वैदिक सम्पत्ति – 319 *वैदिक आर्यों की सभ्यता*

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[यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधी पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।
प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य
(चेयरमेन उगता भारत)
गतांक से आगे…

 *नियमों से कारणों का पता* (2 ) 

यदि सारे शरीर में व्याप्त होती, तो शरीर के बढ़ने के साथ उसको भी बढ़ना पड़ता और शरीर के कटने के साथ उसे भी संकुचित होना पड़ता । अर्थात् उसकी दशा ठीक रबर या स्प्रिंग की भाँति होती और विना अनेक परमाणु, संघात के इस प्रकार का ह्रासविकास न हो सकता। पर जैसा कि हम इसी पुस्तक के पृष्ठ १२२ में लिख आये हैं कि ज्ञानवान् तत्त्व संयुक्तपरमाणुओं से नहीं बन सकता और न अनेक अज्ञानी परमाणु एक जगह एकत्रित होकर परस्पर ज्ञानसंवाद ही जारी रख सकते हैं, इसलिए यह शक्ति रबर की तरह चटने बढ़नेपाली और अनेक परमाणुधों के संयोग से बनी हुई वस्तु नहीं है, प्रत्युत स्वयंसिद्ध, असंयुक्त, अणु और ज्ञान- बान् वस्तु है। इसके अतिरिक्त वह शक्ति असंख्य भी प्रतीत होती है। क्योंकि एक मनुष्य का अनुभव समस्त मनुष्यों और प्राणियों में आप ही आप फैलता हुआ। नहीं देखा जाता। कलकत्तेवाला मनुष्य जिस समय हबड़ा के पुल से जिस नाव को देख रहा है, उसी समय समस्त संसार के मनुष्य उसी नाव को नहीं देख रहे। इससे मालूम होता है कि प्रत्येक शरीर में एक अणु, परिच्छिन्न और ज्ञानवान् स्वतन्त्र सत्ता विद्यमान है, जो अपने स्वभाव के अनुसार उत्तम अथवा निकृष्ट आचरण से सूचित होती है। इसी को लोग जीव, रूह और सोल के नाम से पुकारते हैं और यही सृष्टि का दूसरा कारण है, जो सृष्टि के इस व्यापक नियम से ही ज्ञात हो रहा है।

         सृष्टि का तीसरा नियम यह है कि इस विस्तृत सृष्टि में जो कुछ कार्य हो रहा है, वह नियमित, बुद्धिपूर्वक और आवश्यक है। सूर्य, चन्द्र और समस्त ग्रह उपग्रह अपनी अपनी नियत घुरी पर नियमित रूप से भ्रमण कर रहे हैं। 

अपनी दैनिक और वार्षिक गति के साथ अपनी नियत सीमा में घूम रही है। वर्षा, सर्दी और गर्मी नियत समय में होती हैं। मनुष्य और पशु पक्ष्यादि के शरीरों की बनावट, वृक्षों में फूलों और फलों की उत्पत्ति, बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज का नियम और प्रत्येक जाति की आायु और भोगों की व्यवस्था आदि जितने इस सृष्टि के स्थूल-सूक्ष्म व्यवहार हैं, सबमें व्यवस्था, प्रबन्ध और नियम पाया जाता है। नियामक के नियम का सबसे बड़ा चमत्कार तो प्रत्येक प्राणी के शरीर की वृद्धि और ह्रास में दिखलाई पड़ता है। क्यों एक बालक नियत समय तक बढ़ता है और क्यों एक जवान धीरे धीरे ह्रास की ओर वृद्धावस्था की ओर जाता है, इस बात को कोई नहीं कह सकता । यदि कोई कहे कि वृद्धि और ह्रास का कारण भाहार आदि पोषक पदार्थ हैं, तो ठीक नहीं। क्योंकि हम रोज देखते हैं कि एक ही घर में, एक ही परिस्थिति में और एक ही आहार विहार के साथ रहते हुए भी छोटे छोटे बच्चे बढ़ते जाते हैं और जवान वृद्ध होते जाते हैं तथा वृद्ध अधिक जर्जरित होते जाते हैं। इन प्रबल और चमत्कारिक नियमों से सूचित होता है कि इस सृष्टि के अन्दर एक अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापक, परिपूर्ण और ज्ञानरूपी चेतनशक्ति विद्यमान है जो अनन्त आकाश में फैले हुए असंख्य लोकलोकान्तरों का भीतरी और बाहरी प्रवन्ध किये हुए है। क्योंकि नियम बिना नियामक के, नियामक विना ज्ञान के और ज्ञान विना ज्ञानी के ठहर नहीं सकता। पर हम संपूर्ण सृष्टि में नियमपूर्वक व्यवस्था देखते हैं, इसलिए सृष्टि का यह तीसरा कारण भी सृष्टि के नियमों से ही सिद्ध होता है। इसी को परमात्मा, ईश्वर, खुदा और गॉड आदि कहते हैं। इस तरह से संसार के तीनों नियमों से तीनों कारणों का पता मिलता है। सृष्टि के ये तीनों कारण स्वयंसिद्ध और अनादि हैं, इसीलिये यह प्रवाह से अनादि सृष्टि भी बुद्धिपूर्वक नियमों में आबद्ध होकर कार्य कर रही है। क्योंकि जितने पदार्थ स्वयंसिद्ध, कारणरूप और स्वयंभू होते हैं, उन्हीं के गुण, कर्म, स्वभाव भी निश्चित होते हैं धौर उन्हीं गुणों से जो कार्य बनते हैं, वे नियमपूर्वक कार्य करते हैं। यह कार्यरूप सृष्टि प्रत्यक्ष ही सुव्यवस्थित,बुद्धिपूर्वक और नियमित कार्य कर रही है, इसलिए इसके तीनों कारणों के स्वयंसिद्ध होने में कुछ भी सन्देह नहीं रह जाता । इसलिए अब आगे इन कारणों से कार्य का वर्णन करते हैं।

Trees have almost as wonderful a sense of direction as birds. Should there be a leak in an under-ground water-pipe in a park or garden, a neighbouring tree is almost sure to find it out, and extending, its roots in that direction, project a shoot through the break in to the pipe. Even more extraordinary is the performance of the rattan, a climbirg palm common in tropical countries, When it has climbed a tree, it goes over the top and comes down again to the ground. Then growing at the rate of a foot every twentyfour hours, it sets out straight for the next tree, which may be ovar 50 yards away.अगले अंक में कारणों से कार्य की उत्पत्ति

क्रमशः

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