राम मन्दिर की कानूनी लड़ाई ,भाग – 1

images (42)

मंदिर हमारी आस्था, मंदिर ही पहचान।
मंदिर हमारी अस्मिता, मंदिर ही था शान।।

  मीरबाकी खान ने अयोध्या स्थित राम मंदिर को चाहे धरातल से समाप्त कर दिया हो, पर वह उसे हिंदू समाज के दिलों से समाप्त नहीं कर पाया था। मंदिर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक था। हमारी आस्था का प्रतीक था । हमारे राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक था। यही कारण रहा कि लोग हृदय से मंदिर की स्मृतियों को दूर नहीं कर पाए। मंदिर के पुनरुद्धार के लिए लड़ाई जारी रही। लोगों के भीतर एक टीस निरंतर बनी रही कि जैसे भी हो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक राम मंदिर फिर से अस्तित्व में आना चाहिए। राम मंदिर केवल धार्मिक पाखंड का नाम नहीं था, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर थी। जिससे हमें समाज और राष्ट्र के संचालन की प्रेरणा मिलती थी, सुव्यवस्था बनाए रखने की प्रेरणा मिलती थी।
अपनी राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय संकल्प के प्रति सदा आस्थावान बने रहे भारतीय समाज ने मीर बाकी खान के मस्जिद बनाने के 330 वर्ष पश्चात हथियारों के संघर्ष के साथ-साथ कानूनी संघर्ष का रास्ता अपनाने का भी निर्णय लिया। भारत के हिंदू समाज ने विचार किया कि अंग्रेज अपने लिए जिस प्रकार की न्यायप्रियता की डींगें मारते हैं, एक बार उन्हें भी आजमाया जाए कि वे कितने न्याय प्रिय हैं ? फल स्वरुप हिंदू समाज की ओर से 1858 में मन्दिर परिसर में हवन, पूजन करने को लेकर एक एफ0आई0आर0 दर्ज कराई गई । कुछ काल पश्चात जब अंग्रेजों ने भारत के समाज को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय देने के लिए 1885 ई0 में कांग्रेस की स्थापना की तो लोगों ने अंग्रेजों की न्याय के प्रति आस्था को कसौटी पर कसने का निर्णय लिया।
फलस्वरूप भारत के लोगों ने इसी वर्ष मंदिर के प्रकरण को न्यायालय में ले जाकर खड़ा कर दिया। जहां उस समय कांग्रेस का संस्थापक ए0ओ0 ह्यूम कांग्रेस के माध्यम से भारत के लोगों को यह विश्वास दिलाने का काम कर रहा था कि यदि आप अपनी बातों को ब्रिटिश शासकों के सामने उठाओगे तो वह तुम्हारी बातों को सुनने के लिए तैयार हैं, वहीं भारत के लोग सीधे ब्रिटिश शासकों के सामने अपने हृदय की वेदना को स्पष्ट करने का निर्णय ले चुके थे। इस प्रकार कांग्रेस की स्थापना के वर्ष में ही राम मंदिर का मामला न्यायालय में पहुंच गया।
134 वर्ष तक यह मामला न्यायालय में फाइलों के बीच कैद होकर दीमक का शिकार बनता रहा। न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीमे-धीमे आगे बढ़ती रही। ब्रिटिश काल में तो इस प्रकरण को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं गया। यह लड़ाई 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के उपरांत समाप्त हुई। इस दौरान कई न्यायालयों में इस प्रकरण को लेकर सुनवाई हुई। कितने ही जज बदल गए। कितने ही वकील बदल गए। कई पीढ़ियां इस प्रकरण को लेकर न्यायालयों में मुकदमा लड़ती रहीं।

जज बदले वकील भी, बीते बहुत से साल।
बीती कई कई पीढ़ियां, गया बीतता काल।।

मिशनरी भाव से लोगों ने काम किया। इस आशा और विश्वास के साथ काम करते हुए वे आगे बढ़ते रहे कि एक दिन सत्य की विजय होगी और वह विजयश्री का वरण कर काल के वर्तमान पीड़ादायक दौर से बाहर निकलेंगे – इस भाव के साथ नींव की ईंट बन गए लोग पीढ़ी दर पीढ़ी भगवान को प्यारे होते रहे, पर उनका संकल्प ना तो थका और ना ही थमा। अपनी धुन के धनी लोग भारत की पहचान को फिर से स्थापित करने का संकल्प ले आगे बढ़ते रहे।
इस प्रकार अयोध्या में जब 22 जनवरी 2024 को श्री राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई तो उस समय हमने ना थकने और ना थमने वाले संघर्षशील अपने पूर्वजों को और उनके द्वारा किए गए पुरुषार्थ को हृदय से नमन किया। राम मंदिर के प्रकरण को हम अपने पुरुषार्थ और अपने रक्त से सींचते रहे । उसको जीवित बनाए रखने का हमने बहुत ही ऐतिहासिक और प्रेरणास्पद कार्य किया।

