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भारतीय संस्कृति

प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम और शंकराचार्य

जब 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्री रामलला की मूर्तियों का प्राण प्रतिष्ठा समारोह कार्यक्रम संपन्न हुआ तो उसमें चारों शंकराचार्य ने अपनी अनुपस्थिति दर्ज कराई। कई लोगों ने उनके इस निर्णय की आलोचना की तो देश की विपक्षी पार्टियों ने इसे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम करने का अच्छा अवसर समझा। कांग्रेस सहित सभी सेकुलर पार्टियों ने शंकराचार्यों के इस निर्णय को उचित बताया और कहा कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम को संपन्न नहीं कर सकते। यदि वह ऐसा कर रहे हैं तो वह हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं का उपहास कर रहे हैं।
अयोध्या में पांच सदियों के संघर्ष के पश्चात राम जन्मभूमि पर श्रीराम लला मंदिर की पुनर्प्रतिष्ठा समारोह में चारों शंकराचार्यों की अनुपस्थिति किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं थी। उन्हें उस समय धैर्य और संयम का परिचय देना चाहिए था। जिन लोगों ने सदियों के संघर्ष में अपना बलिदान दिया ,उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि देने के लिए तो हमारे धर्माचार्यों को कम से कम जाना ही चाहिए था, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। इससे यह पता चला कि हमारे धर्माचार्य प्रमुखों के भीतर भी मानवीय दुर्बलताएं हैं जब से वैदिक ऋषियों का काल समाप्त हुआ तब से लेकर आज तक धर्माचार्य प्रमुखों ने अनेक अवसरों पर इसी प्रकार की हठधर्मिता दिखाने का कार्य करते हुए हिंदू समाज को दुर्बल करने का काम किया ।उन्होंने एक बार फिर यह आभास कराया कि वह अपनी परंपरागत बीमारी से उभरे नहीं हैं। राजनीतिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के भीतर यदि अहंकार की प्रवृत्ति देखी जाए तो कहा जा सकता है कि उनकी कोई साधना नहीं होती, इसलिए उनके भीतर इस प्रकार की प्रवृत्ति पाया जाना कोई बुरी बात नहीं है। पर जब अहंकार नाम का शत्रु धार्मिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के भीतर भयंकर रूप में विद्यमान देखा जाता है तो दुख होता है।
चार में से दो शंकराचार्यों पूर्वाम्नाय जगन्नाथ पुरी के गोवर्धन पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती और उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कड़े शब्दों में अपनी टिप्पणी व्यक्ति की और स्पष्ट किया कि वे किसी भी कीमत पर इस समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराएंगे।
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कार्यक्रम से अपनी सहमति और विरोध व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि “धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के प्रधानमंत्री गर्भगृह में जाकर देव विग्रह में प्राण प्रतिष्ठा का उपक्रम करेंगे, ये शास्त्रोक्त विधि नहीं है। जहां शास्त्रीय विधि का पालन नहीं हो, वहां हमारा रहने का कोई औचित्य नहीं है। क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि विधि पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा न हो उस प्रतिमा में देव विग्रह की बजाय भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल आदि हावी हो जाते हैं। उसकी पूजा का भी अशुभ फल होता है, क्योंकि वो सशक्त हो जाते हैं। ऐसे शास्त्र विरुद्ध समारोह में हम ताली बजाने क्यों जाएं ? ये राजनीतिक समारोह है। सरकार इसका राजनीतिकरण कर चुकी है।”
