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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

लोकसभा चुनाव: दुनिया का सबसे महंगा चुनाव

आजाद भारत का पहला चुनाव 1952 में हुआ था। भारत के संविधान में दी गई व्यवस्था के अनुसार संपन्न हुए इन चुनावों में उस समय मात्र 10.50 करोड रुपए खर्च हुए थे। भारत ने संसदीय लोकतंत्र को अपनाकर अपनी पुरातन राजतंत्रीय व्यवस्था को विदा कर दिया था। तब लोगों ने सोचा था कि अब बड़ी सहजता से अपने बीच के लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर शासन अपने हाथ में लेकर चलाएंगे। बहुत बड़ी आशाओं और सपनों के साथ हमने आगे बढ़ाना आरंभ किया। कुछ देर पश्चात ही हमें पता चल गया कि हम गलत दिशा में आगे जा रहे हैं। क्योंकि कुछ परिवारों ने पुरानी राजतंत्रीय व्यवस्था के नए संस्करण के रूप में राजनीतिक दल आधुनिक लोकतंत्र में लड़ने वाली फौज के रूप में खड़े किए, उन पर अपना एकाधिकार किया और धीरे-धीरे देश की सारी राजनीति पर अपना शिकंजा कस लिया। शासन सत्ता को हथियाने की आपाधापी में जब भारत के लोकतंत्र ने कुछ और दूरी तय की तो कई चीजें अस्त-व्यस्त होती चली गईं। बाहुबली और धनबली लोगों ने सज्जनों का राजनीति में प्रवेश सर्वथा बाधित कर दिया । जिन लोगों को देश का जनप्रतिनिधि बनाकर उनके माध्यम से जन सेवा और राष्ट्र सेवा कराने का सुनहरा सपना लोकतंत्र ने भारत के लोगों को दिखाया था , वे जनसेवी और राष्ट्र सेवी लोग विधानमंडलों के दरवाजे को देख भी ना पाएं, ऐसी व्यवस्था कर दी गई।
1957 के लोकसभा चुनाव आए तो अब तक का सबसे सस्ता चुनाव उस समय हमने होता हुआ देखा। उन चुनावों में केवल 5.9 करोड रुपए ही सरकारी स्तर पर खर्च हुए। इसके बाद 1962 के चुनाव में 7.3 करोड़, 1967 के चौथी लोकसभा चुनाव पर10.8 करोड़ , पांचवी लोकसभा के 1971 के चुनाव में 11.6 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसके बाद 1977 में जब छठी लोकसभा के चुनाव हुए तो उस समय खर्चा एकदम दुगुने से भी अधिक बढ़ा। तब सरकारी स्तर पर 23 करोड़ रूपया चुनाव पर खर्च हुआ। 1980 में यह खर्च बढ़कर 54.8 करोड़, 1984- 85 में 81.5 करोड़, 1989 में 154.2 करोड़ और 1991 – 92 में बढ़कर 359.1 करोड़ हो गया। यह खर्चा 1952 के चुनाव की अपेक्षा 35 गुना अधिक था।
1996 के लोकसभा चुनाव के समय इस खर्चे में वृद्धि होकर 597.3 करोड़ का खर्च हुआ । जबकि 1998 के चुनाव के समय 666.2 करोड़, 1999 के चुनाव में 947.7 करोड़, 2004 के लोकसभा के चुनाव में 1016.1 करोड़, 2009 के चुनाव पर 1114.4 करोड़ , 2014 के लोकसभा चुनाव पर 3870.3 करोड़ और 2019 के लोकसभा चुनाव पर 9000 करोड़ रूपया खर्च हुआ।
