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कविता

महाठगबंधन

 

 

कभी गरियाते हैं

तो कभी गले लगाते हैं
निज लाभ लोभ में 

एक-दूजे को सहलाते हैं

एक पूरब एक पश्चिम

एक उत्तर एक दक्षिण 

देखो सब मिलकर अब

क्या-क्या गुल खिलाते हैं। 

जनता को सदा छलते रहे 

हक उनका ये निगलते रहे 

विचारधारा मिले या न मिले  

ये तेल में पानी मिलाते हैं। 

 

करके वादा दिए के साथ का 

हवा के साथ हो जाते हैं 

अपने हित को नारों में 

सदा जनहित ये बताते हैं। 

 

एक-दूसरे को हमेशा ही 

मौका मिलते ही नोचते रहे  

देख शेर सामने अपने 

गीदड़-गीदड़ मिल जाते हैं। 

 

न कोई किसी की बहन 

  कोई किसी का भैया 

सबको बचानी है कैसे भी 

अपनी-अपनी डूबती नैया 

 

नकली वादे, नकली दावे 

नकली इनके सब नारे हैं 

लोकतंत्र का मजाक उड़ाते 

ये लोकतंत्र के हत्यारे हैं। 

– डॉ. शैलेश शुक्ला, मझगवाँ, पन्ना, मध्य प्रदेश

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