रक्त से सींचा है हमने इतिहास के एक-एक पन्ने को,
एक-एक पल जिया हमने, जीवन धन्य बनाने को।
इतिहास की संधि होते देखी हमने बलिदानी गाथा से,
जहां उत्कंठा थी यौवन में, खून से खप्पर भरने को।।

देश का यौवन मचलता रहा और वह देश की बलिदानी परंपरा को जीवित रखते हुए अपने मंदिर के लिए राजनीतिक लड़ाई लड़ता रहा। 19वीं सदी तक मुगलों और नवाबों की शक्ति को भारत के पौरुष ने बहुत सीमा तक क्षीण कर दिया था। यद्यपि उस काल तक एक विदेशी शक्ति अंग्रेज ने भारत के बड़े भूभाग पर अपना अधिकार स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। अब भारत के वैदिक धर्मी हिंदू समाज को अंग्रेजों से भी लोहा लेना पड़ रहा था। जब अंग्रेजों ने देखा कि भारत की वास्तविक स्वाधीनता के लिए केवल हिंदू समाज ही चिंतित है और वही उनके लिए बड़ी चुनौती है तो उन्होंने भारत में पिटी हुई सत्ता से दूर कर दी गई मुस्लिम शक्ति को बड़ी चतुरता से अपने साथ मिलाने का निर्णय लिया। उसने धीरे-धीरे हिंदुओं के विरोध में काम कर रही मुस्लिम शक्ति को अपने साथ मिलाना आरंभ किया। कुल मिलाकर ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ वाली कहावत चरितार्थ हुई और मुस्लिम शक्ति का बड़ा भाग भारतवर्ष के विरुद्ध काम करते हुए अंग्रेजों के साथ जा मिला।
इसके उपरांत भी भारत के लोगों ने हार नहीं मानी। उन्होंने अंग्रेजों की न्याय प्रणाली की न्यायप्रियता की परीक्षा लेते हुए राम मंदिर के मामले को न्यायालय के समक्ष उठाने का निर्णय लिया।

गाथा है बलिदान की, अपना भारत देश।
गाता गुण सारा जहां, झूठ नहीं लवलेश।।

अब से पूर्व भारत के अपने न्यायालयों में भारत के लोगों ने कभी इस मामले को उठाने का विचार तक नहीं किया था। क्योंकि सर्व सम्मति से सबका यह निर्णय ( जिसे राष्ट्रीय संकल्प कहना अधिक उचित है ) था कि जन्म भूमि पर केवल हिंदू समाज का अधिकार है और उसके बारे में किसी मुस्लिम को पक्षकार बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। पर अब जब अंग्रेजों ने किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का एक रास्ता स्पष्ट किया और लोगों के सामने कुछ नये विकल्प और उपाय प्रस्तुत किये तो उन उपायों पर भी भारतीय समाज ने सोचने का काम करना आरंभ किया। 330 वर्ष पश्चात भारत की राष्ट्रीय चेतना ने 1858 में राम जन्मभूमि स्थान को लेकर प्रस्तुत की गई प्राथमिकी के माध्यम से इस लड़ाई को कानूनी रूप दे दिया। इस वर्ष पहली बार परिसर में हवन, पूजन करने के पश्चात थाने में एक एफ0आई0आर0 दर्ज हुई। अयोध्या रिविजिटेड पुस्तक के अनुसार एक दिसंबर 1858 को अवध के थानेदार शीतल दुबे ने अपनी रिपोर्ट में सरकारी स्तर पर पहली बार यह स्पष्ट किया कि परिसर में चबूतरा बना है। ये पहला कानूनी दस्तावेज है जिसके माध्यम से हमें पता चलता है कि परिसर के भीतर राम के प्रतीक होने के प्रमाण उपलब्ध हैं। इसके बाद तारों की एक बाड़ खड़ी कर विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिंदुओं को अलग-अलग पूजा और नमाज की अनुमति शासन के द्वारा प्रदान कर दी गई।
तारों की इस बाड़ से यह स्पष्ट हुआ कि मामला गंभीर है और दो पक्षों में इस भूमि पर अपना – अपना अधिकार जताने और बताने का विवाद है। प्राथमिकी के पंजीकरण और उसके पश्चात उस पर आरंभ की गई कार्यवाही ने मामले को वैधानिक रूप से जीवित मान लिया अर्थात यह स्पष्ट कर दिया कि कोई स्थान है जिस पर विवाद है। जिन लोगों ने इतिहास की पुस्तकों से इस दौरान जन्मस्थान संबंधी विवाद को मिटाने का काम करना आरंभ किया उनके लाख प्रयास के उपरांत भी कालांतर में न्यायालय में विचाराधीन रहा जन्मस्थान संबंधी विवाद इस बात का प्रमाण बना रहा कि चाहे जिस प्रकार के षड़यंत्र रचे बुने जा रहे हों और चाहे जैसे भी हिंदुओं के पक्ष को कमजोर करने के प्रयास किये जा रहे हों, पर जन्मस्थान पर हिंदुओं का दावा निराधार नहीं है। पारिस्थितिकीय साक्ष्य स्थिति को स्पष्ट करने के लिए काम करते रहे।

क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet