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इतिहास के पन्नों से

भारत की स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने, भाग 3

बृहदेश्वर मंदिर, तंजौर, तमिलनाडु

भारत के इतिहास में चोल राजाओं का विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को दूर-दूर तक फैलाने का बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है। भारतीय संस्कृति के प्रति अपने लगाव का प्रदर्शन करते हुए 1002 ईस्वी में राजाराज चोल द्वारा तमिलनाडु के तंजावुर स्थित प्रदेश और मंदिर को बनवाया गया था। यह मंदिर शिव को समर्पित है, और द्रविड़ियन कला का बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। चोल राजाओं के शासनकाल में इस मंदिर के माध्यम से भारत का वैभव फूलता फलता रहा और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए लोग दूर-दूर से आकर लाभ उठाते रहे। बृहदेश्वर मंदिर, मंदिर निर्माण की सर्वश्रेष्ठ परंपरा का अनूठा संगम है। जिसमें वास्तुकला, चित्रकला और अन्य संबद्ध कलाएं सम्मिलित हैं। यह कई परस्पर संबंधित संरचनाओं से बना है, जैसे कि नंदी मंडप, एक स्तंभित पोर्टिको और एक बड़ा सभा मंडप। इसके शीर्ष की ऊंचाई 66 मीटर है।

कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा

भारत के प्रत्येक देवी देवता के हाथ में कोई ना कोई हथियार अवश्य दिया गया है। इससे पता चलता है कि भारत के ऋषि मुनि शस्त्र और शास्त्र दोनों के पुजारी थे। भारत की जहां सत्यमेव जयते की परंपरा है वहीं शस्त्रमेव जयते को भी प्राथमिकता दी गई है। क्योंकि शस्त्र से ही शास्त्र की रक्षा होती है। सज्जन शक्ति का कल्याण होता है । इसीलिए इस मंदिर को दुष्टों का संहार करने वाले भगवान शिव को समर्पित किया गया है। यह मंदिर महानता के प्रति एक श्रद्धांजलि है। यह अपने आस-पास की संरचनाओं के साथ सही अनुपात और संरेखण में तराशा गया था। जिसके सभी खंबे, फ्लाई ब्रिज, पत्थर के मेहराब, मूर्तियां और इमारतें पत्थर के एक ही टुकड़े से बने हैं।

चेन्नाकेशव मंदिर, कर्नाटक

दक्षिण के होलसेल वंश के राजा विष्णुवर्धन के शासनकाल में 1117 ई0में बेलूर में चेन्नाकेश्वर मंदिर का निर्माण कराया गया था। इस वंश के शासकों ने लगभग 300 वर्ष तक शासन किया था। यगाची नदी के तट पर स्थित यह मंदिर 178 फुट लंबा और 156 फुट चौड़ा है। यह विजयनगर के शासकों द्वारा चोलों पर उनकी विजय को दर्शाने के लिए बनाया गया था। इस प्रकार इस मंदिर के निर्माण में एक शौर्य गाथा छिपी हुई है। यह मंदिर पूरी तरह से विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर में विष्णु के अधिकांश लाक्षणिक नक्काशी के पहलुओं को चित्रित किया गया है।

जगत पिता ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान

भारतवर्ष के इतिहास में राजस्थान का विशेष स्थान है। यह राज्य अपनी वीरता के लिए जाना जाता है। यहां पर स्थित अजमेर जिले में पवित्र स्थल पुष्कर में जगतपिता ब्रह्मा जी का मंदिर है। इस मंदिर की संरचना 14 वीं शताब्दी की है, लेकिन यह मंदिर 2000 वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर मुख्य रूप से संगमरमर और पत्थर के स्लैब से बना है। मंदिर को देखने के लिए दूर-दूर से चलकर लोग बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। इसका शिखर लाल रंग का है और इसके शिखर पर एक पक्षी की आकृति भी अंकित की गई है। मंदिर के मध्य में ब्रह्मा और उनकी दूसरी पत्नी गायत्री की मूर्तियां हैं। गायत्री का अभिप्राय हमारे बौद्धिक सौंदर्य से है। यहां कार्तिक पूर्णिमा के समय ब्रह्मा जी को समर्पित एक त्योहार का आयोजन होता है।

