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आज का चिंतन

भागवत कथा रहस्य* *एक मनोरंजन का साधन ? भक्ति या ज्ञान वर्धन?* भाग -२

*Dr DK Garg

निवेदन: ये लेख 15 भाग में है, कृपया अपने विचार बताये ,ये भाग दो काफी बड़ा हो गया है,लेकिन रोचक है।
भागवत कथा पहला दिन – धुंधकारी की कथा
पहले दिन संगीत की धुन के साथ कथाकार धुंधकारी की कथा को सुनाता है जो संक्षेप में इस प्रकार है — तुंगभंगा नदी के किनारे के एक गांव में आत्म देव नाम का एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी धुंधली रहती थी। आत्म देव तो सज्जन था लेकिन उसकी पत्नी दुष्ट प्रवृति की थी। इनको कोई संतान नहीं थी इसलिए ब्राह्मण ने बहुत बार उसने आत्महत्या करने की भी कोशिश किया लेकिन सफल नहीं हो पाया। एक दिन आत्म देव को रास्ते में एक ऋषि जी मिले और फिर आत्म देव ऋषि को अपनी कहानी सुना कर रोने लगा और उपाय पूछने लगा। ऋषि ने कहा मेरे पास अभी तो ऐसा कुछ नहीं की जिससे मैं तुम्हें कुछ दे पाऊं, लेकिन आत्म देव ने बताया की उसकी गाय को कोई बच्चा नहीं हो रहा है तो ऋषि ने उसे एक फल दिया और उसको अपनी पत्नी को खिलाने को कहा और कहा की एक साल तक तुम्हारी पत्नी को सात्विक जीवन जीना पड़ेगा। आत्म देव वह फल लेकर ख़ुशी ख़ुशी घर वापस आकर सारी बात धुंधली को बताता है और उसको वो फल खाने को देता है।
पत्नी ने ये फल नहीं खाया और जाकर सारी बात अपने छोटी बहन को बताई तो उसकी बहन ने उसे एक रास्ता बताया और कहा की मैं गर्भवती हूँ और मुझे बालक होने वाला है तू ही लेना उसको और उस फल को गाय को खिला दे इससे उस ऋषि की शक्ति का भी पता चल जायेगा। धुंधली ने ऐसा ही किया। और अपने पति आत्म देव के सामने गर्भावस्था का नाटक करने लगी और कुछ दिन बाद जाकर अपने बहन से उसका बच्चा लेकर आ गयी। आत्म देव बहुत खुश हुआ खुशियां मनाई और उस बच्चे का नाम ब्रह्मदेव रखना चाहा लेकिन धुंधली ने फिर झगड़ कर उसका नाम धुंधकारी रखा। और धुंधली ने जो फल गाय को खिलाये थे उसके भी गर्भ से मनुष्य का बालक हुआ जिसके कान लम्बे लम्बे थे इसीलिए उसका नाम आत्म देव ने गोकर्ण रखा।

दोनों बड़े हो गए जिसमें धुंधकारी दुष्ट व चाण्डाल प्रवृति का था तो गोकर्ण सरल स्वभाव का था। धुंधकारी सारे गलत काम करता एक दिन तो उसने अपने पिता आत्म देव की ही पिटाई कर दी। आत्म देव बहुत दुखी हुआ और अपने दुखी पिता को देख गोकर्ण उनके पास आया और उनको वैराग्य जीवन जीने के लिए कहा। और कहा की संसार में हम बस भागवत दृष्टि रखकर ही सुखी हो सकते है। गोकर्ण की बात मानकर आत्म देव गंगा के किनारे आकर भागवत के दशम स्कंध का पाठ करने लगे थे और उसी जीवन में उन्हें भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति हो गयी थी।
समय बीतता गया और एक दिन धुंधली भी धुंधकारी के अत्याचारों को देख दुखी होकर एक कुएँ में कूद कर आत्महत्या कर ली। अब धुंधकारी एकदम ही अत्याचारी और दुष्कर्म वाला इंसान बन गया था। लोगों ने धुंधकारी को बांध कर उसको जलती हुई आग में उसका मुख डालकर तड़पा कर मार डाला। बुरे प्रवृति के होने की वजह से धुंधकारी प्रेत बन गया और वह अपने भाई गोकर्ण को डराने लगा।
हालाँकि गोकर्ण ने अपने भाई का श्राद्ध गया जाकर किया था लेकिन धुंधकारी को फिर भी मुक्ति नहीं मिली। वह गोकर्ण को डराने के कोशिश करता लेकिन गोकर्ण गायत्री मंत्र का जाप करता तो धुंधकारी उसके पास नहीं जा सकता था। गोकर्ण ने जब कहा की मैंने तो तुम्हारा पिंडदान कर दिया हूँ फिर भी तुम प्रेत बन घूम रहे हो तो धुंधकारी बोलता है की मैंने इतना पाप किया है पिंडदान से मेरा मुक्ति नहीं होगा।
उसके बाद गोकर्ण ने सभी विद्वानों और सूर्य देवता से राय ली तो सूर्य देव ने कहा की इसको मोक्ष की प्राप्ति भागवत कथा सुनने से ही होगी।
गोकर्ण ने भागवत कथा का आयोजन किया और धुंधकारी एक बांस पर जाकर छिप कर बैठ गया वहां पर सात गांठ था वो वहीं जाकर बैठा था।पहले दिन के कथा में पहला गांठ का भेदन हुआ ऐसे ही दूसरे दिन दूसरे में ऐसे करके सातों गांठों का भेदन हो गया। धुंधकारी दिव्य रूप धारण कर प्रकट हो गए और उनको लेने भगवान स्वयं आये। इसका कारण ये यह है की धुंधकारी ने पूरी भागवत कथा श्रद्धा तथा प्रेम भाव से सुना था।

