वैदिक संपत्ति 311 [चतुर्थ खण्ड] जीविका , उद्योग और ज्ञानविज्ञान

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(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं ।)

प्रस्तुति: – देवेंद्र सिंह आर्य
( चेयरमैन ‘उगता भारत’ )

गताक से आगे …
इसके आगे इस सृष्टि के तीसरे कारण प्रकृति का वर्णन इस प्रकार है-
अदितियॉरिितरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवाऽअदितिः पञ्चंजनाऽदितितिक्षित र्जनित्वम् ।। (यजु० २५/२३)

अर्थात् अदिति ही द्यौ है, अदिति ही अन्तरिक्ष है, अदिति ही माता है, अदिति ही पिता है, अदिति ही पुत्र है, अदिति ही विश्व के देवता हैं, अदिति ही ब्राह्मणा, क्षत्री, वैश्य, शूद्र और अनार्य हैं और अदिति ही पैदा करनेवाली तथा वही पैदा होनेवाली है। अर्थात् यह सारा जगत् अदिति का ही प्रपञ्च है। इस मन्त्र में अदिति-माया- का विशाल रूप दिखलाया गया है। यथार्थ में संसार के समस्त नामरूपात्मक पदार्थ प्राकृतिक ही हैं। यही बनते और बिगड़ते हैं और इन्हीं के द्वारा संसार का प्रादुर्भाव और तिरोभाव होता है। कहने का मतलब यह कि परमात्मा जीवों के कर्मानुसार उनको इस अदिति नामक प्रकृति के शरीररूपी घेरे में बन्द करके और उसी प्रकृति के इस ब्रह्माण्डरुपी बड़े घेरे में लाकर छोड़ देता है। इसी का नाम सृष्टि की उत्पत्ति है। परन्तु परमात्मा इस सृष्टि को किस प्रकार उत्पन्न करता है, इस बात का वर्णन वेद में इस प्रकार है-

ऋतं च सत्य चाभीद्वात्तपसोऽध्यजायत ।

ततो राज्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ।। १ ।।
समुद्रावर्णवार्याध संवत्सरो अजायत ।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी ।। २ ।। (ऋ० १०/१६००१-२)
ततो विराडजायत बिराजोऽर्भाव पूरुषः ।
स जातोऽअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमयो पुरः ।। (यजु० ३१।५)
सूर्याचन्द्रमसौ बाता यचापूर्णमकल्पयत् ।
दिवं च विवीं चार्तारक्षमयो स्वः । (ऋ० १००१२००३)

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशु स्ताँचक्र वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ।। (यजु० ३११६)
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवाऽअयजन्त साध्याऽऋषयश्च ये ।। (यजु० ३११६)
ब्रह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यदृश्यः पद्भ्या शूद्रो अजायत ।। (यजु० ३१।११)
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतऽऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दा सि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ।। (यजु० ३१।७)

अर्थात् ऋत और सत्य (नीति और धर्म) को विचार कर परमात्मा ने तप (ईक्षण) किया। उस ईक्षण से हलचल उत्पन्न हुई और प्रकृतिरूपी अँधेरा हो गया, तथा उससे आकाश पैदा हुआ। उस आकाश से वायु और मेधरूप ऊपर का समुद्र और संवत्सररूपी सूर्य हुआ और उसी सूर्य से पृथिवी का समुद्र हुआ और रात दिन हुए। इसके बाद विराट् हुआ और विराट् के बाद पृथिवी उत्पन्न हुई। परमात्मा ने इन सूर्य, चंद्र, अन्तरिक्ष, दिन और पृथिवी आदि को उसी तरह बना दिया, जिस तरह उसने इस सृष्टि के पूर्व अन्य भूत सृष्टियों में बनाया था। पृथिवी उत्पन्न हो जाने के बाद उस पर वनस्पति उत्पन्न हुई। वनस्पति के बाद पशुपक्षी उत्पन्न हुए और पशुपक्षियों के बाद देव, ऋषि, साध्य, ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए तथा इन्हीं श्रेष्ठ मनुष्यों के हृदयों में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का उपदेश हुआ । उपर्युक्त मन्त्रों में सृष्टि उत्पत्ति के क्रम का बहुत ही अच्छा वर्णन है। इन मन्त्रों में बतला दिया गया है कि परमात्मा ने अपनी ईक्षणशक्ति से प्रकृति में प्रेरणा की। प्रेरणा से गति उत्पन्न हुई और गति से आकर्षण उत्पन्न हुआ । आकर्षण से प्रकृति परमाणु आपस में मिले, जिससे रात्रि के समान एक गम्भीर स्थिति उत्पन्न हुई। वह स्थिति जब चक्राकार गति में घूमी, तो और भी सघन हो गई और उसके चारों ओर आकाश उत्पन्न हो गया। उस खाली स्थान- आकाश में वायु का समुद्र भर गया और वायुसमुद्र में ही सूर्य उत्पन्न हुआ, जिससे मेघ, वर्षा, नक्षत्र, पृथिवी और रातदिन उत्पन्न हुए । अर्थात् यह समस्त सृष्टि उपयुक्त क्रम के साथ परमात्मा की प्रेरणा से ही उत्पन्न हुई है और इसके उत्पन्न होने का प्रधान कारण जीवों का कर्म और परमेश्वर की न्यायव्यवस्था ही है।
क्रमश:

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