हुक्का हरदम हरता है, प्राण

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लेखक आर्य सागर 🖋️

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक—16वीं शताब्दी में मुगल शासक अकबर के दरबार में अबुल फथ्तह नाम का अरबी हकीम आया। उसने भरे दरबार में यह दावा किया उसने धूम्रपान की एक अनोखी विधि यन्त्र को ईजाद किया है जिसका शरीर पर कोई नुकसान नहीं है । हुक्का के बारे में महज यह एक दावा था जब तक आधुनिक 20वीं सदी आते आते इस पर कोई शोध नहीं हुआ। मुगलो को हुक्का बहुत रास आया। धीरे-धीरे धूम्रपान का यह तरीका जो कभी भारत में प्रचलित रहा ही नहीं दुर्भाग्य से प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ भारत के जवान, किसान व मजदूर शिल्पी वर्ग में फैल गया, मूल भारतीय किसान कामगार क्या योद्धा क्या व्यापारी जो भी धूम्रपान के इस अनोखे तरीके की लत में आया इसी का ही होकर रह गया उन्हीं में से कुछ ने चालाकी से धूम्रपान के इस अनोखे तरीके को कथित सामाजिक स्वीकारयीता देते हुए इसे ‘पंचों का प्याला’ नाम दे दिया । मुगलों के दरबार से होते हुए हुक्का उत्तर पूर्वी अफ्रीका मध्य पूर्व अरब देशो तक फैल गया।

अविभाजित भारत में इसे हुक्का कहा जाता है तो उज़्बेकिस्तान अफगानिस्तान में इसे चिलम ,इजराइल में नरघिले, मिस सूडान अल्जीरिया मोरक्को में इसे शीशा उत्तरी अफ्रीकी देशों में इसे गोजा कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे वाटर पाइप टोबैको स्मोकिंग कहा जाता है इसमें इसका नाम रस प्रणाली दोनों शामिल है।

हकीम अबुल के समय से लेकर लंबे समय तक हुक्का को लेकर यही दावा किया जाता रहा कि-” इससे से धूम्रपान करने में शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचता क्योंकि धुआ नीचे इसके वॉटर बॉयल जिसे ‘जस्ती’ कहा जाता है उससे होकर गुजरने से शोधित हो जाता है। इस भ्रामक दावे का अंत 1990 में हुआ जब हुक्का का दुष प्रचलन अमेरिका व यूरोपीय देशों में पहुंचा वहां वैज्ञानिक तथ्य के आलोक में इसे कसौटी पर कसा गया।”
हुक्का को लेकर किया गया यह दावा झूठा सिद्ध हुआ।

हुक्के के धूम्रपान के संबंध में दूसरा दावा इसके बारे में यह किया गया जिसमें इसे नुकसानदायक तो माना गया लेकिन सिगरेट से कम नुकसान हुक्का पीने से होता है ऐसा कहा जाता है यह दावा भी झूठा सिद्ध हुआ।

वाटर पाइप टोबैको स्मोकिंग के बारे में जितने भी शोध हुए हैं उन सभी का निष्कर्ष यह निकला है 20 से 80 मिनट तक यदि हुक्का पिया जाता है जिसे हुक्के का एक सेशन कहते हैं इतनी अवधि के दौरान प्रयोग कर्ता के शरीर में 1 लीटर से लेकर 90 लीटर तक धुआं उसके शरीर में से होकर गुजर सकता है। हुक्का स्मोकिंग के एक सेशन में 50 से लेकर 200 कश लगते हैं एक कश में 150 एमएल से लेकर 1 लीटर तक कार्बन मोनोऑक्साइड निकोटीन व अन्य विषैले तत्त्वों धातुओं के रासायनिक मिश्रण से युक्त धुआं शरीर के अंदर जाता है।

वही 5 से 7 मिनट के दौरान सिगरेट के एक सेशन में 8 से 12 कश लगते हैं उसमें 75 से लेकर 40 एमएल नुकसानदायक धुआं शरीर के अंदर जाता है। हुक्का के एक सेशन में 100 सिगरेट जितनी स्मोकिंग हो जाती है। हुक्का व सिगरेट की स्मोकिंग की कोई तुलना नहीं की जा सकती दोनों ही गुणवत्ता के मामले में खतरनाक है।हुक्का के धूम्रपान से शरीर की रक्त धमनियां नस नाड़ियां कठोर अवरुद्ध हो जाती हैं। दांत मसूड़े से लेकर हृदय फेफड़े लिवर यहां तक की प्रजनन संस्थान सभी अंगों पर धूम्रपान का गंभीर असर पड़ता है। मस्तिष्क के न्यूरोन विशेष तौर पर क्षतिग्रस्त होते हैं। आधुनिक स्टडी में इसे डायबिटीज के लिए भी जिम्मेदार माना गया है क्योंकि यह शरीर में क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन सूजन बढ़ाता है। जिससे पेनक्रियाज डैमेज होती है।

