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अध्याय 6 ……तो क्या इतिहास मिट जाने दें भारत की गौरव गाथा को प्रस्तुत करती एक फिल्म

अपने इतिहास पर गौरव की अभिव्यक्ति करते हुए महान कवि मैथिलीशरण गुप्त जी लिखते हैं :-

गौतम, वशिष्ट-ममान मुनिवर ज्ञान-दायक थे यहाँ,
मनु, याज्ञवल्कय-समान सत्तम विधि- विधायक थे यहाँ । वाल्मीकि-वेदव्यास-से गुण-गान-गायक ये यहाँ,
पृथु, पुरु, भरत, रघु-से अलौकिक लोक-नायक थे यहाँ ।।

सचमुच राष्ट्रकवि के यह शब्द बड़े ही मार्मिक हैं। सटीक हैं। गौरवपूर्ण हैं। प्रत्येक देशवासी को इस प्रकार के पवित्र राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत होना ही चाहिए। कवि की कविता राष्ट्र के लिए कालजयी तभी होती है जब प्रत्येक काल में वह लोगों का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो।

पोन्नियिन सेल्वन 2

पोन्नियिन सेल्वन पार्ट – 1 की सफलता के पश्चात अब पोन्नियिन सेल्वन 2 ,28 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। भारत की गौरव गाथा को प्रस्तुत करने वाली यह मूवी निश्चित रूप से नई पीढ़ी को अपने अतीत के बारे में बहुत कुछ समझाने में सफल होगी। पार्ट – 1 के माध्यम से देश के लोगों को इतिहास की बहुत ही सटीक जानकारी मिल चुकी है। अब इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए यह मूवी रिलीज हो रही है। इस फिल्म के निर्माताओं ने ‘पोन्नियिन सेल्वन 2’ के शानदार पोस्टर के साथ फिल्म के ट्रेलर को जारी करने का निर्णय लिया है।
पोन्नियिन सेल्वन प्रसिद्ध लेखक कल्कि कृष्णमूर्ति के इसी नाम के सुप्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित है। ‘पोन्नियिन सेल्वन’ (Ponniyin Selvan) 30 सितंबर 2022 रिलीज हुई थी। इंडियन बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने 250 करोड़ से अधिक की कमाई की थी।
वास्तव में जब हमारे देश की फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग देश की युवा पीढ़ी को सुधारने के दृष्टिकोण से कोई भी इस प्रकार का कार्य करते हैं तो बड़ी आत्मिक प्रसन्नता होती है। यह सच है कि फिल्म निर्माण का उद्देश्य भी यही है कि कोई ऐसा महत्वपूर्ण संदेश देश के लोगों के लिए और विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए जाना चाहिए ,जिससे उन्हें प्रेरणा मिले और उन्हें सार्थक जीवन जीने के लिए सकारात्मक संदेश प्राप्त हो।
इस फिल्म के माध्यम से हमारी युवा पीढ़ी समझ पाएगी कि किस प्रकार चोल राजवंश ने मां भारती की अनुपम सेवा करते हुए भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूती प्रदान की थी ? इस वंश के संस्थापक विजयालय नामक राजा ने 850 ई0 में जिस राजवंश की स्थापना की उसने भारत के इतिहास को 300 वर्ष तक प्रभावित किया। निरंतर 300 वर्ष तक देश के वैभव और गौरव का नेतृत्व करना हर किसी राजवंश के भाग्य में नहीं लिखा होता ।
हमारा मानना है कि इतनी देर तक सेवा करने का अवसर उसी को प्राप्त होता है जो अवसर का सदुपयोग करना जानता है। जिसने सत्य निष्ठा से अपने व्रत का निर्वाह किया हो और जो अपने राज्य धर्म व राष्ट्र धर्म को जानता हो, वही कर्तव्यपरायण शासक या उसका राजवंश ही इतनी देर तक राष्ट्र सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त कर पाता है । इसमें दो मत नहीं है कि चोल राजवंश के कर्तव्यपरायण और प्रजावत्सल शासकों ने अपने राजोचित गुणों के कारण ही इतनी देर तक राष्ट्र की सेवा की थी।