अब खबर आ रही है कि 2024 में संपन्न हो रहे लोकसभा चुनाव पर यह खर्च बढ़कर 1.20 लाख करोड़ का होने जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो भारत में ग्राम सभा से लेकर लोकसभा तक जितना चुनाव खर्च होता है यदि सरकारी आंकड़ों के अनुसार भी उसको जोड़कर देखा जाए तो यह 10 लाख करोड़ से भी ऊपर चला जाता है। निश्चित रूप से इतनी बड़ी धनराशि हमारे देश के कई राज्यों के बजट से भी अधिक है। जिस फिजूलखर्ची की प्रतीक राजशाही से बचने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने लोकशाही को देश में स्थापित किया था, क्या उसके बारे में उन्होंने कभी सोचा होगा कि यह भविष्य में जाकर इतनी महंगी हो जाएगी कि फिजूलखर्ची भी इसे देखकर अपने आप को लज्जित अनुभव करने लगेगी? इतनी बड़ी धनराशि को देखकर लगता है कि हम अपने लिए जनप्रतिनिधि नहीं चुन रहे हैं बल्कि राजा चुन रहे हैं । जिनके लिए राजकोष पर इतना अधिक भार देश की अर्थव्यवस्था को झेलना या ढोना पड़ रहा है । यह तो हुआ चुनाव खर्च , जो 5 वर्ष में आधुनिक राजा महाराजाओं के चुनाव पर हमें खर्च करना पड़ता है, इसके अतिरिक्त उनके वेतन, भत्ते सुविधा, सरकारी आवास, सुरक्षा आदि पर होने वाले खर्च को भी यदि इसमें जोड़ा जाए तो आंखें फटी की फटी रह जाती हैं।
एक आंकलन के अनुसार अब तक 17930 करोड़ रूपया देश के खजाने से लोकसभा चावन पर खर्च हो चुका है। 73 वर्ष में चुनावी खर्च 380 गुणा बढ़ा है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि 1951 में जब पहले चुनाव की तैयारी की जा रही थी तो 25000 रुपया एक प्रत्याशी को उस समय अपने चुनाव पर खर्च करने की अनुमति दी गई थी। 1980 में इसे 10 लाख कर दिया गया। 1998 में 15 लाख, 2004 में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के समय 25 लाख रुपए और 2014 में 70 लाख रुपए किया गया। इसके पश्चात 2019 में इसे बढ़ाकर 95 लाख रुपए कर दिया गया। इसी धनराशि को 2024 में संपन्न हो रहे चुनाव के समय प्रत्येक प्रत्याशी द्वारा खर्च करने के लिए निर्धारित किया गया है। यह अलग बात है कि अधिकांश प्रत्याशी चुनाव में इस धनराशि से बहुत आगे जाकर खर्च करते हैं। इस बात को चुनाव आयोग भी जानता है।
अब आते हैं समस्या के एक दूसरे पहलू पर। हमारा मानना है कि यह समस्या ही वर्तमान में भारत में व्याप्त बेरोजगारी, भुखमरी, अपराध और गरीबी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसको समझने पर पता चल जाता है कि वर्तमान भारत की बेरोजगारी, भुखमरी, अपराध और गरीबी की समस्याओं का मूल कारण भी यह लोकतंत्र ही बन चुका है। कहा जाता है कि लोकतंत्र इन सबसे लड़ता है, पर यदि भारत की सामाजिक समस्याओं को समझा जाए तो पता चलता है कि भारत में लोकतंत्र इन सारी समस्याओं को पैदा करता है। समझने की बात है कि भारत में ग्राम प्रधान से लेकर संसद तक के चुनाव में खड़े होने वाले लोग मोटा धन पानी की तरह बहाते हैं। इसमें दो राय नहीं हैं कि अनेक लोग भारत में इस समय ऐसे हैं जो राज्यसभा सांसद बनने के लिए कई सौ करोड़ रुपए देने को तैयार बैठे हैं। यही लोग जब किसी पार्टी से लोकसभा में जाने के लिए चुनाव लड़ते हैं तो उसमें भी पानी की तरह पैसा बहाते हैं। चुनाव में हारा हुआ प्रत्याशी नए सिरे से अगले चुनाव लड़ने की तैयारी करता है । जिसके लिए वह पहले दिन से ही पैसा जोड़ना आरंभ करता है। इसके लिए उसे पार्टी में बड़े नेताओं का संरक्षण पाने के लिए वहां