हुक्का के बारे में एक और मिथक प्रचलित है जिसमें यह कहा जाता है कि इसके सेवन से पाचन क्रिया बेहतर होती है ।हुक्का और पाचन क्रिया के सुधार को लेकर कोई भी संबंध किसी भी स्टडी में नहीं मिला है ।इसका धुआं फेफड़ों में जाकर रक्त प्रणाली में पहुंचकर आंख के परदे से लेकर अन्य नाजुक अंगों को क्षतिग्रस्त करता है। उल्लेखनीय होगा एक युवक को मैं जानता हूं जो बहुत अधिक हुक्का पीता था आज वह कंपलीटली ब्लाइंड हो गया है अब वह खून के आंसू रोता है । मुख में असहनीय दुर्गंध इसके कारण होती है।पाचक रसों के निर्माण में इसका कोई योगदान नहीं है। लेकिन इस मिथक के कारण आजकल के दूधमुंहे बच्चे में उन्हें बच्चा ही कहूंगा 12 से लेकर 30-35 वर्ष की आयु वर्ग के युवक जमकर हुक्के तम्बाकू के नशे का सेवन कर रहे हैं और अपने प्रारब्ध से मिले स्वास्थ्य को नष्ट कर रहे हैं स्वास्थ्य को तो नष्ट कर ही रहे हैं अपने डीएनए को भी क्षतिग्रस्त कर रहे हैं धूम्रपान करने वाले की संतान को जन्म से जुड़ी बीमारियों का सर्वाधिक जोखिम रहता है विभिन्न अनुवांशिक शोध में इसकी पुष्टि हुई है यह स्टडी आज सिद्ध हो चुकी है। सुश्रुत संहिता में महर्षि सुश्रुत ने इसे बीज दोष कहा है। आईएलबीएस दिल्ली के निदेशक डॉ शिवकुमार सरीन ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘ओवन योर बॉडी’ में इस तथ्य को अपने 40 वर्ष से अधिक के चिकित्सा जीवन के अनुभव प्रयोगों में सिद्ध पाया है।

हमारे बुजुर्ग बिचारे अनपढ़ थे वह इसकी लता की चपेट में आए कहीं ना कहीं उन्होंने भी स्वास्थ्य के गम्भीर जोखिम उठाए । कोई स्वीकारे या ना स्वीकार करें। हालांकि उस समय खान-पान पर्यावरण का प्रदूषण नहीं था वह हुक्का एक्स्पोज़र को अपने उत्तम क्वालिटी के शारीरिक गठन हेल्दी अन्य दिनचर्या से जुड़ी हैबिट, स्वस्थ जेनेटिक जीन के कारण कुछ हद तक झेल पाए ।हमारी आज की पीढ़ी वायु प्रदूषण जलवायु परिवर्तन के इस युग में हुक्का के प्राण घातक प्रभाव का सामना करने में सक्षम नहीं है। हुक्का कल भी नुकसानदायक था आज भी है आगे भी होगा है । नीम को दूध से सीचने पर नीम मीठा नहीं हो जाता।यह बुराई रहेगा जितनी जल्दी हम इसे छोड़ सकेंगे उतना बेहतर है। मानसिक अवसाद तनाव कमजोर स्मृति से संबंधित स्टडी में भी हुक्का के निकोटिन से युक्त धुआं को जिम्मेदार माना गया है ।यह शरीर यह शारीरिक आरोग्य को शरीर से खोद खोद- कर बाहर निकाल देता है ऐसे में पंचों के कथित इस प्याले को आज ही तोड़कर विदाई दे दें हुक्का ना पिए ना किसी को पिलाएं इस बुराई से मुक्ति का संकल्प लें । जिस घर जिस बैठक ,या वर्क पैलेस पर हुक्का पार्टी चलती हो वहां भूल कर भी ना जाए संभव हो तो उन्हें भी जागरूक करें। देश के भावी कर्णधार अपने परिवारों की उम्मीद किशोर नवयुवकों से मेरा आग्रह है दुराग्रह ना करें विज्ञान को प्रमाण मानकर विशेषज्ञ जनों के वचनों पर आदर दिखाते हुए जिम्मेदार जागरूक नागरिक होने का परिचय दें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन दशको पहले ही के धुम्रपान के सभी तरीकों के साथ साथ हुक्का के माध्यम से धूम्रपान पर पुर्ण वैश्विक प्रतिबंध की सिफारिश कर चुका है दुनिया के बहुत से देश ने वाटर पाइप स्मोकिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है तो वहीं कुछ देशों इसके सेवन को लेकर आयु सीमा निर्धारित की है।

कोई भी बुराई किसी भी समाज की आन बान शान नहीं हो सकती हुक्का आदि से अंत तक बुराई है फिर करोड़ों वर्षों की प्राचीन भारतीय गौरवशाली वैदिक संस्कृति समाज के प्रतिनिधियों में यह बुराई तो महज 4से 5 सदी पुरानी है। किसी भी समाज समुदाय की समृद्ध स्वस्थ परंपरा रीति नीतियां सात्विक चिंतन व विमर्श उस समाज की आन बान शान होती है।

समझदार को इशारा ही काफी होता है आगे आप भली-भांति विचार करें।

लेखक आर्य सागर

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