ओ३म् “वैदिक धर्म प्रचार आन्दोलन आर्यसमाज के प्रारम्भिक सुदृढ़ स्तम्भ”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
वैदिक धर्म संसार का सबसे प्राचीन एवं एकमात्र धर्म है। अन्य धार्मिक संगठन धर्म न होकर मत व मतान्तर हैं। तथ्यों के आधार पर ज्ञात होता है कि सृष्टि के आरम्भ में ही वेदों वा वैदिक धर्म का प्रादुर्भाव ईश्वर से हुआ था। इससे सम्बन्धित जानकारी आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने अपने कालजयी अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत की है। उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के अनुसार हमारी यह सृष्टि निमित्त कारण अनादि, अनन्त, सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सृष्टिकर्ता परमात्मा से उत्पन्न हुई है। ईश्वर सर्वज्ञानमय है। वेद उसके ज्ञान में सदा-सर्वदा प्रतिष्ठित व सुरक्षित रहते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद के ज्ञान को परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि रच कर चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को उनकी आत्माओं में प्रेरणा कर प्रदान करते हंै। यह वेद ज्ञान ही चार ऋषियों से ब्रह्मा जी को प्राप्त होता है और उनसे शेष मनुष्यों को पात्रता व परम्परा से प्राप्त होता जाता है। सृष्टि के आरम्भ से यह ज्ञान महाभारत काल तक अपने उज्जवल यथार्थ स्वरूप व सत्य अर्थों सहित विद्यमान रहा। ऋषि जैमिनी तक वैदिक परम्परा अनवछिन्न रूप से चली है। जैमिनी ऋषि तक वेद ज्ञान एवं अनेक शास्त्रीय ग्रन्थ उपलब्ध थे। इसके बाद वेदों के अध्ययन व प्रचार में बाधायें आयीं तथापि यह देश के अनेक सच्चे ब्राह्मणों को कण्ठ था व कुछ स्थानो ंपर पुस्तक रूप में लिपिबद्ध भी उपलब्ध था। मध्यकालीन वेदभाष्यकार सायण को चार वेद संहितायें प्राप्त थीं जिससे उन्होंने इनका संस्कृत भाषा में भाष्य किया। यह बात अलग है कि सायण वेदों के सभी मन्त्रों के सत्य व यथार्थ अर्थ नहीं कर सके। उन्होंने अनेक मन्त्रों के ऐसे अर्थ किये हैं जिनसे वेदों की महत्ता को हानि हुई है। मध्यकाल में वेद-मन्त्रों के जो सत्य अर्थों के विपरीत अर्थ किये गये, उन सबका परिमार्जन ऋषि दयानन्द जी ने किया। ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य एवं धर्म प्रचार के कार्यों सहित सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थों से वेदों को ईश्वरीय ज्ञान होने का गौरव पुनः प्राप्त हुआ। यह ऋषि दयानन्द जी की ही कृपा है कि आज सहस्रों लोगों के घरों में चार वेद संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषाओें में सत्य-अर्थों के साथ विद्यमान हैं और संसार में वैदिक धर्म की सर्वोत्तम व श्रेष्ठतम धर्म के रूप में प्रतिष्ठा है।

महर्षि दयानन्द ने वेद संहिताओं को प्राप्त किया और उनके सत्य अर्थों का प्रचार किया। वेदों पर आधारित उनके तीन ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, सत्यार्थप्रकाश एवं संस्कार-विधि वैदिक साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ऋषि दयानन्द जी ने स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से वैदिक आर्ष व्याकरण का अध्ययन किया था। वह अध्ययन आरम्भ करने से पूर्व ही योग में पारंगत व सिद्धियों को प्राप्त हो चुके थे तथा समय के साथ उनका अभ्यास बढ़ता रहा और योग की अनेक उपलब्धियां उन्हें प्राप्त र्हुइं। योग की उपलब्धियों एवं अपनी वेद-व्याकरण-विद्या से ही वह वेदों का अपूर्व संस्कृत हिन्दी भाष्य कर सके। यद्यपि ऋषि दयानन्द वेदों का पूरा भाष्य नहीं कर सके परन्तु उन्होंने जितना भाष्य किया है उतना ही किसी भी मनुष्य को वेदों के तात्विक रहस्यों से परिचित करा सकता है और नास्तिक लोगों को भी वेदानुयायी बना सकता है। महात्मा मुंशीराम एवं पं. गुरुदत्त विद्यार्थी जी इसके उदाहरण हैं। इस लेख में हम कुछ प्रमुख आर्य महापुरुषों सहित स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी एवं ऋषि दयानन्द जी का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं।

आर्ष-अनार्ष कसौटी के ज्ञाता प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती

स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के विद्यागुरु थे। स्वामी दयानन्द जी को विद्यादान देकर आपने ही उन्हें वेदार्ष ज्ञान से आलोकित किया था। स्वामी विरजानन्द जी जन्म पंजाब में करतारपुर के निकट के एक गांव गंगापुर में हुआ था। श्री नारायण दत्त जी आपके पिता थे। बचपन में ही स्वामी विरजानन्द जी के माता-पिता का देहान्त हो गया था। बचपन में शीतला रोग हो जाने के कारण आपके दोनों नेत्रों की ज्योति चली गई थी। इनकी भाभी का इनके प्रति सन्तोषजनक व्यवहार नहीं था। इस कारण इन्हें घर छोड़ना पड़ा। यह उत्तराखण्ड आये और यहां रहकर ऋषिकेश एवं हरिद्वार आदि स्थानों में गायत्री मन्त्र आदि की साधना की। उसके बाद आप कनखल गये। आपकी स्मरण शक्ति तीव्र थी। आप सुनी बातों को कण्ठ कर लेते थे। इनके समय में अष्टाध्यायी महाभाष्य आदि का अध्यापन अप्रचलित हो चुका था। आपने किसी को अष्टाध्यायी का पाठ करते सुना तो उसे स्मरण कर लिया और निर्दोष एवं श्रेष्ठ जानकर उसी का अध्ययन-अध्यापन एवं प्रचार किया। आपकी मथुरा स्थित पाठशाला में न जाने कितने विद्यार्थी आये और गये परन्तु स्वामी दयानन्द जी को विद्यार्थी रूप में पाकर स्वामी विरजानन्द जी की पाठशाला धन्य हो गई। यह दोनों गुरु व शिष्य इतिहास में सदैव अमर रहेंगे। ऐसा गुरु व दयानन्द जी जैसा शिष्य शायद इतिहास में दूसरा नहीं हुआ है। स्वामी दयानन्द जी में जो गुणों का भण्डार था इसमें स्वामी विरजानन्द जी की प्रेरणा एवं दोनों का परस्पर सान्निध्य कारण था। हम कल्पना करते हैं कि यदि स्वामी विरजानन्द जी की भाभी का उनके प्रति कड़ा व उपेक्षाजनक व्यवहार न होता तो तो स्वामी विरजानन्द जी व्याकरण के शिरोमणी विद्वान न बनते और यदि स्वामी विरजानन्द जी न होते तो देश व संसार को स्वामी दयानन्द जैसा वेदों का अपूर्व विद्वान, धर्म प्रचारक, वेदोद्धारक, वेदभाष्यकर्ता, देश की आजादी का मन्त्रदाता, समाज सुधारक तथा मत-मतान्तरों की अविद्या वा उनकी सच्चाई बताने वाला व्यक्ति इतिहास में न हुआ होता। धन्य हैं स्वामी विरजानन्द सरस्वती व उनके विद्यानुरागी शिष्य, आदर्श ईश्वरोपासक, वेदभक्त एवं देशभक्त ऋषि दयानन्द सरस्वती।