विष्लेषण

इस काल्पनिक कथा में कुछ भी ज्ञान वर्धक और धार्मिक नहीं है तुंग भद्रा नदी दक्षिण भारत में कई नदियों का समूह है। जब कथाकार ने नदी का नाम दिया तो उस स्थान और गांव का नाम भी बता देना चाहिए।क्योंकि श्रोता की यह जानने इच्छा हो सकती है ।
इंसान के बहुमूल्य समय और पैसा की बरबादी के साथ साथ इस कथा को स्वीकार करने में कई दोष आते है।

पहला ; ये कथा किसी ब्राह्मण परिवार की घटना को लेकर सुरु हुई है जिसमे ब्राह्मण को जन्म से ब्राह्मण दिखाया है ,विद्वान ब्राह्मण नही,वह अपनी पत्नी से दुखी है ,नपुंसक है,डरपोक है ,आत्म हत्या करने पर उतारू है ,पत्नी उसको मुर्ख बनाने में माहिर है। ब्राह्मण को विद्वान , कर्म कांडी नही दिखाया ।
कथाकार झूठी कहानी को इस तरह से सुनाया करते हैं जैसे उनके सामने को घटना हो और इतिहास में दर्ज हो।
इस प्रकार से भारतीय संस्कृति और ब्राह्मण का अपमान ये लोग करते है।

ब्राह्मण की परिभाषा समझ ले:

पढने-पढ़ाने से,चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से,परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद,विज्ञान आदि पढने से,कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है।-मनुस्मृति 2/2

ब्राह्मण वर्ण है जाति नहीं। वर्ण का अर्थ है चयन या चुनना और सामान्यत: शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है। व्यक्ति अपनी रूचि, योग्यता और कर्म के अनुसार इसका स्वयं वरण करता है, इस कारण इसका नाम वर्ण है। वैदिक वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

ब्राह्मण का कर्म है विधिवत पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना, दान प्राप्त करना और सुपात्रों को दान देना।

दूसरा दोष है ईश्वरीय नियम और विज्ञान के विरुद्ध घटना गढ़कर धार्मिक कथा कहना उसको सत्य स्वीकार करना :
इस कथा में गाय फल खाकर पुरुष को जन्म देती है,जिसका लालन पालन आत्म देव का परिवार करता है।
क्या पशु के गर्भ से मनुष्य जन्म ले सकता है?

नहीं, इंसानी वीर्य से जानवरों को गर्भ नहीं ठहर सकता है, और जानवरों के सीमन से इंसानों में गर्भ नहीं ठहर सकता है। गर्भधारण एक जटिल बायोलॉजिक प्रक्रिया है जिसमें महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु मिलते हैं और गर्भ की शुरुआत होती है। मानवों और जानवरों के जीवन प्रजनन प्रक्रिया में बिल्कुल अलग होते हैं और इन जीवों के जीवन प्रजनन प्रक्रिया में कोई बहुत बड़ी समानता नहीं होती है।

