन पूजन के प्रारंभ में आवाहन तथा पूजन के समापन अवसर पर विसर्जन अनिवार्य रूप से करते थे किंतु एक दिन संयोगवश पूजन करने के उपरांत वे विसर्जन करना भूल गए। बाद में जब वे आकृति मिटाने लगे तो वह नहीं मिटी। तब उन्हें इस बात का बोध हुआ कि इस शिला पर आज से श्री हनुमान जी की स्थाई प्रतिष्ठा हो चुकी है। तब से वे उसी शिला पर श्री हनुमान जी का नित्य पूजन करने लगे। यह एक सिद्ध हनुमत तीर्थ है।

( 28) हनुमत् तीर्थ नांदी तौरा-

यह दिव्य हनुमत् तीर्थ श्री चित्रकूट धाम ( कर्वी)- राजापुर मार्ग के मध्य में स्थित पहाड़ी गांव से लगभग 5 किलोमीटर दूर नांदी तौरा गांव में स्थित है। इस तीर्थ में श्री हनुमंत लाल जी की अति प्राचीन एवं स्वयंभू पूर्वाभिमुखी प्रतिमा प्रतिष्ठित है। ऐसा कहा जाता है कि उपरोक्त हनुमत् विग्रह का श्री चरण पाताल गामी है। ब्रिटिश काल में किसी अंग्रेज अधिकारी के द्वारा मूर्ति स्थल की खुदाई करवाने पर भी हनुमान जी के गड़े हुए पैर का ओर-छोर नहीं प्राप्त हो सका। यह एक सिद्ध हनुमत् पीठ है। इस तीर्थ के प्रति संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की अगाध श्रद्धा थी।

(29)कालिंजर किला –

कालिंजर उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित एक प्राचीन किला है। चंदेल राजाओं द्वारा बनाए गए आठ प्रसिद्ध किलों में से एक होने के नाते, यह खजुराहो के विश्व धरोहर स्थल के पास विंध्य पर्वत श्रृंखला पर स्थित है। शक्तिशाली किला 1203 फीट की ऊंचाई तक जाता है और बुंदेलखंड के मैदानों को देखता है। कालिंजर को इसका नाम कलंजर शब्द से मिला है जो भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करता है
जिन्होंने इस स्थान पर विश्राम किया और समय की बाधा को नष्ट कर दिया। मान्यता है कि यहां भगवान शिव हमेशा विराजमान रहते हैं । किले में भगवान शिव, भगवान विष्णु, शक्ति, भैरव, भगवान गणेश और भैरवी की पत्थर की छवियों के साथ-साथ पक्षियों, मिथुन, अप्सराओं और जानवरों की पत्थर की नक्काशी भी देखी जा सकती है। यहां मौजूद कुछ दर्शनीय स्थलों में सीता सेज शामिल है जो एक पत्थर के बिस्तर और तकिया के साथ एक छोटी सी गुफा है जिसका उपयोग एक समय साधुओं द्वारा किया जाता था, गजंतक शिव की छवि भी चट्टान की सतह पर उकेरी गई मांडूक भैरों के रूप में प्रसिद्ध है और कोटि तीर्थ जो विशाल जल भण्डार है। नीलकंठ मंदिर, जिसका निर्माण परमारदिदेव ने करवाया था।

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