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ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ?*

Dr DK Garg

भाग 2 अंतिम

इसीलिए यह मान्यता है की ब्राह्मण का जन्म ब्रह्म के मुख से हुआ । क्षत्रिय का बाहु से, वैश्य का जंघा से और शूद्र का पैरों से हुआ ।
ये कथन एक अलंकारिक भाषा है। जो की अज्ञानता के कारण यजुर्वेद के एक मंत्र की गलत व्याख्या के कारण हुआ।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।। (यजुर्वेद 31.11)
इस मंत्र का वास्तविक अर्थ करते हुए महर्षि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में लिखते हैं कि ईश्वर के निराकार होने से उसके मुखादि अङ्ग ही नहीं हैं तो मुख आदि से उत्पन्न होना असम्भव है जैसा कि वन्ध्या स्त्री आदि के पुत्र का विवाह होना ! और जो मुखादि अङ्गों से ब्राह्मणादि उत्पन्न होते तो उपादान कारण के सदृश ब्राह्मणादि की आकृति अवश्य होती। जैसे मुख का आकार गोल मोल है वैसे ही उनके शरीर भी गोलमोल मुखाकृति के समान होना चाहिये। क्षत्रियों के शरीर भुजा के सदृश, वैश्यों के ऊरू के तुल्य और शूद्रों के शरीर पग के समान आकार वाले होने चाहिये। परन्तु ऐसा नहीं होता ।

और मनुष्य का जन्म तो गर्भाशय से से होता है। इसलिए ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा के मुख से कहना ही अज्ञानता है।
वैदिक काल में आर्यों ने जो मुख्य व्यवस्थाएं प्रचलित की उनमें आश्रम व्यवस्था जिसमें जीवन को चार आश्रम में विभाजित किया गया था, ब्रह्मचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास. इसके अतिरिक्त वर्ण व्यवस्था भी थी इसमें समाज चार भागों में विभक्त किया गया था, जो कि आर्यों के गुण और कर्म के आधार पर थी न कि जन्म के आधार पर। धर्म-शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था समाज को चार वर्णों -ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित करती है। जो की कर्म पर आधारित है , ना की जन्म के आधार पर।
ब्राह्मण कौन है?* :जो वेदों का ज्ञाता हो। ब्राह्मण है इसका कार्य शेष तीन वर्णों को वेद अध्ययन करना करवाने या शिक्षा देना, शस्त्र शास्त्र के बारे में बताना, समाज को दिशा देने, इंद्रियों पर नियंत्रण कर सद्मार्ग पर चलना और सामाजिक तथा धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करना है.