भी ‘चढ़ावा’ चढ़ाना पड़ता है। अपने साथ कुछ लोगों को साथ लेकर चलना पड़ता है, उन सब की सारी आर्थिक जिम्मेदारियों को सहन करना पड़ता है। तब उसे इस सारे खर्चे को निकालने के लिए लोगों की संपत्तियों पर अवैध कब्जा करना और अपराध के माध्यम से लोगों में डर पैदा करने जैसे हथकंडों को अपनाना पड़ता है। आज की राजनीति का सच यह है कि जो इन सब कामों को कर सकता है, वही राजनीति में टिक सकता है। ऐसा न करने वालों को या तो राजनीति छोड़ देती है या वह राजनीति को छोड़कर चला जाता है। राजनीतिक लोगों की यह ‘ समाज सेवा’ ही देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी आदि को फैलाती है। निश्चित रूप से हम इस समय विश्व का सबसे महंगा चुनाव लड़ रहे हैं।
सांसद और विधायक से अलग हमारे देश में जिला परिषदों के चुनाव भी होते हैं। जिसके अध्यक्ष के लिए पार्टियों में बड़ी मारामारी होती है। यदि बात एनसीआर की करें तो यहां पर जिला परिषद का अध्यक्ष बनने के लिए लोग बहुत मोटा धन खर्च करते हैं। यहां तक कि ब्लॉक प्रमुख बनने के लिए भी लोग एक-एक वोटर को बड़ी-बड़ी गाड़ी गिफ्ट में दे देते हैं। राजनीतिक दलों को सच्चाई की पता है, पर पता होते हुए भी उपचार करने को कोई तैयार नहीं है। इस प्रकार के राजनीतिक दुराचरण के चलते सज्जनों का राजनीति में प्रवेश कुंठित हो गया
है। देश से बाहर कितना काला धन है ? इस पर अक्सर लेख लिखे जाते हैं,चर्चाएं होती हैं। राजनीतिक दल भी एक दूसरे पर कीचड उछलते रहते हैं कि अमुक पार्टी के अमुक नेता ने इतना काला धन ले जाकर विदेश में जमा कर दिया है? पर इस पर चर्चा नहीं होती कि राजनीतिक लोगों के द्वारा देश के चुनाव को ही कितना महंगा कर दिया गया है?
ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक की सीट को खुले आम लोग खरीद रहे हैं। सीटें नीलाम हो रही हैं। उसके साथ-साथ लोकतंत्र नीलाम हो रहा है। संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। …..और हम सब मौन होकर देखने के लिए अभिशप्त हैं। ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या हमारे लिए राजतंत्रीय व्यवस्था ही उपयुक्त नहीं थी ? जिसमें बैठे लोग कम से कम धन के भूखे तो नहीं थे। हमने ‘भूखों’ को ‘राजा’ बनाने के लिए देश के संसदीय लोकतंत्र की खोज की थी या फिर राजाओं को भूखों की सेवा करने के लिए संसदीय लोकतंत्र को स्थापित किया था? निश्चित रूप से हमारे संविधान निर्माताओं ने राजाओं को अर्थात देश के जनप्रतिनिधियों को भूखों की सेवा करने के लिए ही संसदीय लोकतंत्र को स्थापित किया था। हमने ही भूखों को अर्थात सर्वथा निकृष्ट और वाहियात लोगों को राजा अर्थात अपना जन प्रतिनिधि बनाकर देश के संसदीय लोकतंत्र का गला घोंट दिया है। ऐसे निकृष्ट लोगों के कारण ही देश का संसदीय लोकतंत्र का चुनाव महंगा होता जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी को चुनाव सुधार की दिशा में काम करते हुए इस ओर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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