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इतिहास के पन्नों से

महाभारत की प्रमुख पात्र गांधारी*-*सत्य की खोज*

डॉ डी के गर्ग
“ रामायण और महाभारत के प्रति भ्रांतिया;; से साभार
भाग-१
गांधारी महाभारत की एक प्रमुख पात्र है,गांधारी गांधार राज्य के राजा सुबल की पुत्री और शकुनि की छोटी बहन थी। आज अफगानिस्तान का जो कंधार है,वही पुराने समय मे गांधार प्रदेश कहलाता था।गांधारी अद्वीतिय सुंदरी थी इसी कारण भीष्म ने धृतराष्ट्र के लिए सुबल से गांधारी का हाथ मांग लिया।
प्रचलित कथा – गांधारी दुर्योधन की मां और राजा धृतराष्ट्र की पत्नी है। जब गांधारी को ये पता चला कि धृतराष्ट्र नेत्रहीन हैं तो उसने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और आजीवन नेत्रहीन की भांति ही रही। उसके अंधे होने की बात जानते हुए भी गांधार नरेश इस शादी के लिए राजी हो गये. इसका कारण हस्तिनापुर की अजेय सैन्य शक्ति रही हो, महाबली भीष्म का भय रहा हो या फिर इतने बड़े राजपरिवार में बेटी के विवाह पर गौरव और सुख-सुविधाएँ मिलने का लोभ. जो भी हो महाभारत गांधार की सुंदर किशोर राजकुमारी गांधारी का विवाह अधेड़ उम्र के अंधे राजा के साथ हो गया।
शकुनि अपनी बहन से बहुत प्रेम करता था और उसने अपनी बहन की इस हालत के लिए भीष्म और कुरुवंश को ही उत्तरदायी माना और कुरुवंश के नाश की प्रतिज्ञा ले ली।
गांधारी का अपनी आँखों पर पट्टी बांधने का फैसला
महाभारत महाकाव्य में अनेक ऐसी विचित्रताओं से भरे प्रसंग हैं, जिन पर किसी भी विचारशील व्यक्ति को बहुत अजरज होता है. हालाकि यह एक काव्य-कथा है और इसमें अतिरंजनाओं का आना स्वाभाविक गुण है, क्योंकि अतिश्योक्ति के बिना कविता की कल्पना भी नहीं होती. अनेक तरह के रूपक, बिम्ब, प्रतीक, अभिव्यंजनाएँ, अलंकार, रस, भाव, शब्द-शिल्प,व्याकरण आदि काव्य के मुख्य अंग हैं. इनके बिना कोई कविता नहीं हो सकती. मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न गूंजता रहता है कि आखिर गांधारी ने अपनी आँखों पर पट्टी क्यों बाँधी?उसका पति नेत्रहीन था. वह बहुत बलवान, बुद्धिमान और ज्ञानवान होने के बाबजूद देख नहीं सकता था. नेत्रहीन होने के कारण बड़ा भाई होने के बाबजूद वह राजा नहीं बन पाया. घटनाक्रम में आये नाटकीय मोड़ की वजह से छोटे भाई पांडू की मौत हो गयी और धृतराष्ट्र को ही मजबूरी में राजा बनना पड़ा. कुछ लोगों का मानना है कि यही महाभारत का एक बड़ा कारण रहा. नेत्रहीन से बहन की शादी होने पर भाई शकुनी ने शपथ ली थी कि वह कुरुवंश को तबाह कर देगा. ऐसा उसने किया भी. इस बात में जो भी सच्चाई हो ।
उन दिनों इस स्पष्ट रूप से बेमेल विवाह पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई उसने अपने पिता के वचन का सम्मान करने का बीड़ा उठाया और कुरूस के शक्तिशाली राजा धृतराष्ट्र से शादी करने पर वह खुश थी।
इस कथानक में नाटकीय मोड़ तब आता है,जब इतिहासकारो के अनुसार गांधारी घोषणा करती है कि चूँकि उसके पति नेत्रहीन हैं,इसलिए वह भी आजीवन अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर रहेगी और उसने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और एक अंधे की भांति जीवन यापन करने का संकल्प लिया। आस-पास के और स्वर्ग के लोगों ने उसके इस भव्य काम के लिए शायद उस पर आर्शीवाद भी बरसाए होंगे। वह कितनी वफादार हैं, उन्होंने सोचा होगा।