जो कोई माता-पिता के रज-वीर्य के योग से वर्णाश्रम-व्यवस्था माने और गुण कर्मों के योग से न माने तो उससे पूछना चाहिये कि जो कोई अपने वर्ण को छोड़ नीच, अन्त्यज अथवा कृश्चीन व मुसलमान हो गया हो, उस को भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते? यहां यही कहोगे कि उस ने ब्राह्मण के कर्म छोड़ दिये इसलिये वह ब्राह्मण नहीं है। इस से यह भी सिद्ध होता है कि जो ब्राह्मणादि उत्तम कर्म करते हैं, वे ही ब्राह्मणादि और जो निम्न कुल का व्यक्ति भी उत्तम वर्ण के गुण, कर्म, स्वभाव वाला होवे तो उसको भी उत्तम वर्ण ब्रह्मण में और जो उत्तम वर्णस्थ होके नीच काम करे तो उसको नीच वर्ण में गिनना अवश्य चाहिये।
यास्क मुनि के अनुसार-
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत द्विजः।
वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
योग सूत्र व भाष्य के रचनाकार महर्षि पतंजलि के अनुसार-
विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मणकारकम्।
विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥
अर्थात- ”विद्या, तप और ब्राह्मण-ब्राह्मणी से जन्म ये तीन बातें जिसमें पाई जाएं वही पक्का ब्राह्मण है, पर जो विद्या तथा तप से शून्य है वह जातिमात्र के लिए ब्राह्मण है, पूज्य नहीं हो सकता” (पतंजलि भाष्य 51-115)।
महाभारत के कर्ता वेदव्यास और नारदमुनि के अनुसार-
“जो जन्म से ब्राह्मण हे किन्तु कर्म से ब्राह्मण नहीं हे उसे शुद्र (मजदूरी) के काम में लगा दो” (सन्दर्भ ग्रन्थ – महाभारत)
महर्षि याज्ञवल्क्य व पराशर व वशिष्ठ के अनुसार-
“जो निष्कारण (कुछ भी मिले एसी आसक्ति का त्याग कर के) वेदों के अध्ययन में व्यस्त हे और वैदिक विचार संरक्षण और संवर्धन हेतु सक्रीय हे वही ब्राह्मण हे.” (सन्दर्भ ग्रन्थ – शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद मंडल १०., पराशर स्मृति)
उन दिनों प्रचलित जन्मना वर्णव्यवस्था के सन्दर्भ में महर्षि दयानन्द कहते हैं कि क्या जिसके माता पिता ब्राह्मण हों, वह ब्राह्मणी-ब्राह्मण होते हैं और जिसके माता-पिता अन्य वर्णस्थ हों, क्या उनके सन्तान कभी ब्राह्मण हो सकते हैं? इसका उत्तर देते हुए वह कहते हैं कि हां। भी जो उत्तम विद्या स्वभाव वाला है वही ब्राह्मण के योग्य और मूर्ख शूद्र के योग्य होता है और वैसा ही आगे भी होगा। वह प्रश्न करते हैं कि भला माता-पिता के रज-वीर्य से जो शरीर हुआ है वह बदल कर दूसरे वर्ण के योग्य कैसे हो सकता है?
ब्राह्मणों की उत्पत्ति विराट् या ब्रह्म के मुख से कही गई है क्योकि ब्राह्मण का कार्य अध्यापन, अध्ययन, यजन, याजन, दान ओर प्रतिग्रह ये छह कर्म ब्राह्मणों के कहे गए हैं, इसी से उन्हें षट्कर्म भी कहते हैं । ब्राह्मण के मुख में गई हुई सामग्री देवताओं को मिलती है; अर्थात उन्हीं के मुख से वे उसे प्राप्त करते हैं ,
ब्राह्मण वास्तव में हमारे ऋषियों — मुनियों द्वारा प्रदत्त, वर्णाश्रम परंपरा का एक आश्रम है जो क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र में, अपने कर्मों द्वारा, परिवर्तित हो सकता है । हमारे शास्त्रों में कहा गया है – ” जन्मना जायते शूद्र:, कर्मणो ब्राह्मण: ” अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं किंतु कर्म अर्थात विद्या -अध्ययन, ब्रह्म – ज्ञान तथा अध्यात्म इत्यादि से परिपूर्ण होने पर ही ब्राह्मण बनते हैं ।
सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर ज्ञान द्वारा ये चार ब्राह्मण ऋषी उत्पन्न हुए ।अग्रि, वायु, आदित्य और अंगिरा- इन चारों मनुष्यों को जैसे वादित्र (=बाजा, वाद्य) को कोई बजावे, काठ की पुतली को चेष्टा करावे, इसी प्रकार ईश्वर ने उनको निमित्त मात्र किया था।’ इस विषय में स्व. डॉ. स्वामी सत्यप्रकाश जी का कथन भी उल्लेखनीय है-आप कहीं नमक भरा एक ट्रक खड़ा कर दीजिए, परन्तु एक भी चींटी उसके पास नहीं आएगी। इसके विपरीत यदि एक चम्मच खाण्ड या मधु रखेंगे तो दो-चार मिनटों में ही कई चींटियाँ वहाँ आ जाएगी। मनुष्य तो चखकर ही जान पाता है कि नमक यह है तथा खाण्ड वह है, परन्तु चींटियों को यह ज्ञान बिना चखे होता है। ईश्वर बिना मुख उन्हें यह ज्ञान देता है। आपने चींटियों को पंक्तिबद्ध एक ओर से दूसरी ओर जाते देख होगा। चलते-चलते वे वहाँ रुक जाती हैं, जहाँ आगे पानी पड़ा होता है अथवा बह रहा होता है। क्यों? पानी में बह जाने का, मर जाने का उन्हें भय होता है। प्राण बचाने हेतु पानी में न जाने का ज्ञान उन्हें निराकार ईश्वर ही देता है। मुख से बोलकर ज्ञान देने का प्रश्न वहाँ भी लागू नहीं होता, क्योंकि ईश्वर काया रहित है तो मुख से बोलेगा कैसे ? वह तो चींटियों के मनों में वाञ्छनीय ज्ञान डालता है।
सारांश : उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है वेदों को श्रुति कहा गया है ,जिसको सुनकर ईश्वर ब्रह्मा के द्वारा ज्ञान प्राप्त के उपरांत ऋषि मुनियों द्वारा आगे लाया गया। और आज भी वेद ज्ञान सार्वभौम है। ऐसी ज्ञान की शिक्षा का प्रसार करना ब्राह्मण वर्ण में आता है जिसको अलंकारिक भाषा में कहा गया की ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख्य से निकले या पैदा हुए ।

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