ऋषि परम्परा के पुरस्कर्ता एवं वेदोक्त धर्म के पुनरुद्धारक ऋषि दयानन्द सरस्वती

ऋषि दयानन्द जी के नाम से सारा विश्व एवं सभी मत-पंथों के आचार्य परिचित हैं। आपका जन्म गुजरात प्रान्त के मोरवी नगर के टंकारा स्थित ग्राम व कस्बे में श्री करषनजी तिवारी के घर पर फाल्गुन कृष्णा द्वादशी (दिनांक 12-2-1825) को हुआ था। 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन मूर्तिपूजा की निस्सारता का बोध होने सहित इसके कुछ समय बाद बहिन और चाचा की मृत्यु होने पर उन्हें वैराग्य हुआ। आप ईश्वर के सत्यस्वरुप के ज्ञान एवं मृत्यु पर विजय पाने के लिये अपनी आयु के 22वें वर्ष में घर छोड़कर निकले और अनेक देश के अनेक स्थानों में घूमकर साधु-सन्तों की संगति करने सहित उनसे सच्चे ईश्वर, आत्मा के स्वरूप सहित मृत्यु पर विजय पाने के उपाय पता किये। उन्हें दो योग्य योग प्रशिक्षक मिले जिनसे उन्होंने योग विद्या सीखी और समाधि लाभ प्राप्त करने की दक्षता प्राप्त की। स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से उन्होंने वेदों के व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य सहित अनेक ग्रन्थों का अध्ययन कर ज्ञान लाभ प्राप्त किया। लगभग ढाई-तीन वर्ष गुरु विरजानन्द के चरणों में विद्या का अभ्यास कर वह उन्हीं की प्रेरणा से देश व समाज से अविद्या को दूर कर वेद-विद्या के प्रचार व प्रसार के आन्दोलन को समर्पित हुए। मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध तथा फलित ज्योतिष आदि को उन्होंने वेदविरुद्ध एवं मिथ्या बताया। स्वामी दयानन्द जी ने वेदों पर स्त्री, पुरुषों व दलितों सहित मानवमात्र का अधिकार प्रतिपादित किया। जन्मना जाति, ऊंच-नीच एवं जातिगत अगड़े-पिछड़े की भावनाओं का भी उन्होंने प्रबल खण्डन किया एवं गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार वैदिक वर्णव्यवस्था का समर्थन किया। उनका आशय था कि मनुष्य जन्म से नहीं अपितु वेदों के ज्ञान, यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों व उच्च चरित्र आदि से महान होता है। किसी भी प्रकार के मांसाहार व सामिष भोजन को उन्होंने ईश्वर की प्राप्ति व आत्मा की उन्नति में बाधक सिद्ध किया। दिनांक 16 नवम्बर, सन् 1869 को स्वामी दयानन्द जी ने अकेले लगभग 30 सनातनी पौराणिक पण्डितों से काशी के आनन्दबाग में लगभग 50 हजार दर्शकों की उपस्थिति में मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ कर उन्हें निरुत्तर किया। मूर्तिपूजा वेदसम्मत सिद्ध नहीं की जा सकी। ऋषि दयानन्द जी ने चैत्र शुक्ल पंचमी विक्रमी सम्वत् 1931 अर्थात् 10 अप्रैल सन् 1875 को मुम्बई के काकड़वाणी मुहल्ले में प्रथम आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज को वेदों पर आधारित 10 स्वर्णिम नियम दिये। पंचमहायज्ञ विधि पुस्तक लिखकर ईश्वरोपासना तथा दैनिक-यज्ञ-अग्निहोत्र का सूत्रपात व प्रचार किया। इससे पहले लोग भिन्न-भिन्न प्रकार से ईश्वरोपासना करते थे जिससे सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं होते थे। ऋषि दयानन्द ने संस्कृत-हिन्दी भाषाओं में वेदभाष्य सहित वेदों पर आधारित ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, सत्यार्थप्रकाश, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि अनेक ग्रन्थ दिये। दयानन्द जी ने अपने समय प्रचलित सभी मत-मतान्तरों की मान्यताओं व सिद्धान्तों की समालोचना की और उन्हें वेद, ज्ञान, तर्क एवं युक्ति आदि के विरुद्ध तथा विष-सम्पृक्त अन्न के समान घोषित किया। अनेक विधर्मियों से शास्त्रार्थ कर उनकी अवैदिक मान्यताओं को असत्य सिद्ध करने के साथ स्वामी दयानन्द जी ने उनकी वैदिक धर्म में शुद्धि व आपस में मिलन का मार्ग भी प्रशस्त किया। बाल विवाह, बेमेल विवाह, सती प्रथा का निषेध एवं गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित युवावस्था में विवाह का उन्होंने समर्थन किया। युवा विधवाओं के पुनर्विवाह को भी आपद धर्म के अन्र्तगत मानकर इस पर लगे निषेध को समाप्त किया। देश को आजादी का मन्त्र भी ऋषि दयानन्द जी ने ही दिया और स्वराज्य को अच्छे से अच्छे विदेशी राज्य से सर्वोत्तम बताया। यह भी बताया कि परमात्मा ने अपनी शाश्वत प्रजा जीवों को उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल देने के लिये उपादान कारण प्रकृति से इस सृष्टि की रचना की है। स्वामी जी ने यह भी बताया कि मनुष्य वेदानुकूल श्रेष्ठ कर्म और ज्ञान प्राप्त कर साधना करके ईश्वर का साक्षात्कर कर जन्म व मरण के बन्धनों से छूट कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। महर्षि दयानन्द ने देहरादून के एक जन्मना मुसलमान मोहम्मद उमर की उसके अनुरोध पर परिवार सहित शुद्धि कर उसे वैदिक धर्म में दीक्षित किया था। स्वामी दयानन्द जी ने गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत कर उसके द्वारा अध्ययन-अध्यापन की प्रेरणा की थी। संस्कृत भाषा की श्रेष्ठता प्रतिपादित कर इसके अध्ययन की प्रेरणा करने तथा संस्कृत व हिन्दी सीखने के बाद विदेशी भाषायें सीखने पर सहमति प्रकट की थी। वेद को सब सत्य विद्याओं की पुस्तक एवं वेद के अध्ययन-अध्यापन-प्रचार को आर्यों व मनुष्यों का परम धर्म बताया। सत्य के ग्रहण व असत्य के त्याग को मनुष्यों का कर्तव्य बताया। सबसे प्रमुख बात यह बतायी कि सब मनुष्यों को अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। जोधपुर में वेद प्रचार करते हुए उनके विरोधियों ने उन्हें विष देकर और उनकी उचित रीति से चिकित्सा न कर उनके रोग को अत्यधिक बढ़ा दिया जिससे 30 अक्टूबर सन् 1883 को अजमेर में उनका देहावसान हो गया। ऋषि दयानन्द जी ने वैदिक धर्म एवं संस्कृति की रक्षा की। यदि वह न आते तो वैदिक धर्म व संस्कृति सुरक्षित न रह पाती। हम उनकी पावन स्मृति को सादर नमन करते हैं।

गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक ऋषिभक्त स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती

पंजाब के जालन्धर जिले के तलवन ग्राम में मुंशीराम जी का जन्म फाल्गुन कृष्णा 13, सम्वत् 1913 विक्रमी (सन् 1856) को खत्री घराने में पिता नानक चन्द जी के यहां हुआ था। आपकी माता जी का देहान्त बचपन में ही हो गया था। काशी, बरेली व लाहौर आदि कुछ नगरों में आपकी शिक्षा-दीक्षा हुई। आपने वकील की परीक्षा लाहौर से पास की थी। वकालत का कार्य भी आपने किया जिसमें आपको आशातीत सफलता मिली और इससे धन भी अर्जित किया। आपने बरेली में ऋषि दयानन्द के दर्शन करने सहित उनसे वार्तालाप भी किया था। आप बाल्यकाल एवं युवावस्था के आरम्भकाल में मूर्तिपूजक थे परन्तु बनारस की एक घटना से आपको मूर्तिपूजा के प्रति अश्रद्धा हो गई थी। इसके बाद आप ईसाईयत की ओर झुके परन्तु अपने ईसाई अध्यापक के चरित्र की दुर्बलता के कारण आप इससे दूर हुए और नास्तिक बन गये थे। ऋषि दयानन्द के सत्संग ने ही आपमें आस्तिक भाव को उत्पन्न किया था। आप पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान रहे और इसके माध्यम से जन-जन में वेदों का प्रचार किया। आपके जीवन का प्रमुख कार्य गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना व उसका सफल संचालन करने सहित इस संस्था को विश्व में प्रसिद्धि प्राप्त कराना था। इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडानल्ड ने गुरुकुल में कुछ समय व्यतीत किया था और आपको जीवित ईसामसीह और संेट पीटर की उपमा दी थी। गुरुकुल ने सम्भवतः आर्यसमाज को वेदों के सबसे अधिक उच्चकोटि के विद्वान दिये हैं। हमारा सौभाग्य रहा है कि गुरुकुल के दो प्रमुख आचार्यों एवं वेदों के प्रसिद्ध विद्वान पं. विश्वनाथ विद्यालंकार एवं आचार्य डाॅ. रामनाथ वेदांलकार जी से हमारा सान्निध्य रहा। हमने इन विद्वानों का अधिकांश साहित्य भी पढ़ा है। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने आगरा के पास शुद्धि का चक्र चलाया था जिसमें आपने मलकान राजपूत जिन्हें पूर्वकाल में मुसलमान बनाया गया था, उनकी इच्छा व प्रार्थना पर लाखों की संख्या में शुद्ध किया था। देश की आजादी के आन्दोलन में भी आपका सक्रिय एवं प्रमुख योगदान था। आपने आजादी के आन्दोलन के दिनों में दिल्ली की जामा मस्जिद के मिम्बर से मुसलमानों और हिन्दुओं को वेदोपदेश किया था। दिल्ली के चांदनी चैक में एक जलूस का नेतृत्व करते हुए आपने अंग्रेजों के गुरखा सैनिकों के सामने अपनी छाती खोल दी थी और उन्हें ललकारते हुए कहा था कि हिम्मत है तो चलाओं गोली। आपने अंग्रेजों के विरुद्ध और सिखों के साथ मिलकर गुरु का बाग आन्दोलन में भाग लिया था। आपको जेल जाना पड़ा और वहां आपको पिंजरे में रखा गया था। दलितोद्धार के क्षेत्र में भी आपने सक्रिय एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आपने जालन्धर के सबसे बड़े कन्या महाविद्यालय, जालन्धर की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की है जिसमें आपकी आत्मकथा ‘कल्याण मार्ग का पथिक’ भी है। आपका समग्र साहित्य पहले 11 खण्डों में प्रकाशित हुआ था। अब इसका नया संस्करण दो वृहद खण्डों में आर्य प्रकाशक मैसर्स विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। स्वामी जी के हरिश एवं इन्द्र दो पुत्र गुरुकुल कांगड़ी में पढ़े। हरिश जी आजादी के आन्दोलन में विदेश चले गये थे। इन्द्र जी इतिहासकार बने, संसद सदस्य रहे तथा आपने आर्यसमाज का इतिहास सहित ऋषि दयानन्द जी की जीवनी और ‘मेरे पिता’ ग्रन्थ की रचना की है। 23 दिसम्बर, सन् 1926 को दिल्ली में श्रद्धानन्द बाजार स्थित भवन में एक आततायी मुस्लिम युवक द्वारा गोली मारकर आपकी हत्या कर दी। आप वैदिक धर्म पर बलिदान हो गये। पंजाब में आर्यसमाज के प्रचार में जो उत्साह दिखाई दिया उसमें स्वामी श्रद्धानन्द जी का महान योगदान है। आपकी पावन स्मृति को सादर नमन है।

ऋषि दयानन्द के अनुसंधानपूर्ण जीवन चरित के लेखक एवं धर्मरक्षक पं. लेखराम आर्यपथिक

पं. लेखराम जी महर्षि दयानन्द जी के अनन्य भक्त थे। आपने अपना जीवन वैदिक धर्म की रक्षा व प्रचार सहित अपने धर्मगुरु महर्षि दयानन्द जी के लिए समर्पित किया था। वेद-धर्म प्रचार, शुद्धि, स्वबन्धुओं की धर्मान्तरण से रक्षा तथा ऋषि जीवन का अनुसंधानपूर्ण अतीव महत्वपूर्ण वृहद जीवन चरित्र लिखकर आपने सभी ऋषिभक्तों को सदा-सदा के लिये अपना कृतज्ञ बना दिया है। धर्मरक्षा करते हुए आप किसी षडयन्त्र का शिकार होकर एक आततायी मुस्लिम युवक के चाकू द्वारा हमले के कारण धर्म की वेदि पर बलिदान हुए। यह युवक विश्वासघाती था। इसने पं. लेखराम जी से आर्य बनने की प्रार्थना की थी। लोगों के सावधान करने पर भी पंडित जी ने इस क्रूर व्यक्ति को अपने निकट रखा था। ऋषि दयानन्द की मृत्यु के बाद पंडित जी का बलिदान आर्यसमाज की एक बहुत बड़ी क्षति थी। पं. लेखराम जी का जन्म पंजाब के जिला जेहलम की तहसील चकवाल के ग्राम सैदपुर में चैत्र 8 सं. 1915 (सन् 1858) को हुआ था। श्री तारासिंह जी आपके पिता तथा श्रीमती भागभरी जी आपकी पूज्य माताजी थी। धन्य हैं यह माता-पिता जिन्होंने सनातन वैदिक धर्म पर मर-मिटने वाली बलिदानी सन्तान पं. लेखराम जी को जन्म दिया था। पंडित जी ने फारसी की शिक्षा प्राप्त कर पुलिस की नौकरी प्राप्त की थी और उन्नति कर सार्जेण्ट के पद पर पदोन्नत हुए थे। आप आरम्भ में नवीन वेदान्त से आकर्षित हुए परन्तु समाज सुधारक मुंशी कन्हैया लाल की पुस्तकों का अध्ययन करने पर आपको ऋषि दयानन्द व उनके विचारों का ज्ञान हुआ। आप उनसे मिलने और शंका समाधान करने सन् 1881 में अजमेर भी पहुंचे थे और अपनी सभी शंकाओं का समाधान प्राप्त किया था। इससे पूर्व सन् 1880 में आपने पेशावर आर्यसमाज की स्थापना की थी और समाज के सहयोग से ‘धर्मोपदेश’ नामक एक पत्र का सम्पादक व प्रकाशन भी किया था। धर्म प्रचार की तीव्र लगन के कारण आपने पुलिस की सेवा से त्याग पत्र देकर आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के अन्तर्गत पूर्ण समय धर्म प्रचार का कार्य किया। आपने उपदेशक बनकर देश के अनेक भागों में जाकर वेदों व ऋषि दयानन्द के सन्देश को धर्म प्रेमी लोगों में प्रसारित किया। आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के ऋषि दयानन्द के जीवन चरित्र की खोज और उसके लेखन के प्रस्ताव को आपने स्वीकार किया था और प्रायः उन सभी स्थानों पर गये थे जहां ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में प्रचार यात्रायें की थीं। आपके द्वारा सम्पादित यह जीवन चरित्र पूर्ण प्रामाणिक एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। हम कल्पना कर सकते है कि यदि पं. लेखराम जी ने इस कार्य को हाथ में न लिया होता तो आर्यसमाज ऋषि जीवन की अनेक घटनाओं को जानने से वंचित हो सकता था जिनकी खोज पंडित जी ने अनेक प्रकार के कष्ट उठाकर की थी। पंडित जी में ईसाई व मुसलमानों से शास्त्रार्थ करने की योग्यता भी विद्यमान थी और अनेक अवसरों पर आपने इनसे शास्त्रार्थ किये। पं. जी का मुसलमानों के अहमदिया सम्प्रदाय के आचार्यों से विवाद होता रहता था। 6 मार्च सन् 1897 को एक आततायी मुसलमान ने पं. लेखराम जी का वध कर उन्हें वैदिक धर्म का रक्तसाक्षी बलिदानी बना दिया। बलिदान के समय पंडित जी 39 वर्ष के थे। उनके परिवार में उनकी माता जी एवं पत्नी माता लक्ष्मी देवी जी ही थी। पंडित जी के एक मात्र पुत्र सुखदेव की शैशवकाल में ही मृत्यु हो गयी थी। पं. जी ने अनेक ग्रन्थों की रचना भी की है। उनके सभी ग्रन्थ उर्दू में लिखे गये हैं जिनका हिन्दी अनुवाद हो चुका है और सम्प्रति कुछ प्रमुख ग्रन्थ ‘कुलियात आर्य मुसाफिर’ में उपलब्ध होते हैं। इस ग्रन्थ का नवीन संस्करण प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी से सम्पादित होकर कुछ माह पूर्व परोपकारिणी सभा द्वारा प्रकाश में लाया गया है। दूसरा अन्तिम खण्ड प्रेस में है। प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने पं. जी की अनेक जीवनियां लिखी हैं। ‘रक्तसाक्षी पं. लेखराम’ प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी लिखित उनकी वृहद जीवनी है।

ऋषिभक्त मनीषी पं. गुरुदत्त विद्यार्थी

पं. गुरुदत्त विद्यार्थी भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी थे। स्वाध्याय की उनको गहरी रुचि थी। ऐसा पढ़ने को मिलता है कि वह जिस पुस्तकालय में प्रविष्ट होते थे उसकी सभी पुस्तकों को देखकर ही बाहर आते थे। यह किंवदन्ती हो सकती है परन्तु उनका व्यक्तित्व इसको चरितार्थ करता हुआ प्रतीत होता है। पं. गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने 26 वर्ष से भी कम आयु का जीवन पाया परन्तु उन्होंने इस छोटे से जीवन में जो महनीय कार्य किये हैं उसके कारण उनका आर्यसमाज के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान है। पंडित जी ने अनेक ग्रन्थ व लेख लिखे। पाश्चात्य विद्वानों की पक्षपातपूर्ण वेदों की आलोचनाओं का उन्होंने सटीक खण्डन एवं सत्य वैदिक मान्यताओं का प्रभावपूर्ण मण्डन किया। उनके ग्रन्थों का संग्रह पं. गुरुदत्त लेखावली के नाम से उपलब्ध होता है। आपके सभी ग्रन्थ अंग्रेजी भाषा में लिखे गये। आपके ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद ऋषिभक्त सन्तराम जी, बी.ए. ने किया है। आर्ष संस्कृत के आप दीवाने थे और अपने घर पर ही संस्कृत पाठशाला का संचालन करते थे जिसमें लाहौर नगर के बड़े पदाधिकारी भी संस्कृत पढ़ते थे। वेदों की संहिताओं का भी आपने प्रकाशन किया था। अंग्रेजी में लिखा गया ‘टर्मिनोलोजी आफ वेदाज’ आपकी प्रसिद्ध पुस्तक है जिसे आक्सफोर्ड में संस्कृत पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया था। इसका हिन्दी अनुवाद वैदिक संज्ञा विज्ञान के नाम से उपलब्ध होता है। पं. गुरुदत्त विद्यार्थी जी के ग्रन्थों का अंग्रेजी में सम्पादन ऋषिभक्त डाॅ. राम प्रकाश, कुरुक्षेत्र ने किया है। आपने पंडित जी की अनुसंधानपूर्ण जीवनी भी प्रकाशित की है। यह भी बता दें कि पण्डित जी विज्ञान के अध्ययन से नास्तिक हो चुके थे। आर्यसमाज लाहौर से जुड़े होने के कारण ऋषि की अक्टूबर, 1883 में मृत्यु के अवसर आपको श्री जीवन दास जी के साथ लाहौर से अजमेर भेजा गया था। अनेक शारीरिक पीड़ाओं के होते हुए भी आपने ऋषि दयानन्द को अजमेर में पूर्ण शान्त एवं ईश्वर भक्ति से भरा हुआ देखा था। भयंकर रोग की स्थिति में शान्त रहना किसी मनुष्य के लिये सम्भव नहीं था परन्तु ऋषि ने ईश्वर सहारे इसे कर दिखाया था। पंडित गुरुदत्त जी ने स्वामी जी के प्राण त्याग का दृश्य भी एकाग्रता से देखा था। इस अन्तिम दृश्य से उन्हें आत्मिक प्रेरणा प्राप्त हुई और एक चमत्कार हुआ जिससे पंडित जी का नास्तिक मन व आत्मा आस्तिक बन गये थे।

पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी जी का जन्म 26 अप्रैल सन् 1864 को मुलतान नगर (पाकिस्तान) में पिता श्री रामकृष्ण जी के यहां हुआ था। पंडित जी नेएम.ए. परीक्षा में पंजाब में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उन दिनों पूरा पाकिस्तान, भारत का पंजाब प्रान्त, हरयाणा व दिल्ली के कुछ क्षेत्र पंजाब में होते थे। इससे पंडित जी की प्रतिभा का अनुमान लगाया जा सकता है। आप 20 जून सन् 1880 को आर्यसमाज लाहौर के सभासद बने थे। पंडित जी ने ऋषि दयानन्द की स्मृति में स्थापित डी.ए.वी. स्कूल व कालेज की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया था और इसके लिये धनसंग्रह करने के लिए वह देश के अनेक भागों में गये थे जबकि उनके पिता रोग शैय्या पर थे। पंडित जी की वाणी में ऋषि दयानन्द और वैदिक धर्म के प्रति जो समर्पण था उससे आपकी अपील पर जनता मन्त्रमुग्ध होकर अधिकाधिक धनराशि व स्वर्णाभूषण दान देती थी। डी.ए.वी. स्कूल व कालेज, लाहौर स्थापित हुआ परन्तु पंडित जी की भावना के अनुसार वेदों व वैदिक साहित्य के अध्ययन को वह प्राथमिकता नहीं मिली जो पंडित जी चाहते थे। दिनांक 19 मार्च सन् 1890 को मात्र 26 वर्ष की अल्पायु में आपका क्षय रोग से पीड़ित होकर निधन हो गया। पं. गुरुदत्त जी ने अपने अल्पजीवन में जो धर्म प्रचार का कार्य किया उसके कारण वैदिक धर्म और आर्यसमाज के इतिहास में उनका नाम सदैव अमर रहेगा।

जीवनदानी महात्मा हंसराज जी

आर्यसमाज के इतिहास में महात्मा हंसराज जी का गौरवपूर्ण स्थान है। आपने महर्षि दयानन्द की मृत्यु के ढाई वर्ष बाद सन् 1886 में स्थापित शिक्षा संस्थान दयानन्द कालेज के लिये अपना जीवन दान करने की घोषणा की थी और उसे जीवन भर निभाया। आप यदि चाहते तो सुखी, समृद्ध व वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते थे परन्तु आपने ऋषि दयानन्द के विचारों से प्रभावित और आत्मप्रेरणा से युक्त होकर स्वेच्छा से अभाव व संकटों का जीवन व्यतीत किया। आपका यह जीवन दान सफल हुआ और इससे देश में शिक्षा क्रान्ति हुई। डी.ए.वी. शिक्षा आन्दोलन सरकारी विद्यालयों के बाद देश के सबसे बड़े शिक्षा संस्थान के रूप में स्थापित है। डी.ए.वी. शिक्षा संस्थान को अपनी सेवायें देते हुए आप सभी प्रलोभनों से दूर रहे और सादा जीवन व्यतीत करते हुए देश व समाज के उत्थान सहित धर्म प्रचार तथा पीड़ितों की सेवा में अपने जीवन का निर्वाह करते रहे। आपका जन्म 19 अप्रैल, सन् 1864 को ग्राम बजवाड़ा जिला होशियारपुर, पंजाब में लाला चुनी लाल जी के यहां हुआ था। सन् 1879 में आर्यसमाज लाहौर के प्रधान लाला र्साइंदास जी के सत्संग से आप पर आर्यसमाज का रंग चढ़ा था और आप आर्यसमाज के सदस्य बने थे। सन् 1880 में आपने मिशन स्कूल लाहौर से मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। आपने सन् 1885 में राजकीय कालेज लाहौर से बी.ए. किया। आप पंजाब विश्वविद्यालय में द्वितीय रहे थे। 27 फरवरी 1886 को आपने महर्षि दयानन्द की स्मृति में स्थापित किए जाने वाले दयानन्द कालेज के लिये जीवन दान करने की सार्वजनिक घोषणा की थी। इसके बाद जून, 1886 में आप डी.ए.वी. स्कूल के मुख्याध्यापक बने। आप सन् 1891 में आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के प्रधान भी बने। सन् 1893 में आप आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा के प्रधान बनाये गये। आपने भूकम्प, दुष्काल, बाढ़, दंगों, महामारी के पीड़ितों की समय-समय पर उल्लेखनीय सहायता की। सन् 1911 में आपने डी.ए.वी. स्कूल व कालेज का कार्य करते हुए 25 वर्ष पूर्ण होने पर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। अधिकारियों द्वारा मनाने पर भी आपने त्यागपत्र वापिस नहीं लिया। आप सन् 1913 में कालेज कमेटी के प्रधान चुने गये थे। माता ठाकुर देवी जी आपकी सहधर्मिणी थी। सन् 1914 में उनका निधन हुआ। सन् 1918 में आप पंजाब शिक्षा सम्मेलन के अध्यक्ष बनाये गये। सन् 1923 में आपने स्वामी श्रद्धानन्द जी के साथ मलकाना राजपूतों की शुद्धि की थी। यह कार्य बहुत महत्व रखता है। वैदिक धर्म की रक्षा के लिए शुद्धि का कार्य आवश्यक है। सन् 1924 में आपको अखिल भारतीय शुद्धि सभा का प्रधान बनाया गया। सन् 1927 में आप प्रथम आर्य सम्मेलन के प्रधान बनाये गये। आपको सन् 1933 में पंजाब प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रधान भी बनाया गया था। सन् 1937 में आपने आर्य प्रादेशिक सभा के प्रधान पद से भी त्याग पत्र दे दिया। उदर शूल रोग से त्रस्त होकर लाहौर में दिनांक 15 नवम्बर, 1938 को आपका देहावसान हुआ। आर्यसमाज में जीवन दानी एक ही महापुरुष हुए और वह थे हमारे महात्मा हंसराज जी। उनकी पावन स्मृति को सादर नमन।

अनेक गुरुकुलों के संस्थापक एवं आर्यसमाज के प्रचारक स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती

स्वामी दर्शनानन्द जी का नाम सुनते ही गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर की स्मृति मन में उभरती है। आपने इस महाविद्यालय की सन् 1907 में स्थापना कर इसके माध्यम से उच्चकोटि के विद्वान एवं प्रचारक आर्यसमाज को दिये। गुरुकुल कांगड़ी के समान एक बहुत बड़े परिसर में इस गुरुकुल की स्थापना होकर संचालन हुआ व अब भी हो रहा है। पं. प्रकाशवीर शास्त्री इसी महाविद्यालय से शिक्षित थे और आर्यसमाज के प्रमुख रत्नों में से एक महत्वपूर्ण रत्न थे। स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती जी का जन्म पंजाब प्रान्त के लुधियाना नगर के जगरांव कस्बे में माघ कृष्णा 10 संवत् 1918 विक्रमी को पं. रामप्रताप शर्मा जी के यहां हुआ था। पिता वाणिज्य व्यवसाय करते थे। सन्यास से पूर्व आपका नाम पं. कृपा राम था। वाणिज्य व्यवसाय में कृपाराम जी की रूचि नहीं थी। अतः आप विद्या प्राप्ति के लिये काशी आ गये। काशी में आपने संस्कृत का अध्ययन किया। आपने संस्कृत के छात्रों की सुविधा के लिये एक ‘तिमिरनाशक प्रेस’ की स्थापना कर अनेक संस्कृत ग्रन्थों का प्रकाशन किया और उन्हें छात्रों को उपलब्ध कराया। काशी में प्रवास के दिनों में आपने आर्यसमाज के सम्पर्क में आकर वैदिक सिद्धान्तों को स्वीकार किया था। सन् 1901 में आपने शान्त-स्वामी अनुभवानन्द जी से संन्यास की दीक्षा ली और पं. कृपाराम के स्थान पर स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती नाम धारण किया। स्वामी जी ने ईसाई, मुसलमान, पौराणिक एवं जैन आचार्यों से अनेक शास्त्रार्थ किये। आप वर्षों तक प्रतिदिन एक टैªक्ट लिखा करते थे। वर्तमान में आपके कुछ टैªक्टों का एक संकलन ‘दर्शनानन्द ग्रंथ संग्रह’ के नाम से मिलता है। आपने अनेक पत्र भी निकाले। ईश्वर की व्यवस्था में आपका अटूट विश्वास था। एक बार गुरुकुल में भोजन सामग्री उपलब्ध नहीं थी। भोजन का समय हो गया। ईश्वर के सहारे स्वामी जी ने बालकों को भोजन के लिये पंक्तिबद्ध बैठने और भोजन का मन्त्र उच्चारण कराने की प्रेरणा की। इसका पालन किया गया। तभी वहां कुछ लोग बड़ी मात्रा में भोजन लेकर आ पहुंचे। उन्होंने बताया कि उनके यहां एक बारात ने आना था परन्तु किसी कारण वह न आई। उन्होंने भोजन परोसने की अनुमति मांगी जो उन्हें दे दी गई। बच्चों ने भर पेट भोजन किया। यह एक प्रकार का चमत्कार था जिसकी किसी को कल्पना तक नहीं थी।

स्वामी दर्शनानन्द जी ने बड़ी संख्या में ग्रन्थों का प्रणयन किया। इस संक्षिप्त लेख में उनका उल्लेख करना सम्भव नहीं है। बच्चों के लिये आपने एक कथा पच्चीसी लिखी है। यह छोटे व बड़े सभी लोगों के लिये पढ़ने योग्य है। आपने सिकन्दराबाद में सन् 1898, बदायूं में सन् 1903, बिरालसी (जिला मुज्जफरनगर) में सन् 1905, ज्वालापुर में सन् 1907 तथा रावलपिण्डी आदि अनेक स्थानों पर गुरुकुलों की स्थापनायें कीं। स्वामी जी का निधन हाथरस में 11 मई सन् 1913 में हुआ था। स्वामी जी ने चार दर्शनों, 6 उपनिषदों सहित मनुस्मृति व गीता पर भी भाष्य व टीका ग्रन्थ लिखे हैं। आपके उज्जवल चरित्र से प्रभावित होकर ही आर्यसमाज आगे बढ़ा है। आप अपने समय के आर्यसमाज के बहुत बड़े स्तम्भ थे। आपकी पावन स्मृति को सादर नमन।

जिन महनीय व्यक्तियों का परिचय हमने इस लेख में दिया है उन्हीं के पुरुषार्थ से आर्यसमाज अपने आरम्भ काल में फला व फूला है। आर्यसमाज के काम को बढ़ाने में ऋषि दयानन्द सहित उपर्युक्त महापुरुषों का उल्लेखनीय योगदान है। इसके बाद अनेकानेक विद्वान व महापुरुष आर्यसमाज के आन्दोलन से जुड़ते रहे और वेद प्रचार, आर्यसमाजों की स्थापना तथा ग्रन्थ लेखन आदि के माध्यम से अपनी सेवायें देते रहे। स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी तो वैदिक धर्म प्रचार और आर्यसमाज स्थापना यज्ञ की एक प्रकार से प्रमुख प्रेरणा शक्ति थे। इन सभी महापुरुषों ने आर्यसमाज को अपने रक्त से सींचा है। हमारा कर्तव्य हैं कि हम इनके जीवनों से प्रेरणा लें और आर्यसमाज का सघन प्रचार कर धर्म एवं देश की रक्षा में सहायक हों। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
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