ऐसा ही टीवी धारावाहिक में दिखाया जाता है और हमको बताया जाता रहा है ।
लेकिन सच क्या है ? कभी हमने जानने की और समझने की कोशिश नहीं की।मेरा एक प्रश्न है की यदि धृतराष्ट्र एक पैर वाला होता तो क्या वह भी अपना एक पैर तोड़ लेती ? यदि धृतराष्ट्र एक किडनी वाला होता तो वह ऐसा ही अपने को बना लेती ? क्या तत्समय विवाह के यही पवित्र बंधन थे ?
गांधारी के इस निर्णय पर इतिहासकारो ने प्रश्न चिन्ह लगाया है-
१ क्या अपने साथी को सहारा देने के लिए खुद को अक्षम करना सही है?
२ क्या हो अगर हर अंधे पुरूष की पत्नी देखने से इनकार कर दें। हर बहरे पुरूष की पत्नी सुनने से इनकार कर दें। या हर अपंग की पत्नी चलने से इनकार कर दे? दुनियाँ अभिशप्त हो जाएगी।
3 उनका अंधापन किस तरह एक वास्तविक बाधा बन गई?
४ क्या गांधारी एक बुद्धिमान पत्नी थी ?
५ क्या वह एक सदाचारी वफादार पत्नी की खुद की छवि में फँस गई थी। अगर उसने खुद की आँखों पर पट्टी नहीं बाँधी होती तो क्या वह खुद को बेवफा मानती और इस प्रकार खुद के ही अनुमान में गलत साबित होती? क्या स्वयं से उसकी अवास्तविक अपेक्षा पूरे परिवार को नष्ट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी?
६ क्या ऐसे निर्णय को पूर्ण सामाजिक स्वीकृति और अनुमोदन प्राप्त था ? क्योकि ऐसे निर्णय भविष्य को और जटिल बनाने के साथ-साथ विकलांग बना देते हैं और इससे उन्हें पहचानने व संभालने में और भी मुश्किल होती है अतः सहायक कार्यवाही हमेशा सकारात्मक होनी चाहिये।
इस प्रकार से तो गांधारी की खुद से उत्पन्न की गई दृष्टिहीनता जल्द ही पुण्य से पाप में बदल गई जब वह सही और गलत के बीच फर्क करने में असफल रही इस प्रकार वह अपने पति जितनी ही कमजोर हो गई। आज भी यदि किसी महिला का पति नेत्रहीन हो तो उसकी पत्नी उसके लिए सम्बल का कार्य करती है न कि स्वयं भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेती है।
इसकी बजाय एक ऐसे परिदृश्य की कल्पना कीजिए जहाँ गांधारी खुद की आँखों पर पट्टी नहीं बाँधती बल्कि अपने पति की ताकत बनकर खड़ी रहती है एक प्रतिनिधि के रूप में उसने पति के साथ शासन किया होता और शुरूआत से ही उसकी गणना एक शक्ति के रूप में होती। उसके बेटों को पता होता कि वे उनके हर किए के लिए उसके प्रति उत्तरदायी हैं और उसकी इच्छाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
महाभारत केवल दो मुख्य भाईयों दुर्योधन और दुशासन के बारे में ही बताता है, जो घमंडी और लालची थे, वे अहंकार और इसके हानिकारक बल के नशे में चूर थे और उन्होंने सभ्यता और सच्चाई का हर नियम तोड़ दिया था। बदनसीब अँधे माँ-बाप दुर्योधन की दुष्टता के बल का विरोध करने में असमर्थ थे। वह दुष्टता जो उनकी निरंतर अज्ञानता से और आगे बढ़ी। कर्म के नियम ने अपना काम किया जिससे अंततः पूरा परिवार नष्ट हो गया।

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