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शिमला समझौते के विषय में

मित्रो ! आज 2 जुलाई है । आज का दिन भारत के इतिहास में ‘ शिमला समझौते ‘ के पर किए गए हस्ताक्षरों की साक्षी देता है । 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध के पश्चात 23 अप्रैल 1972 को दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि शिमला में एक बैठक कर युद्ध के पश्चात की परिस्थितियों को सामान्य किया जाए । तत्पश्चात लिए गए निर्णय के अनुसार शिमला में दोनों पक्षों की शिखर वार्ता का आयोजन किया गया ।

वार्त्ता में कोई सफलता नहीं मिल रही थी । जिसे देख कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो बहुत निराश हो गए थे । वह अपनी किशोर बेटी बेनजीर भुट्टो को लेकर रात्रि में श्रीमती इंदिरा गांधी के कक्ष में पहुंच गए । वहां पर उन्होंने गिड़गिड़ा कर श्रीमती इंदिरा गांधी से कहा कि वह खाली हाथ पाकिस्तान लौटना नहीं चाहते ।आप कुछ भी ना करें तो कम से कम मेरे 93000 पाकिस्तानी युद्धबंदी सैनिकों को तो रिहा कर ही दें । इसके बदले में इंदिरा गांधी ने कहा कि आप एलओसी को अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा मान लें तो यह सम्भव है ।

जुल्फिकार अली भुट्टो ने आश्वासन दिया और इंदिरा गांधी उसके आश्वासन पर ही सहमत हो गईं । सावरकर जी ने कहा था कि हमारी वीरता कभी युद्ध क्षेत्र में पराजित नहीं हुई , हम सदा ‘सद्गुण विकृति ‘ का शिकार होकर पराजय का सामना करते रहे हैं। – – – – – और 1972 में भी यही हुआ । जब युद्ध के मैदान में जीती हुई हमारी सेनाएं वार्त्ता की मेज पर जाकर नेताओं की अदूरदर्शिता के कारण पराजित हो गई ।हमारा नेतृत्व सद्गुण विकृति का शिकार होकर जीती हुई बाजी को हार गया । उसने 93000 पाकिस्तानी युद्धबंदी सैनिक छोड़ दिए । परंतु पाकिस्तान ने एलओसी को अंतरराष्ट्रीय रेखा मानने से बाद में इंकार कर दिया ।

क्या ही अच्छा होता कि श्रीमती गांधी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो से भी लिखित में यह लेतीं कि वह कश्मीर की पूरी रियासत को भारत का एक अंग मानता है और अब भारत पाक के मध्य भविष्य में कश्मीर समस्या को लेकर कोई विवाद नहीं रहेगा। पाकिस्तान उस समय दबाव में था और वह ऐसा लिख कर दे सकता था परंतु मारा नेतृत्व चूक कर गया ।

यदि भारतीय नेतृत्व से चूक न होती तो यह 2 जुलाई का दिन भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाने वाला दिन होता , जब कश्मीर समस्या का सदा सदा के लिए अंत हो गया होता।

शिमला समझौता के मुख्य बिंदु-1. दोनों देशों के बीच भविष्य में जब भी बातचीत होगी तो कोई मध्यस्थ या तीसरा पक्ष नहीं होगा।

इसके उपरांत भी भारत के कश्मीर के आतंकवादी संगठनों को वार्ता की मेज पर सम्मिलित करने के लिए कांग्रेस और धर्मनिरपेक्ष दल दबाव बनाते रहते हैं । यदि शिमला समझौते को ही सही मान लिया जाए तो भी भारत पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व के अलावा अन्य कोई भी पक्ष कश्मीर समस्या के समाधान में सहायक या मध्यस्थ नहीं होना चाहिए।

2.शिमला समझौता के बाद भारत ने 93 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा कर दिया।

3. 1971 के युद्ध में भारत द्वारा कब्जा की गई पाकिस्तान की जमीन भी वापस कर दी गई। इसका अभिप्राय था कि हमारे योद्धाओं ने जिस जमीन के लिए बलिदान देकर उसे प्राप्त किया था , उसे भी हमारे नेतृत्व ने मिट्टी में मिला दिया । यदि उस जीती गई जमीन को भी हम रख लेते तो भी पाकिस्तान पर भविष्य में दबाव बनाया जा सकता था कि हम आपकी जीती हुई जमीन छोड़ सकते हैं ,आप हमारा कश्मीर छोड़िए ।

4. दोनों देशों ने तय किया कि 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनाएं जिस स्थिति में थीं उस रेखा को वास्तविक नियंत्रण रेखा माना जाएगा। इसका अभिप्राय था कि कश्मीर का वह एक तिहाई भाग हमने पाकिस्तान का मान लिया जिसे पाकिस्तान ने स्वतंत्रता के एकदम उपरांत जबरन कब्जा लिया था ।

5. दोनों ही देश इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करेंगे।

6. आवागमन की सुविधाएं स्थापित की जाएंगी जिससे कि दोनों देशों के लोग एक दूसरे के यहां सरलता से आ जा सकें ।

सच ही तो है :–

‘ लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई । ‘

वास्तव में हमको पाकिस्तान से उस समय समझौता ना करके संधि करनी चाहिए थी । जिसे पाकिस्तान द्वारा तोड़ने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चुनौती दी जा सकती थी।

वैसे नेताओं की मूर्खताओं के स्मारकों पर फूल चढ़ाने का हमारा राष्ट्रीय संस्कार है , इसको भी ध्यान में रखना चाहिए।

राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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