शिक्षा को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश के नाम खुला पत्र

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माननीय मुख्य न्यायाधिपति
संविधान पीठ
उच्चतम न्यायालय
नई दिल्ली – 110001
भारतीय संविधान बहुमत की सच्चाई पर आधारित है और इसको राष्ट्रपति पद में केन्द्रित करते हुए अलंकृत किया हुआ है जबकि विश्व भूगोल वृत्तांत से भारतीय तत्व दर्शन कहता है कि सत्य अपने आप में परिपूर्ण है उसे किसी मत एवं वाद की आवश्यकता तक नहीं ! आवश्यकता का विषय है सम्पूर्ण भारतीय संविधान को बहुत ही सूक्ष्मतम शब्दों में अभिव्यक्त कर सम्पूर्ण राष्ट्र को निभाने राष्ट्रधर्म प्रेरित करने विराट एवं स्पष्ट लक्ष्य के साथ कृतसंकल्प करने की ! असंभव के विरूद्व एक नागरिक की शक्ति की पहचान ! एक नागरिक है जो सरकार बनाता है सरकारें नागरिक नहीं बनाती अतः एक नागरिक सरकार का धारक है अतएव यह धारक को वचन देकर धोखा देने जैसा !
प्रजा को राज्य के प्रति उनके कर्तव्यों का ज्ञान करवाना व शिक्षा द्वारा ऐसे नागरिको का निर्माण करना जो राज्य के प्रति सर्वोच्च न्योच्छावर करने को तत्पर रहे ! इस स्पष्ट अभिव्यक्ति के साहस के अभाव में यह ये विषय समय – समय पर सामाजिक . धार्मिक . आर्थिक . सांप्रदायिक वर्ग संघर्ष की हिंसा के रूप में आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में राष्ट्ररोग के दर्द बन राष्ट्र प्रतिष्ठा पर प्रश्नवाचक मुद्रा में उभरते है ! यह सांप्रदायिक उन्माद भारत के राजनैतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र में इतना बढ़ चुका की यह उनकी नियति बन चुका
यह विषय मुझे मेरे ज्ञान के प्रकाश में काल के गर्भ से भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रश्न पत्र निर्माण प्रक्रिया में राष्ट्रीय महत्व के विषय को महत्व नहीं देने से वर्ष 1990 – 91 में कश्मीर घाटी से पलायन के समाचारों से निर्मित राष्ट्रीय वातावरण संवैधानिक संकट / राष्ट्रपति का जिम्मेवारी से कतराना / मुख्य भूमिका उच्चतम न्यायालय की ? उस समय की तथ्यात्मक पुष्टि :- माननीयों की शपथ के दोहरे मापदंड से देश की नींव पर अपराध की दीमक – स्पष्ट संवाद के अभाव में हिंसा की उपज स्वाभाविक !
भारतीय प्रेस ने अभीष्ट प्रायोजनार्थ विकल्प की भूमिका अभिनीत की तथा भारत राष्ट्र के नाम भावनात्मक आव्हान का प्रकाशन ! जिसको मैंने शिरोधार्य लिखित एवं मौखिक साक्षात्कार को उपस्थित्त हुआ तब पूरा का पूरा भारत का राजनैतिक नेतृत्व एवं प्रशासनिक तंत्र किनारा कर चुका ! मेरी विद्रोही प्रतिक्रिया उनकी अति महत्वकांक्षी राजनीतिक मान्यताओं का उलंघन उन्हें प्रतीत जबकि होना निर्धारित तय यह हुआ था की मुझ द्वारा व्यक्त शब्द समूह को उच्च प्राथमिकी शिक्षा पाठ्यक्रम जो राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम है उसके अनुरूप एक अनुलेख अथवा श्रुतिलेख की भांति जांचना था ! मुझ द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया का न्यायायिक प्रभाव जांचना न्यायालय का काम ! एक अपठित गधांश जो पाठ्यक्रम के समकक्ष स्तर का होता है ! जिस मेरे स्वयं के गाँव के राजकीय उच्च प्राथमिक विधालय से मैंने शिक्षा पायी आज वही विधालय क्रमोन्नत होकर राजकीय उच्च माध्यमिक विधालय चाडवास जिला पाली राजस्थान पर प्रधानाचार्य 33 वर्षों से अपनी असहमति जताते ही रहते ! भारत की सर्वोच्च तीनों संवैधानिक संस्थान ?