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती की इस टिप्पणी में उनके भीतर का क्रोध झलकता है। अहंकार झलकता है। उनके भीतर की हताशा झलकती है। यह भाव झलकता है कि वह इस कार्यक्रम में केवल इसलिए नहीं गए क्योंकि इसे देश के प्रधानमंत्री संपन्न कर रहे थे। यदि सारी बूझ केवल शंकराचार्यों की होती तो संभव था कि वह अधूरे निर्मित राम मंदिर में भी मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करने चले जाते। दूसरी बात उन्होंने धर्मनिरपेक्ष देश को लेकर कही है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में प्रधानमंत्री के लिए यह शोभा नहीं देता कि वह मंदिर में जाकर किसी मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करें। वास्तव में , जब से यह धर्मनिरपेक्ष शब्द भारत की राजनीति में आया है तब से ही भारत के वैदिक धर्म को उपेक्षित करने का सिलसिला आरंभ हुआ है। यहां हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं की मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा करने की व्यवस्था वैदिक धर्म में कहीं नहीं है। परंतु यदि श्रीराम के चरित्र को एक माध्यम बनाकर नए ओजस्वी तेजस्वी राष्ट्रवाद की अवधारणा को स्थापित कर उसके बहाने लोगों के भीतर प्राणों का संचार करने की बात की जा रही हो तो हम उससे सहमत हैं। श्रीराम का चरित्र सभी को स्वीकार है।
राम के व्यक्तित्व कृतित्व और चरित्र में विश्वास रखने वाले लोगों को इस समय वैश्विक स्तर पर विजयानुभूति हुई है। अब से पहले देश की धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने रोजा इफ्तार पार्टी का प्रचलन किया था । तब देश के शंकराचार्यों को यह देखना चाहिए था कि धर्मनिरपेक्ष देश में रोजा इफ्तार पार्टी का क्या औचित्य है ? पर धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए ही उस समय ये मौन साध गए थे । आज जब देश के राष्ट्रवाद को जागृत करने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बिगुल फूंका जा रहा है तो इन्हें उस पर आपत्ति है। राजनीतिक लोगों की ऐसी दोहरी मानसिकता देखी जा सकती है, पर इसे हमारे धर्माचार्य भी स्वीकार कर लेंगे, यह सचमुच दुखद है।
आजादी के बाद इस देश की संस्कृत विरासत को अपनी समझने वाले और देश की मुख्य धारा के साथ समन्वय स्थापित कर चलने वाले हिंदू समाज की घोर उपेक्षा की गई। हालात इस प्रकार के बनाए गए कि हिंदू होने पर लोगों को संकोच होने लगा। हिंदू होने पर उन्हें शर्म आने लगी। तब देश में “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” जैसे नारे किन्हीं संगठनों की ओर से यदि सुनाई दिए तो वह समय की आवश्यकता थी, उसी का परिणाम है कि आज हिंदुत्व स्थापित हो रहा है। यदि धर्मनिरपेक्षता के भरोसे देश के हिंदुत्व को, देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को और राम मंदिर के निर्माण को छोड़ दिया गया होता तो शंकराचार्य जी ! कभी भी इस देश में राम मंदिर का निर्माण नहीं होता। आपको यह स्मरण रखना चाहिए कि जिन लोगों ने “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” कह कर देश का विमर्श परिवर्तित करने का श्लाघनीय कार्य किया था उन लोगों ने कई प्रकार के अत्याचारों को भी सहन किया, कितने ही बलिदान भी दिए। आज यदि वह कुछ श्रेष्ठ कार्य करके उसका श्रेय ले रहे हैं तो इस पर सबसे पहले उनका अधिकार है। जिस समय वह “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” का उद्घोष कर रहे थे, उस समय देश के धर्माचार्य मौन साधे बैठे थे।
– इस सच को भी आपको स्वीकार करना चाहिए। जिसने कर्म किया, फल उसको मिलना निश्चित है अर्थात उस कर्म के फल पर उसी का अधिकार है। यह सनातन का सिद्धांत है और इस सिद्धांत को हमारे शंकराचार्य भी जानते और मानते हैं। तब कर्म का फल पाने वाले व्यक्ति से उन्हें ईर्ष्या क्यों हो रही है ?
अकर्मण्यता से राष्ट्र कभी आगे नहीं बढ़ता। यह समाज और राष्ट्र को शिथिल बनाती है । प्रमादी बनाती है। आलसी बनाती है। जिससे लोग एक दूसरे के अधिकारों का हनन करने लगते हैं। भारतीय समाज में आश्रम की व्यवस्था कर्मशीलता का प्रतीक है। जब केवल शास्त्र शास्त्र की बात की जाती है तो उससे लोगों की कर्मशीलता प्रभावित होती है । निरा अध्यात्मवाद भी कई बार ढोंग और पाखंड में परिवर्तित होकर रह जाता है। अध्यात्म तभी फलवती और बलवती होता है जब उसके साथ कर्म का व्यावहारिक पक्ष आकर खड़ा हो जाता है। भारत ने रामचंद्र जी के मंदिर को खोने के दुखद पलों को भी देखा है। पर उसके लिए उसकी कर्मशीलता ने क्षत्रियत्व और वीरता का बाना पहन कर अनेक बलिदान भी दिए हैं । पिछले पांच सौ वर्ष की बलिदानी गाथा हमें भारत के पौरुष और पराक्रम के बारे में बताती है। आजादी के बाद पौरुष और पराक्रम की इस परंपरा का निर्वाह जारी रहा। यद्यपि कांग्रेस की सरकारों के शासनकाल में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शिथिल पड़ गई, पर जब कुछ हिंदूवादी संगठन विभिन्न क्षेत्रों से आवाज लगाते हुए आगे बढ़े तो राम मंदिर निर्माण देश के लिए अनिवार्य हो गया। बलिदान और पराक्रम की इस परंपरा को भुलाया नहीं जा सकता।
शरद राम कोठारी जैसे सैंकड़ों वीरों ने माता का आंचल सूना किया है। उनका बलिदान भारत माता के माथे का चंदन है।
अब हमारे शंकराचार्य इन सब बातों को एक ओर रखकर प्रधानमंत्री मोदी की कार्य शैली को भी कोस रहे हैं। जबकि वह भली प्रकार जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व का मिलना हमारे देश का सौभाग्य है। राम मंदिर निर्माण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
इस सबके अतिरिक्त हम सबको यह भी विचार करना चाहिए कि भारत में राजशक्ति और ब्रह्म शक्ति दोनों मिलकर काम करती रही हैं। जहां ब्रह्म शक्ति पूजनीय है, वहां राज शक्ति भी अपने कार्य और व्यवहार की दृष्टि से अत्यंत वंदनीय है। शास्त्र की रक्षा शस्त्र से होती है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता।
आज लोकतांत्रिक समाज में कुछ चीजें बदल गई हैं ।कुछ मान्यताएं भी बदली हैं ।अब वोट की राजनीति बहुत अधिक हावी रहती है। वोट की राजनीति के चलते कांग्रेस हिंदू विरोध करते-करते हिंदुओं में से ही हिंदुओं के विरोधी बनती चली गई। देखते ही देखते देश में बड़ी संख्या में भारत विरोधी लोग बढ़ते चले गए। आज की परिवर्तित परिस्थितियों में उन सभी भारत विरोधियों को यदि सेकुलर पार्टियों का वोटर बना कर देखा जाए तो लगभग 60% से अधिक लोग ऐसे हैं जो भारत और भारतीयता के विरोध में जाकर अपना मत डालते हैं। 40% से भी कम लोगों का विश्वास प्रधानमंत्री मोदी के साथ रहता है। जो राष्ट्रवादी दृष्टिकोण अपना कर उनके साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं। इन लोगों में से यदि 10 – 20 लाख मतदाता भी दूसरे खेमे में चले जाएं तो भी प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता से हटाया जा सकता है, इसलिए इन सबको साधना और जितना हो सके 60% में से भी अपने साथ कुछ और लोगों को खींच कर लाना, प्रधानमंत्री मोदी या उनके स्थान पर जो भी कोई प्रधानमंत्री होता, उसके लिए अनिवार्यता होती। ऐसी परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के लिए आवश्यक है कि वह कुछ ऐसे मुद्दों को अपने हाथ में लिए रखें जिस से लोगों का समर्थन निरंतर उनके साथ जुड़ा रहे, अन्यथा सिरों की गिनती के बल पर टिके हुए लोकतंत्र में  राष्ट्र विरोधी शक्तियां कभी भी कुछ भी कर सकती हैं। इस सब की समझ शंकराचार्यों को होनी चाहिए। इसके दृष्टिगत उन्हें गंभीरता दिखाते हुए न केवल अपना बल्कि देश के बहुसंख्यक समाज का समर्थन भी वर्तमान में प्रधानमंत्री के साथ व्यक्त करने की अपील करनी चाहिए थी।
जब हमारे शंकराचार्यों को इस प्रकार प्रधानमंत्री का विरोध करते हुए कुछ मुस्लिम संगठनों या मुल्ला मौलवियों ने देखा तो उनके कान खड़े हुए। फलस्वरूप उन्होंने भी प्रधानमंत्री के साथ-साथ अयोध्या में बने राम मंदिर के कार्यक्रम की आलोचना करनी आरंभ कर दी। यद्यपि उस समय ऐसा भी देखा गया कि राम मंदिर के कार्यक्रम ने सभी समुदायों के लोगों को उल्लास में डुबा दिया। ऐसे भी समाचार समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए कि मुस्लिम महिलाओं तक ने भगवा वस्त्र धारण कर अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। वहां पर उन्होंने कार्यक्रमों में भाग लिया और श्री राम के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए सुंदर-सुंदर गीत और भजन भी प्रस्तुत किये। जिस समय वास्तविक अर्थों में सांप्रदायिक सद्भाव का यह आयोजन मुस्लिम महिलाओं के गीत संगीत के माध्यम से हो रहा था, उस समय कई ऐसे धर्मनिरपेक्ष नेता भी थे जो अपनी भड़काऊ बयानबाजी कर रहे थे। वह दोनों संप्रदायों के बीच आग लगाने का प्रयास कर रहे थे। उनमें से कई नेता ऐसे थे जो मुस्लिम समाज को बाबरी के नाम पर भड़काने का प्रयास कर रहे थे तो कई उन्हें राम मंदिर के नाम पर डराने का प्रयास कर रहे थे।
इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा ने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उस समय देश में सांप्रदायिकता की आग लगाने का प्रयास किया। उन्होंने राम मंदिर पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि हर बार मुसलमान कुर्बानी नहीं देगा। उन्होंने कहा, “हमसे हमारी मस्जिद छीनी जा रही है। इस बात को हम बर्दाश्त नहीं कर सकते। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा को हमारी अजान से भी दिक्कत है।”
<  यदि देश की सांप्रदायिक ( धर्मनिरपेक्ष नहीं ) राजनीति धर्मनिरपेक्षता के मकड़जाल में न फांसी होती तो कथित धर्मनिरपेक्ष नेता सांप्रदायिकता को हवा न देते दिखाई देते।
मौलाना तौकीर रजा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा, “सुप्रीम कोर्ट का फैसला पहले से तय था, जिसने ये निर्णय दिया उसे राज्यसभा भेज दिया गया।”
मौलाना तौकीर राजा की इसी प्रवृत्ति और मानसिकता का अनुकरण करते हुए असम के बारपेटा के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल ने भी मुस्लिम समाज और विशेष रूप से मुस्लिम युवाओं में डर फैलाते हुए कहा कि 20 से 25 जनवरी तक सारे मुसलमानों को अपने घर में रहना होगा।
इस प्रकार की बयानबाजी का एक ही अर्थ था कि जैसे भी हो देश के सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ा जाए, देश में आग लगाई जाए और जिस प्रकार देश का इतिहास नई करवट लेता हुआ दिखाई दे रहा है, उसे ऐसा करने से रोका जाए।
अजमल ने आग उगलते हुए कहा, “हमें सतर्क रहना होगा। मुसलमानों को 20 से 25 जनवरी तक यात्रा करने से बचना चाहिए। पूरी दुनिया राम जन्मभूमि में रामलला की मूर्ति स्थापित होते देखेगी। लाखों लोग बसों, ट्रेनों, हवाई जहाज आदि से यात्रा करेंगे। शांति बनाए रखनी होगी।” अजमल ने कहा, “इस दौरान हमें यात्रा करने से बचना होगा और घर ही रहना होगा। भाजपा मुसलमानों की सबसे बड़ी दुश्मन है। यह हमारे जीवन, आस्था, मस्जिदों, इस्लामी कानूनों और अजान की दुश्मन है।”
बात स्पष्ट है कि भारतवर्ष में रहते हुए जो कोई भी राष्ट्रहित की बात करेगा , वही मुस्लिम नेताओं को मुस्लिम विरोधी दिखाई देगा । इसका कारण केवल एक है कि मुस्लिम नेताओं की दृष्टि और दृष्टिकोण में राष्ट्रहित से पहले मुस्लिम हित चढ़ा होता है। उन्हें देश के सांस्कृतिक मूल्यों से या वैदिक चिंतन से, इस देश के लिए मर मिटने वाले हिंदू योद्धाओं के पराक्रमी इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें उन लोगों के गुणगान में देश की राजनीति का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप बचता हुआ दिखाई देता है जिन्होंने इस देश की सांस्कृतिक चेतना को मिटाने का हर संभव प्रयास किया।

पर इस सबसे बड़ी बात यह है कि इन मुस्लिम नेताओं की जुबान खुलने से भी अधिक घातक उन धर्माचार्यों की जुबान है जो देश के हिंदुत्व पर पलते हैं और उसी के लिए मर मिटने की सौगंध उठाते हैं । इसके उपरांत भी ईर्ष्या और द्वेष के शिकार होकर भारतीयता के विरुद्ध बोलते हैं। यह बात हम इसलिए भी कह रहे हैं कि मुस्लिम नेताओं का तो अपना घोषित एजेंडा है कि उन्हें भारतीयता के विरुद्ध ही बोलना है। पर भारत के धर्माचार्य प्रमुखों का ऐसा कोई घोषित एजेंडा नहीं है कि उन्हें भारत के विरोध में बोलना है , उनका एजेंडा तो भारत हित में काम करने का है। तब नैतिकता, न्याय और राष्ट्रहित का तकाजा यही है कि वह भारत के हित में ही काम करें। गंभीरता का परिचय देते हुए राष्ट्रहितकारी निर्णयों को दूरदर्शिता पूर्ण सावधानी के साथ लागू होने दें।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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