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आर्यिका ऋद्धि श्री – विनायक फीचर्स
नारी मानव समाज को अस्तित्व प्रदान करने वाली होती है। नारी के अभाव में मनुष्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती। नारी के बिना संसार की प्रत्येक रचना अपूर्ण सी लगती है। कह सकते हैं कि नारी सृष्टि का आधार है। उसमें प्रकृति की भांति कोमलता एवं कठोरता का अद्भुत समन्वय है। मां के रूप में बच्चे के लिए, पत्नी के रूप में पति के लिये, बहिन के रूप में भाई के लिए उसकी ममता, करूणा, और वात्सल्य अपूर्व ही होती है। इसी वात्सल्य, करूणा, ममता में शत्रु, आततायी, पापाचारी, दुरात्मा, नीच, पतित, भ्रष्ट व्यक्ति के प्रति उसकी कठोरता, निर्ममता भी छिपी होती है।
नारी संसार की रंगभूमि में जितनी स्पष्ट और खुली किताब है उतनी ही अनबूझ और गूढ़ पहेली भी है। नारी श्रद्घा और विश्वास का प्रतीक है तो ताडऩ की सहेली भी। नारी सृष्टि के निर्माण की अधिकारी है तो विनाश का कारण भी। नारी मानवता-दानवता दोनों की जननी हो सकती है। नारी सुख शांति का आधार स्तम्भ है तो कलह व अशान्ति का निमित्त भी, तीर्थंकरों की जननी है तो राक्षसों की गर्भस्थली भी। देवताओं से पूज्य है तो सामान्य मानव से अपमानित, तिरस्कृत भी। वास्तव में नारी का जीवन न जाने कितने पहलू मिलने से बना है। यही कारण है कि नारी अनादिकाल से आज तक एक पहेली के रूप में विख्यात रही है। इसको हल करने का प्रयत्न, इसको समझने का पुरूषार्थ अनादिकाल से आज तक बहुत किया गया लेकिन नारी को पूर्णरूपेण कोई नहीं समझ सका।
विश्व वसुन्धरा पर कोई नारी का पक्षधर प्रशंसक रहा तो कोई नारी का विपक्षी और निन्दक। नारी का यह दुर्भाग्य है कि पुरूष उसके संपूर्ण रूप को न देख सका। प्राचीनकाल से आज तक नारी को दो दृष्टिकोणों से देखा गया है। स्वार्थी, निष्ठुर, धूर्त, आततायी, पापाचारी, नीच भ्रष्ट पुरूषों ने नारी को पतित बनाकर संसार के सामने पेश किया है। नारी का ऐसा चित्रण स्वार्थी मनुष्यों ने ही अधिक किया है वह नारी को निंदक बनाकर अपनी सहचरी अद्र्घांगनी तो कहता ही रहा पर अविश्वास व शंका की दृष्टि से भी देखता रहा।
जो नारी के पक्षधर और प्रशंसक रहे, जिन्होंने नारी को सम्यकरूपेण समझा, उसकी महत्ता स्वीकार की, उसकी वंदना शुरू की और उसके पवित्र रूप को समझने के लिये ऐसे स्वार्थी, नीच पुरूषों को ललकारा। नारी का त्याग, श्रद्घा, ममता, करूणा,वात्सल्य के सौन्दर्य के आगे नत मस्तक होकर उसे आदर दिया। नारी तुम केवल श्रद्घा हो, विश्वास रजत नभ पगतल में पीयूष स्त्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर नभ तल में॥
पक्ष और विपक्ष की विभिन्न विचार धाराओं के रहते हुए भी इस सृष्टि की रचना, मानव समाज की रचना में स्त्री और पुरूष दोनों का ही समान योगदान है। नर और नारी दोनों ही मिलकर, दोनों एक दूसरे का अभिन्न अंग बनकर, परिपूरक बनकर ही सुंदर, स्वस्थ वसुन्धरा का निर्माण कर सकते हैं।
हम प्राचीनकालीन, मध्यकालीन, वर्तमानकालीन नारी की स्थिति का अध्ययन करें तब ज्ञात होगा कि विश्व को सशक्त बनाने के लिए पुन:नारी को सशक्त बनाना होगा।
प्राचीनकाल में नारी को अतीव उच्च स्थान प्राप्त था। उसे सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, आदि समस्त कार्यो में पुरूष के समान ही भाग लेने के पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। पर्दा प्रथा नहीं थी। वे शिक्षित होती थी। वीरता, साहस, परिश्रमशीलता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई होती थी। समाज, परिवार में उनकी स्थिति उन्नत थी। ब्रह्मïचर्यकाल में कन्या को संपूर्ण विधाओं में पारंगत कराया जाता था। कुछ स्त्रियां जीवन पर्यन्त ब्रह्मïचारिणी बनकर अध्ययन करती थी। वे हर मांगलिक कार्य का साधनमात्र नहीं थी बल्कि स्वतंत्र रूप से विकसित एवं पल्लवित होने के लिए पुरूष की दासी नहीं बल्कि अनुगामिनी बनती थी। नारी को पुरूष के अस्तित्व में अपना अस्तित्व नहीं मिला देना पड़़ता था। उसके व्यक्तित्व में अपना व्यक्तित्व नहीं जोडऩा पड़ता था। नारी को घूंघट, चार दीवारी में कैद होकर नहीं रहना पड़ता था।
कन्याओं का लालन-पालन एवं शिक्षा-दीक्षा भी संपूर्णरूप से पुत्रों के समान या पुत्रों से भी बढ़कर श्रेष्ठ तरीकों से होती थी। भगवान आदिनाथ ने पुत्रों की अपेक्षा पहले पुत्रियों को शिक्षा दी थी।
इस प्रकार प्राचीनकाल में नारी का स्थान हर दृष्टि से सर्वोपरि था इसलिए सीता, अंजना, चंदना, सुलोचना, मीरा, सावित्री, अनुसुईया, द्रोपदी आदि अनेकानेक नारियां भारत की सती नारियों के ही आदर्श रूप हैं।
समयचक्र के परिवर्तनानुसार मध्यकाल में नारियों की स्थिति पतन की ओर अग्रसर होती गई। अंतत: मुगलकाल में तो वे घर की चारदीवारी में बंद कर दी गई। पर्दा प्रथा प्रारंभ हो गई। उनके ऊपर नाना प्रकार के बंधन लगाये गये। उनकी सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं पर नियंत्रण लगाये गये। इतना ही नहीं उसे जन्म से लेकर मृत्यु तक पुरूषों के नियंत्रण में रखा गया। नारी का जीवन पुरूषों की दया पर ही आश्रित था। पुत्री का जन्म लेना अपशकुन माना जाने लगा था। उनकी शिक्षा-दीक्षा की उपेक्षा होती थी उन्हें विभिन्न प्रकार से प्रताडि़त एवं त्रस्त किया जाता था। पति की मृत्यु के बाद उसे जबरदस्ती अग्नि में कुदाकर सती कराया जाता था। विधवाओं के लिए कोई आदर सम्मान नहीं था। विधवाओं को हीन-हेय दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें पग-पग पर अपमान का कटु जहर पीना पड़ता था। स्त्रियों को धर्म शास्त्र सुनने का भी अधिकार नहीं था। वह दासी के रूप में भोगोपभोग की वस्तु और संतान पैदा करने की मशीन मात्र बनकर रह गयी थी। पत्नी पति की छाया रूपिणी, पैरों की जूती मात्र ही समझी जाती थी। उसके मन के अनुसार उसे कोई भी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। स्वतंत्रता का नारा उसके व्यक्तित्व के लिए समुचित नहीं माना जाता था। उस समय जनता ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमते तत्र देवताÓ की नीति को प्राय: पूर्णतया भूल चुकी थी इसलिए नारी का परिवार समाज, राष्ट्र में कोई आदर्शमय स्थान नहीं था।
लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए लिखने में संकोच नहीं होता है कि आज की नारी पुरूषों से किसी प्रकार भी पीछे रहने वाली नहीं है। समय पडऩे पर वह रानी सारन्धा बन सकती है तो पग-पग पर साथ देने वाली माता जीजाबाई भी। यह अतिश्योक्तिपूर्ण तथ्य नहीं है कि एक और यदि नारी कोमलता और सुकुमारता की प्रतिमूर्ति है, तो दूसरी ओर वह समय आने पर महाचण्डी का विकराल रूप भी धारण कर लेती है।
आज के युग की नारी विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्णत: स्वतंत्र है। उसे सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, व्यक्तिगत आदि समस्त अधिकार पुरूष के समान ही प्राप्त हैं। आज विश्व का ऐसा कोई क्षेत्र अछूता नहीं रहा जिसमें नारी सक्रिय रूप से भाग न ले रही हो।
आज के युग की नारी मध्यकालीन नारी की भांति सेविका एवं संभोग की सामग्री न रहकर समाज को, विश्व को नई दिशा प्रदान करने वाली नारी है। आज की नारी पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। वह शिक्षा, राजनीति, सेना, पुलिस, बैंक, चिकित्सा तथा अन्य प्रशासनिक विभागों में कार्यरत है। आज की नारी अबला नहीं सबला है। आज न तो उसके आंचल में दूध है और न ही आंखों में पानी अपितु वह तो ब्रह्मïा की भांति सृष्टि को निर्माणकर्ता है, विष्णु के समान पालन पोषण करने वाली तथा साथ ही साथ महेश की भांति विनाश भी करने वाली है। इस प्रकार आज की नारी सृजन, सिंचन व संहार की अप्रतिम त्रिवेणी है।
लेकिन अफसोस व दु:ख की बात है कि आज की नारी ने वैज्ञानिक भौतिक जगत में इतनी उन्नति के साथ ही अवनति के कदम भी उठाये हैं। वह ममत्व को छोड़ चुकी है। बहिन की पवित्रता भी खोती जा रही है। प्रेयसी और वात्सल्य का रिश्ता तोड़ती जा रही है। नैतिकता, सदाचार, सद्गुणों की जगह अनौतिकता व दुराचार, दुर्गुण प्रवेश करते जा रहे हैं। सहजता, सरलता, शालीनता, धैर्य, कर्तव्यपरायणता को छोड़कर नारी असहज,कठोर,अधैर्य, अकर्तव्यशीलता फैशनपरस्ती को अपनाकर दुख, अशांति को निमंत्रण दे रही है। प्रगतिशीलता का नाम लेकर नग्नता और अश्लीलता का जामा पहन रही है। सुंदरता के नाम पर अपने शरीर और अंगों का खुले बाजार में प्रदर्शन कर रही है। फैशन के नाम पर चरित्र को प्राय: नष्ट करती जा रही है। वह अपने सत्कर्तव्य, गुण गरिमा को भूलकर भौतिक सुख साधनों को ही अपना सर्वस्व मानती जा रही है। यही कारण है कि नारी जगत का जो श्रद्घा, विश्वास, आदर्श और गौरव था वह टूटता जा रहा है। वह स्वयं ही अपने अस्तित्व को मिटाने में लगी है आज नारी जगत को सबसे बड़ा खतरा नारी से ही है।
आज प्रतिदिन देश में हो रही नारियों की हत्याओं में नारियों का ही हाथ है। हम रोजाना देखते, सुनते एवं अखबारों में पढ़ते हैं कि एक बहू अपनी सास या ननद की खातिर स्टोव से जलकर मर गयी। अगर आज सास और ननद के रूप में जो भी नारियां हैं वे निश्चित कर लें कि हम दहेज नहीं लेंगे तो एक भी बहू स्टोव से, जहर से या अन्य किसी भी प्रकार से मर नहीं सकेगी।
आज नारी कन्या के जन्म को अभिशाप मान रही है। यही कारण है कि गर्भ में कन्या है तो नारी गर्भपात करा लेती है। कन्या की गर्भ में ही हत्या करने वाली और कराने वाली नारी ही है। नारी के मन में दया, ममता, करूणा, वात्सल्य से ही पुरूष में पुरूषत्व की जागृति आ सकती है।
भारतीय संस्कृति ही नहीं अपितु विश्व की सम्पूर्ण नैतिकता व सदाचार का आदर्श नारी में ही सुरक्षित है। नारी यदि धैर्य, पतिभक्ति, मां की ममता, बहिन का प्यार, मंत्री, कवियत्री, लेखिका, शील, संयम की ज्योति स्वरूपा, कोयल की मधुर वाणी में गायिका, पृथ्वी के समान क्षमाधात्री, देश, धर्म, समाज, परिवार की गौरव रक्षिका ज्ञान की आधार शिला और पुरूष वर्ग की प्रेरणा स्त्रोत बनकर समस्त विश्व का उपचार करने में सचेत होकर कदम बढ़ायेगी तो यह निश्चित है कि विश्व सुख, शांति की खुशबू से महक उठेगा।
दया की अवतार, शक्ति की देवी, शांति की ज्योति, तप की अग्नि बनकर जिस जिस काल में जिन जिन नारियों ने अपने जीवन की आहुति दी उनका परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व इतिहास अनादिकाल से ऋणी रहा है और रहेगा।
सृष्टि की रचियता पुरूषों की जननी महानता की खान इस नारी जाति का वर्णन करना अति कठिन है। बस निष्कर्ष के रूप में यही लिखना चाहूंगी कि नारी के सद्भाव में विश्व का सद्भाव है और इसके अभाव में सबका अभाव है।
इसीलिए विश्व को सशक्त बनाना है तो नारी को सशक्त बनना ही होगा तभी विश्व शक्तिशाली बन सकेगा। (विनायक फीचर्स)

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