ज्ञान का काम सत्य को खोज निकालने एवं प्रमाणित करने तक ! अध्ययन से मै प्रतिपल नवीनीकरण करता ही रहता हूँ ! शस्त्र से बलवान युक्ति और ज्ञान से माया का निवारण ! अब व्यवस्था के विरोध की प्रभावी अभिव्यक्ति कूटनैतिक दक्षता से व्यक्तिगत योग्यता से ! प्रावधान व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और जीवन की सुरक्षा ! हम भारत के लोग भारतीय संविधान की प्रस्तावना –
COURT ARE MADE BY CONSTITUTION AND CONSTITUTION IS MADE BY WE THE PEOPLE OF INDIA . PEOPLE COURT IS ALL ABOVE THE COURT . न्याय तक पहुँचना नागरिक का अधिकार अतः अध्ययन के नवीनीकरण के क्रम मै प्रभावित हुआ – EACH LETTER COMPLAINT IS DEALT WITH BY ME : CJI CHANDRACHUD IF YOU HAVE A GRIEVANCE DO NOT RUN OUTSIDE THE COURT YOU HAVE THE HEAD OF THE FAMILY WHO IS SITTING HERE TO ATTEND TO YOUR GRIEVANCE CJI CHANDRACHUD SAID AUGUST 16 . 2023 .
. PLEASE DO NOT DISMANTLE AN INSTITUTION WITHOUT SHOWING HOW TO BUILD A BETTER ONE . PLEASE TELL US HOW YOU WILL BUILD A BETTER ONE AND WE WILL IMPLEMENT . A HONEST JUDGE NEED NOT FEAR AN ACCOUNTABILITY BILL . LAW DAY SPEECH WORD VIEW CHIEF JUSTICE OF INDIA S H KAPADIA THE INDIAN EXPRESS NEW DELHI EDITION 27 NOV. 2011 .
अब भारतीय संविधान को भेदने का सुत्रफल :- पूरी संसार की रचना का सिद्वांत परिज्यामितिकीय है उसमे एक केंद्र बिंदु एवं एक आधार होता है यही बात भारतीय संविधान पर अक्षरश लागू होती है ! भारत की सभी संवैधानिक शक्तियां मुझमे निहित . सत्य मुझमे आत्मसात . अतएव ज्ञान शक्ति से राजशक्ति को चुनौती उन्हें अपनी अवस्था के वास्तविक ज्ञान के साथ . कानून एवं आदेश की पारदर्शिता के साथ हस्तांतरित क्रम …..!
लोकतांत्रिक राजनीति कक्षा 9 अध्याय 4 संस्थाओं का कामकाज उपबंध – निर्णय करने वाले पृष्ठ 62. बिंदु 1 . राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष होता है और ओपचारिक रूप से देश का सबसे बड़ा अधिकारी होता है ! बिंदु 2 . प्रधानमन्त्री सरकार का प्रमुख होता है और दरअसल सरकार की और से अधिकाँश अधिकारों का उपयोग वही करता है ! अब मेरी टिपण्णी प्रतिक्रिया स्वरुप पुरे भारत का विधि एवं राजनीति विज्ञानं का पाठ्यक्रम संवैधानिक समीक्षा केवल एक पक्षीय करता आया है जबकि तुलनात्मक अध्ययन यह कहता है की वर्तमान भारतीय संविधान की सत्ता की शक्ति मात्रात्मक बल पर आधारित है जबकि मैंने इसके गुणात्मक बल को अपनाया है प्रेरणा स्त्रोत राष्ट्रीय साक्षरता परियोजना का कार्यकाल !
