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चीन, चिड़िया और अकाल* ।

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लेखक आर्य सागर खारी 🖋️

प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। अलग-अलग थीम के साथ यह दिवस इस नन्हे से परिंदे के संरक्षण, परास्थितिकी तंत्र में इसके योगदान आदि के संबंध में जागरूकता को लेकर मनाया जाता है।

छोटी सी उछल कूद मचाने वाली इस चिड़िया का पृथ्वी के पोषण चक्र में अतिशय योगदान है लेकिन जब इंसानी लालच जागता है और वह लालच राष्ट्रीय लालच में बदल जाए कम्युनिज्म के नाम पर तो फिर गौरेया जैसे नन्हे परिंदों को भारी खामियांजा चुकाना पड़ता है…. ऐसा ही हुआ था चीन में 1958 से लेकर 1962 के दौरान ‘द ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ पंचवर्षीय योजना को अमली जामा पहनाने के दौरान वह योजना जो कम्युनिस्ट चीन के इतिहास में 5 करोड़ चीनियों की अकाल से मौत का कारण बनी । इसे आप प्रकृति का प्रतिकार या गौरेया का अभिशाप भी समझ सकते हैं ।

अक्टूबर 1949 में एक किसान का पुत्र माओत्से तुंग चीन की एकमात्र सर्वाधिक सबसे बड़ी पीपुल रिपब्लिक आफ चीन पार्टी का अध्यक्ष बना। धीरे-धीरे चीन का भी तानाशाह बन गया।
किसान का पुत्र होने के बावजूद उसने किसानो की जमीनों को जब्त कर कांटेक्ट फार्मिंग किसानों पर थोप दी कृषि को उद्योगों के समकक्ष लाने के लिए कृषि से औद्योगीकरण के नाम पर उसने प्रत्येक गांव में इस्पात के कारखाने की योजना बनाई 5 वर्षीय पंचवर्षीय योजना को उसने ग्रेट लीप फॉरवर्ड नाम दिया।

माओत्से को उसके निकटतम सहयोगियों ने बताया की चीन में खाद्यान्न का उत्पादन गौरैया चिड़िया के कारण नष्ट हो जाता है यह चिड़िया 4 किलो अनाज खा जाती है देश के कुल अनाज उत्पादन का 30 से 40% अनाज इसके कारण बर्बाद हो जाता है। ऐसे में यदि इस चिड़िया को मार दिया जाए तो इसके कारण जो अनाज की बचत होगी उसके निर्यात से जो पूंजी मिलेगी उससे फिर औद्योगीकरण को बढ़ावा मिलेगा।

बस तानाशाह ने फैसला ले लिया राष्ट्रवाद के नाम पर चीनी युवा के उसके फैसले के पीछे एकजुट हो गए और गांव गांव क्या बच्चे क्या बूढ़े पूरे चीन में इस नन्हे से परिंदे का विनाश शुरू हो गया ।यह चिड़िया बिना थके केवल 15 मिनट ही उड़ पाती है शोर इसे रास नहीं आता ऐसे में चीनी लोगों ने इसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाया जहां इसके घोसला होते वहां बर्तनों को पीट कर शोर मचाया जाता कहीं ढोल बजाए जाते यह व्याकुल होकर इधर-उधर उड़ती जमीन किसी पोल आदि पर इसे बैठने भी न दिया जाता जब तक यह बेदम होकर जमीन पर नहीं गिर पड़ती और मर जाती।

चीन के गांव में ही नहीं शहरों में भी इस चिड़िया का संहार शुरू हुआ वहां इन्हें शॉट गन से सीधा निशाना बनाया गया। बताया जाता है पोलैंड के दुतावास के भवन में इस चिड़िया का विशाल समूह घुस गया था शोर से बचने के लिए चीनी जनता ने दूतावास को घेर लिया तीन दिन तक वहां ढोल आदि से चीनी जनता शोर पैदा करती रही जब तक हजारों चिड़िया थककर मर ना गई। पोलिस दूतावास के अधिकारी अफसोस में हाथ मलते रह गये।

1958 से 60 तक यह विनाश का चक्र चला। 30 लाख लोगों को इस कार्य में लगाया गया था कम्युनिस्ट सरकार की ओर से।

गौरैया चिड़िया चीन से लगभग लुप्त हो गई बताया जाता है एक अरब गौरेया को मारा गया था लेकिन क्रिया की प्रतिक्रिया अब शुरू होती है साथ ही शुरू होता है कुदरत (ईश्वर) का इंसाफ ।

चिड़िया अनाज को खाती थी यह एक पक्ष था जो चीनी तानाशाह को दिखाई दिया लेकिन दूसरा पक्ष यह भी था वह अनाज के साथ-साथ अनाज को नुकसान पहुंचाने वाले फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े मकोड़े को भी खाती थी अब यह चिड़िया तो उस भयानक खौफनाक अभियान में मार दी गई ऐसे में कीड़े मकोड़े की संख्या बढ़ गई फसल को 5 से 10 गुना नुकसान कीड़े मकोड़े नेपहुंचाना शुरू कर दिया । चावल आदि अनाज की बर्बादी बर्बादी 80 फ़ीसदी तक होने लगी ऐसे में चीन में अनाज का उत्पादन 80 फ़ीसदी तक गिर गया पूरे चीन में 3 साल भयंकर अकाल फैला इसके दुष्प्रभाव चीन पर दशको तक रहे उस अकाल में 50 मिलियन चीनी नागरिक मारे गए बताया जाता है कुछ गांव में तो भूख से इंसानों को भी लोगों ने खाना शुरू कर दिया था।

चीन के तानाशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ । गौरैया के पुनर्वास संरक्षण के लिए एक व्यापक अभियान चलाया गया सोवियत संघ रूस से क्योंकि वह भी कम्युनिस्ट राष्ट्र था वहां से 3 लाख गौरैया चिड़िया मंगाई गई धीरे-धीरे चीन में गोरिया चिड़िया की आबादी फिर से बढ़ी और ऐसे में फसलों को कीटों से नुकसान से मुक्ति मिल गई फसल चक्र संतुलित हो गया साथ। ही इकोलॉजीकल सिस्टम भी स्वस्थ होने लगा।

चीन की कम्युनिस्ट सरकार न केवल चीन की प्रजा को भी इस घटना से खौफनाक सबक मिला साथ ही सबक मिला पश्चिम के पूंजीवादी देशों को फिर कभी पेस्ट कंट्रोल के नाम पर बर्ड कंट्रोल की क्रूर नीति नहीं लाई गई आर्थिक नीतियों के नाम पर।

भगवान ने श्वास लेने वाले किसी भी जीव को यूं ही नहीं गढा है प्रत्येक जीव का अपना-अपना योगदान है इस पर्यावरण पृथ्वी के जैव तंत्र में सभी की अपनी निर्धारित भूमिका है।

विश्व गौरैया दिवस की उपलक्ष में आप यह संकल्प ले इस शानदार परिंदे के लिए आप अपने घर में छोटा सा घोंसला बर्ड हाउस लगायेंगे या घर में ही कोई संरचना ऐसी बनवाएंगे जिसमें यह चिड़िया रह सके प्रजनन कर सके फल फूल सके क्योंकि इस जीव की समृद्धि में ही हमारी समृद्धि जुड़ी हुई है।

साथ ही इस चिड़िया को बचाने के लिए देश में गौरेया संरक्षण अभियान से जुड़े हुए सामाजिक पक्षी मित्रों कार्यकर्ताओं को बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

लेखक आर्य सागर खारी

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