उत्तर भारत की स्थिति

जब उत्तर भारत में 712 ई0 में मोहम्मद बिन कासिम एक आक्रमणकारी के रूप में भीतर तक आने में सफल हो गया था तब जहां उत्तर भारत में उस समय बड़ी तेज राजनीतिक गतिविधियां चलीं और देश को विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए नए-नए गठबंधन और राजनीतिक शक्तियों का उदय हुआ, उसी प्रकार दक्षिण में भी देश के सम्मान को बढ़ाने के लिए छठी सातवीं शताब्दी के बीच इस शक्तिशाली साम्राज्य का उदय हुआ। उत्तर भारत में जहां कश्मीर का कर्कोटक राज्य महत्वपूर्ण कार्य कर रहा था, वहीं चित्तौड़ के राणा वंश के संस्थापक बप्पा रावल और प्रतिहार वंश के नागभट्ट प्रथम और उनके पश्चात उनके अन्य उत्तराधिकारी देश के सम्मान को बढ़ा रहे थे, वहीं सुदूर दक्षिण का यह चोल साम्राज्य एक से बढ़कर एक प्रतापी शासक देकर देश का सम्मान बढ़ा रहा था। इसी वंश में राजेंद्र चोल प्रथम हुए। तत्कालीन भारत के इन महान देशभक्तों को देखकर मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि :-

आदर्श जन संसार में इतने कहाँ पर हैं हुए ?
सत्कार्य्य-भूषण आर्य्यगण जितने यहाँ पर हैं हुए ।
हैं रह गये यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे ।
पर दूसरों के भी वचन साक्षी हमारे हो रहे॥

 राजेंद्र चोल प्रथम और उनके वंश के प्रतापी शासकों ने देश का सम्मान बढ़ाते हुए 3600000 वर्ग किलोमीटर का विशाल साम्राज्य स्थापित किया। यदि थोड़ी देर के लिए मुगल साम्राज्य के औरंगजेब कालीन साम्राज्य विस्तार को छोड़ दें तो किसी भी विदेशी आक्रमणकारी का भारत के इतने बड़े क्षेत्र पर शासन स्थापित नहीं हुआ था। इस के उपरांत भी भारत के इतिहास से हमारे इन चोल राजाओं को लगभग बाहर कर दिया गया है । इन्हें स्थानीय शासक के रूप में किसी प्रांत विशेष में चाहे सम्मान प्राप्त हो, पर राष्ट्रीय इतिहास में राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने के लिए भारत के ये रत्न आज तक दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

साम्राज्य विस्तार

भारत की गौरव गरिमा की धर्म ध्वजा को हाथ में लेकर भारत के इस गौरवशाली राजवंश ने श्रीलंका, मालदीव, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो कंबोडिया, आज का बांग्लादेश , बर्मा इसके अतिरिक्त आज के कर्नाटक, उड़ीसा, प0 बंगाल , बांग्लादेश, इंडोनेशिया पर अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया था। इन सारे देशों में इनकी गौरव गरिमा का डंका आज तक बज रहा है। इन देशों के अतीत के इतिहास की परतों को उठाकर यदि देखा जाता है तो उनके इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर उनकी स्वर्णिम किरणें आज तक बिखरी हुई मिल जाती हैं। इन स्वर्णिम किरणों के प्रकाश को समेटकर अपनी शानदार विरासत बनाना भारत का अधिकार कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। यदि दुर्भाग्यवश हम इस प्रकार के अपने अधिकार से पीठ फेर कर खड़े हो गए तो आने वाली पीढ़ियां हमको कभी क्षमा नहीं कर पाएंगी।
इन सभी बाहरी देशों में आज भी भारतीय संस्कृति के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। इन प्रमाणों से भी पता चलता है कि यहां पर कभी हमारे प्रतापी शासकों का शासन रहा है। कंबोडिया में स्थित अंकोरवाट के 16,26000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैले हुए विशाल मंदिर का निर्माण भी इसी काल में हुआ था । जिसे वहां के हिंदू राजा सूर्यवर्मन ने 1112 से 1153 ईसवी के बीच बनवाया था। इस मंदिर में भारत की वैदिक संस्कृति के स्पष्ट प्रमाण आज भी मिलते हैं। कंबोडिया का अंकोरवाट का यह मंदिर भारत के गौरवपूर्ण अतीत का एक स्मारक है। यह एक जीता जागता इतिहास है जिसकी एक-एक ईंट हमारे गौरव का बखान कर रही है। इसकी भव्यता पर हमारा अधिकार है। इसकी दिव्यता पर हमारा अधिकार है । इसका गौरव हमारा गौरव है।