हमारे अतीत के गौरव का प्रतीक वरदराजा पेरुमल मंदिर

तमिलनाडु स्थित वरदराजा पेरूमल मंदिर के चारों ओर एक ग्रेनाइट की दीवार बनाई गई है। यह दीवार मंदिर के सभी मंदिरों को अपने घेरे में ले लेती है। इस मंदिर में पांच स्तरीय राज गोपुरम है जो मंदिर का प्रवेश द्वार माना जाता है। मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह मंदिर 11वीं शताब्दी के दौरान चोल राजाओं द्वारा बनवाया गया था। उनके बाद पांडयों द्वारा इसका विस्तार किया गया था। यह मंदिर एक हिंदू मंदिर है, जो भगवान विष्णु के पवित्र शहर कांचीपुरम में स्थित है। माना जाता है कि विष्णु के 108 मंदिरों का 12 कवि संतों या अलवारों ने भ्रमण किया था, जिनमें से यह भी एक दिव्य देशम है। जिस समय यह मंदिर बनवाया गया था उसे समय हमारे धर्म स्थलों की नितांत आवश्यकता थी जहां से धर्म संस्कृति और राष्ट्र को बचाने का उपक्रम किया जाता था।

कोणार्क सूर्य मंदिर, ओडिशा

कोणार्क सूर्य मंदिर भारत के उड़ीसा प्रांत के पुरी जिले में समुद्र तट पर पुरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित है। इस मंदिर को 1253 से 1260 ईस्वी के बीच पूर्वी गंग राजवंश के राजा नरसिम्ह देव प्रथम द्वारा बनवाया गया था। 1984 ईस्वी में इस मंदिर को विश्व धरोहर स्थल के रूप में यूनेस्को द्वारा मान्यता दी गई है। यह मंदिर, पत्थर के पहियों, स्तंभों और दीवारों के साथ एक विशाल रथ के आकार में है। इसकी संरचना का एक बड़ा हिस्सा अब खंडहर के रूप में है। वास्तव में इस मंदिर में जिस प्रकार के कौशल को प्रदर्शित किया गया है उसके दृष्टिगत भारत सरकार द्वारा इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

राजस्थान के माउंट आबू के पास दिलवाड़ा मंदिर

पत्थर को तराशना और उसे सजीवता प्रदान करना मानव इतिहास की बहुत बड़ी खोज है। भारत के लोगों की बात यदि की जाए तो इन्होंने अन्य क्षेत्रों की भांति पत्थर को तराश कर उसकी भव्य मूर्ति बनाने की कला में कीर्तिमान कायम किए हैं।
अपनी इसी कला का प्रदर्शन भारत के लोगों ने माउंट आबू के पास स्थित दिलवाला के मंदिरों में किया है। ये मंदिर माउंट आबू से लगभग 2.5 किमी दूर स्थित है और इन पांचों मंदिरों में से हर एक मंदिर अपने आप में मानव के कौशल विकास की कहानी कहने के लिए पर्याप्त है। इनका निर्माण 11 वीं और 13 वीं शताब्दी (ईस्वी) के बीच हुआ था। ये मंदिर संगमरमर के अद्भुत उपयोग के लिए प्रसिद्ध हैं। ये पांच मंदिर (विमल वसाही, लूना वसाही, पित्तल हर मंदिर, पार्श्वनाथ मंदिर और महावीर स्वामी मंदिर) दुनिया के सबसे सुंदर जैन तीर्थ स्थल माने जाते हैं।

लिंगराज मंदिर

महाराष्ट्र के औरंगाबाद का लिंगराज मंदिर अपने आप में अनूठा है। यह दो मंजिला मंदिर है को कि एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है। यह मंदिर एलोरा की गुफाओं में स्थित है। यह मंदिर भारतवर्ष की सर्वाधिक प्राचीन मंदिरों में से एक है। अब से लगभग 12 हजार साल पुराने इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के शासकों ने करवाया था। इसे बनाने में लगभग 150 वर्ष लगे और 7000 मजदूरों ने इस पर निरंतर काम करते हुए अपना पसीना बहाया था।

डॉ राकेश कुमार आर्य

राष्ट्र मंदिर नामक पुस्तक से

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