मानवों के लिए गर्भधारण के लिए महिला के गर्भाशय में एक अंडाणु के साथ पुरुष के शुक्राणु की मिलाप की आवश्यकता होती है। यह मिलाप योनि में होता है और गर्भ धारण की प्रक्रिया की शुरुआत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
पशु के शुक्राणु में मानव शुक्राणु की तरह एक्रोसोमल कैप नहीं होता है जो उसे निषेचन के लिए एक महिला के अंडे में प्रवेश करने में सक्षम बनाता है। दूसरे, महिला के अंडे में ज़ोना पेलुसिडा नामक एक परत होती है जो गलत शुक्राणु के साथ निषेचन को रोकती है।
विज्ञान कहता है कि गाय के गर्भ से मनुष्य पैदा नहीं हो सकता।क्योंकि
यह प्रक्रिया जानवरों के साथ नहीं होती है, और इसलिए इंसानों और जानवरों के बीच इस प्रकार का गर्भधारण नहीं हो सकता है।
और इस कथा में तो गाय एक फल खाकर गर्भवती हो गई और मनुष्य को जन्म दे दिया।
तीसरा दोष:
कथाकार ने तीसरा पाप हमारे ऋषि मुनि एवं बाहमण परिवार की महिलाओं को झूठी, चालाक और कलेश करने वाली बात बताकर कंलकित करने का प्रयास किया है क्योंकि हमारे महिलाएँ पूर्व काल सें विदुषी रही है और उनकी छवि सरस्वती एवं देवी की है।

चौथा ; कथाकार ने अपनी दुकान चलाने के लिए और बड़े झूठ का सहारा लिया है कि भागवत कथा सुनने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। तो ईश्वर की न्याय व्यवस्था एवं करनी भरनी पर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा तथा मोक्ष का ठेका कथा सुनाने वालो को मिल जायेगा.
मोक्ष की प्राप्ति इतनी आसन बना दी है जैसे आटे से रोटी बना देना.सत्य ये है की मोक्ष के लिए अच्छे कर्म, अष्टांग योग का पालन अनिवार्य है।

पांचवा दोष कथा में मृतक श्राद्ध एवं पिण्ड दान को भी शामिल कर लिया।ताकि कथा के बाद भी अन्धविश्वास चलता रहे। भूत प्रेत इसकी सत्यता का आजतक कोई प्रमाण नही दे पाया।

श्राद्ध क्या है?
एक पंक्ति में एक छोटा वाक्य है कि आत्मा अजर-अमर है। शरीर जन्म लेता है और अंत में महायात्रा पर निकल जाता है। यह जीवन का एक ऐसा कटु सत्य है जिसे प्रत्येक व्यक्ति जानता है किन्तु इसके बावजूद भी अंधविश्वास की एक दुनिया है जो कहती कि पाखंड भी अजर है।

इस अलग दुनिया के अपने-अपने पाखंड और अंधविश्वास है जो परम्पराओं के नाम पर और भय के आधार पर खड़े किये गये हैं। पितरों के श्राद्ध के नाम पर उनकी आत्मा को तृप्त करने की और पितरों को खुश करने की क्रिया का ये कार्य बड़े सम्मान से करते है जिसे अंधविस्वासी लोग श्राद्ध कहा जाता है।
सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी श्राद्ध के असल रूप को प्रकट करते हुए पितृयज्ञ के दो भेद बताये हैं एक श्राद्ध और दूसरा तर्पण। श्राद्ध यानि जिस क्रिया से सत्य का ग्रहण किया जाय उस को श्रद्धा और जो श्रद्धा से कर्म किया जाय उसका नाम श्राद्ध है तथा जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान माता-पिता प्रसन्न हों उसका नाम तर्पण है। परन्तु यह जीवितों के लिये है। मृतकों के लिये नहीं है।

पिंड दान क्या है?

मृतक द्वारा छोड़े गए धन में से प्राप्त धन का कुछ हिस्सा सभी लाभार्थी द्वारा संयुक्त रूप से शिक्षा आदि के लिए दान करने की प्रक्रिया पिंड दान कहलाती है।
सात दिन की कथा:
इतना ही नहीं कथाकार ने बडी चालाकी से सात गाठें बाँध कर लिए सात दिन तक कथा सुनने के लिए, अपना भक्त तैयार करने की व्यूहरचना इसकथा के माध्यम से की है।
भागवत कथा के श्रोता स्वयं निर्णय करे की कथा कितनी सत्य और वैज्ञानिक दृष्टि से विश्वास करने योग्य हैं?

आगे भाग तीन,

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