संवैधानिक वैधता देती है प्राधिकरण को चुनौती अंतर्गत अधिनियम सचिव परीक्षा संघ लोक सेवा आयोग ! खुलता है एक राजनैतिक शौधपत्र कर्मस्थली एक सूक्ष्मतम स्वरुप ! ( समय की व्यापक सहमतियों की प्रतिक्रियाओं से निर्मित ) प्रत्येक देशवासी अनुभव करता है उनमे से कुछ समझते है आसानी से राष्ट्ररोग के दर्द को समाचार तंत्र की मुख्य पंक्तियों से लेकिन उन सभी में से कोई एक भी इतना शैक्षणिक नहीं है की अर्थहीन राजतन्त्र को रक्तविहीन क्रांति के माध्यम से बाहर रख सके ! मुझे स्वीकार करो !
राष्ट्रपति पद ?
भारतीय लोकतंत्र में सुराख
अतः
निभाने चलो राष्ट्रधर्म
शब्दभाव रचना एवं आकृति विपणन का आधार . राजस्थान पत्रिका जोधपुर 1 अक्टूबर 1991 सम्पादकीय पृष्ठ . नीति विहीन प्रशासन . लेखक सेवा निवृत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मंगलबिहारी .
राष्ट्रीय साक्षरता परियोजना प्रेरक पद . गाँव / डाकघर – चाडवास .
तहसील – सोजत . जिला – पाली . राजस्थान . पिनकोड – 306104
RECORDED EVIDENCE TO H BLE CHAIR SPEAKER LOKSABHA
PARLIAMENT NEW DELHI . TIME UP PILLAR OF DEMOCRACY
FAY OF TRUTH . LEAD FIVE BRAVE MAN FROM THE FRONT .
FIELD MARSHAL . PRESIDENT . ATTORNEY GENERAL . GOVERNOR . PRESS . STANDARD TIME TAKE STOP HERE . REFERENCE OF – 4/25 ARMS ACT SWORD MJM COURT SOJAT PINCODE- 306104 LOCATION TRACING THAT ANXIETY WAS CONSTITUENTLY RIGHT WITH ZERO BALANCE CRIME AGAINST ALL ARE WITNESS .
अब राष्ट्रपति पद में निहित शक्ति का स्पष्ट अंकेक्षण कर प्रतिपक्ष में अपनी व्यक्तिगत योग्यता का शक्ति संतुलन भारत के सर्वोच्च शौर्य अलंकार परमवीर चक्र से संतुलित कर होना होता है भारत का सर्वोच्च शौर्य अलंकार परमवीर चक्र यह नहीं कहता है कि कोई मेरे लिए अवलंबित रहे यह एक योग्यता का मापदंड है ! संसार में बड़े से बड़े अधिकार केवल तप त्याग और बलिदान से प्राप्त होते है और यह तभी संभव है जब उससे लक्ष्ययुक्त अस्तित्व प्रमाणित होता हो ! अब राष्ट्र प्रतिष्ठा पर बन आयी सारी की सारी समस्याओं के समाधान को कृतसंकल्प हो अपने प्राणों का मोह त्यागों और अपनी कूटनैतिक दक्षता से निर्मित अपनी मौत उन्ही से मांग लो यह नीति शास्त्र कहता है अभिशाप बन कर आयी हुई वरदान बनकर सिद्व होगी ! अन्यथा राष्ट्र प्रतिष्ठा के साथ अशौभनीय खिलवाड़ करने के आरोप में मै बगैर अपनी अंतिम इच्छा के सरेआम जनसमूह के बीच मृत्युदंड का हकदार होता हूँ ! हे मातृभूमि तेरे लिए मरना ही जीना है और तुझे भूलना ही मरना है !


इसी के साथ पत्र व्यवहार का पत्ता
राजपुरोहित रघुनाथ सिंह
गाँव /डाकघर – चाडवास . तहसील – सोजत . जिला – पाली . राजस्थान .
पिनकोड – 306104 . मोबाइल – 9636931939
EMAIL – rajpurohitraghunathsingh@gmail.com
प्रतियाँ . राष्ट्रपति भवन . लोकसभा अध्यक्ष . मुख्य शासन सचिव राजस्थान सरकार

1 thought on “शिक्षा को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश के नाम खुला पत्र

  1. आदरणीय सर आपने बहुत बढ़िया पत्र लिखा है, साधुवाद आपको 🙏🙏

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