राजा जय वर्मा का विष्णु मंदिर

राजा जय वर्मा तृतीय ने कंबोडिया में अंकोरथोम को अपनी राजधानी बनाया था। जिसका निर्माण 40 वर्ष में 860 ईसवी से 900 ईसवी के बीच हुआ था। इसी राजा ने विष्णु मंदिर बनवाया था। जिसमें महाभारत, रामायण, वेद, उपनिषद व पुराणों का अध्ययन अध्यापन होता था। राजेंद्र चोल ने उत्तर भारत में बंगाल और आज के बांग्लादेश तक अपना कब्जा किया था। उसने 1023 से 1027 ई0 के मध्य एक विशेष सैन्य अभियान चलाया था। जिसके माध्यम से वह सुदूर दक्षिण से चलकर 2000 किलोमीटर का लंबा सफर तय करते हुए गंगा तट पर आया था। जहां से गंगाजल लेकर वह अपनी राजधानी तंजावुर लौटा था। इस जल से उसने अपनी नई राजधानी का शिलान्यास किया था। अपनी नई राजधानी का नाम भी उसने गंगईकोंड चोलापुरम गंगा के नाम पर ही रखा था।
जब राजा इस विशेष अभियान पर था तो देश के अनेक राजाओं ने उसका वैसे ही स्वागत किया था, जैसे कोई अपने भाई का स्वागत करता है। कई राजाओं को राजेंद्र चोल प्रथम की विशाल सेना ने परास्त भी किया था। एक राजा अपनी बड़ी सेना के साथ ऐसे अभियान पर निकले और दूसरे राजा उसका स्वागत करें, इससे हमारे सांस्कृतिक समन्वय और संबंधों की जानकारी होती है। जब राजेंद्र चोल अपने मित्र राजा भोज के साम्राज्य से निकल रहे थे तब राजा भोज और राजेंद्र चोल की संयुक्त शक्ति के भय से 60 किलोमीटर दूर कालिंजर में खड़ा महमूद गजनबी अपनी सेना लेकर वापस भाग गया था। उसे डर था कि ये दोनों ही उसका कचूमर निकाल सकते हैं। महमूद गजनवी के संबंध में प्राप्त यह तथ्य भी एक ऐसा अमूल्य हीरा है जिसका कोई सानी नहीं है। यह भारत ही है जिसका इतिहास इस प्रकार के अनेक हीरों को एक दूसरे के साथ जोड़ जोड़कर भव्यता की दीवार खड़ी करता है।

इतिहास का उजला पक्ष

हमें इतिहास के इस उजाले पक्ष से परिचित नहीं कराया गया कि राजाओं ने किस प्रकार संयुक्त शक्ति का प्रदर्शन करते हुए और देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करते हुए कार्य किया ? हमें इस प्रकार इतिहास पढ़ाया गया है कि जब एक राजा किसी विदेशी आक्रमणकारी से जूझ रहा था तो दूसरे सभी राजा निरपेक्ष भाव से उसे देख रहे थे। यद्यपि ऐसी घटनाएं भी हुईं कि जब एक राजा किसी विदेशी आक्रमणकारी से लड़ रहा था तो कई राजा निरपेक्ष बने रहे, पर हमेशा ऐसा नहीं हुआ। ऐसे भी अनेक अवसर आए जब हमारे राजाओं ने संयुक्त सेना बनाकर अथवा राष्ट्रीय मोर्चा बनाकर विदेशी आक्रमणकारी को मैदान से भगाया। महत्वपूर्ण यही है कि हमें अपने राजाओं के इस प्रकार के पुरुषार्थ, पराक्रम और शौर्य से भी परिचित कराया जाए। जब उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों को अपने संयुक्त बल से भगाने में सफलता प्राप्त की।
 इस फिल्म से हमारे देश के लोगों को इस प्रकार की कई गौरवपूर्ण घटनाओं की जानकारी होगी । जिनसे पता चलेगा कि हमारे चोल शासकों के पास कितनी विशाल जलसेना थी। लड़ाकू जहाज थे और उनके शासन में किस प्रकार चुनाव करवाने का पूरा एक तंत्र स्थापित था ? उनके शासन पर यदि सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो जो आज की प्रशासनिक व्यवस्था है वह सारी की सारी इसी राजवंश से ली गई दिखाई देती है। चोल साम्राज्य में जजिया कर जैसा कोई टैक्स नहीं था। उस समय कुछ गांव ऐसे चिन्हित किए गए थे जिनसे टैक्स लिया जाता था और उसे जन कल्याण पर खर्च किया जाता था। जबकि कुछ गांव ऐसे होते थे जिनमें शिक्षा केन्द्र अर्थात गुरुकुल आदि स्थापित होते थे। इन गांवों से टैक्स नहीं लिया जाता था और उनके आचार्य व शिक्षा देने वाले शिक्षकों पर सरकार किसी प्रकार का बोझ नहीं डालती थी। कुछ गांव ऐसे भी चिह्नित किए गए थे जिनसे टैक्स लेकर सीधे मंदिरों में दे दिया जाता था।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक की ….. तो क्या इतिहास मिट जाने दें, नामक पुस्तक से

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