महर्षि दयानन्द जी का स्वकथित जीवनचरित्र, भाग 4

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कुछ दिन पीछे मैंने कहा कि आप ने काशी जाने से रोका, इसमें मेरा कुछ आग्रह नहीं परन्तु यहां से तीन कोस पर अमुक ग्राम में जो बड़े वृद्ध और अपनी जाति के भारी विद्वान् रहते हैं और वहां हमारे घर की जमींदारी भी है, उनके पास जाकर पढ़ा करूं, इतना तो मान लीजिये । इस बात को मां-बाप ने स्वीकार कर लिया और मैं प्रशंसित पंडित के पास कुछ समय तक अच्छी प्रकार पढ़ता रहा।
परन्तु दैव संयोग से एक बार बातचीत के समय उस पंडित के सामने मुझे इस बात को स्वीकार करना पड़ा कि मुझको विवाह से ऐसी प्रबल घृणा है कि जो मेरे मन से किसी प्रकार दूर नहीं हो सकती। जब पिता जी को यह सूचना मिली तो <span;>उन्होंने वहां से मुझे उसी क्षण बुला लिया और विवाह की तैयारी आरम्भ कर दी। मैं घर आकर क्या देखता हूं कि अनेक प्रकार के विवाह के सामान तैयार हो रहे हैं। इधर मेरी अवस्था भी २१ वर्ष की पूरी हो गई थी।
मेरे मन में तो घर छोड़ कर निकल जाने की थी परन्तु ऐसी सम्मति कोई न देता था। जो देता था वह लग्न करने की सम्मति देता था । उस समय मैंने निश्चित जाना कि अब विवाह किये बिना लोग कदाचित् नहीं छोड़ेंगे और न अब मुझ को भविष्य में विद्याप्राप्ति की आज्ञा मिलेगी और न माता-पिता मुझ को अविवाहित रखना स्वीकार करेंगे। तब मैंने अपने मन में सोच-विचार कर यह निश्चय ठाना कि अब वह काम करना चाहिये जिससे जन्म भर को इस विवाह के बखेड़े से बचूं | यह निश्चय मैने किसी पर प्रकट न किया। एक मास में विवाह की तैयारी भी हो गई। प्रत्येक प्रकार की तैयारी देखकर मैं एक दिन सायंकाल सं० १९०३ में बिना किसी दूसरे को सूचित किये गुपचुप घर से इस निश्चय से कि फिर कभी लौट कर न आऊंगा, चल निकला। (संवत् १९०३ में उनकी अवस्था का बाईसवां वर्ष प्रारम्भ हो गया था। अतः उनका जन्म सम्भवतः संवत् १८८१ की समाप्ति पर हुआ था अर्थात् उसका एक आध मास अथवा कुछ दिन शेष होंगे। यह निश्चित होता है कि माघ मास अथवा फाल्गुन मास में उनका जन्म हुआ था)। ‘
विवाह की तैयारी और घर से पलायन-पहली रात्रि तो मैंने अपने ग्राम से आठ मील के अन्तर पर एक ग्राम के आस-पास व्यतीत की। दूसरे दिन एक पहर रहे रात्रि को उठकर २० कोस अर्थात् ३० मील पर सायंकाल से पहले पहुंच गया और एक ग्राम में हनुमान के मन्दिर में जा रहा। मार्ग में इस चाल से गया कि प्रसिद्ध मार्ग और ऐसे ग्राम बचाता गया , जिनमें कोई पहचान न सके। यह सावधानी मेरे बड़े काम आई क्योंकि घर से निकलकर तीसरे दिन मैंने एक राजपुरुष से यह सुना कि अमुक का लड़का घर छोड़कर चला गया है, उसको खोजने के लिए सवार तथा पैदल मनुष्य यहां तक आये थे। यह सुन कर मैं आगे चल पड़ा।

ठग वैरागी द्वारा ठगे गये-

वहां एक और दुर्घटना घटित हुई अर्थात् जो मेरे पास थोड़े से रुपये और अंगूठी आदि आभूषण थे वे एक भिक्षुओं की टोली ने ठग लिये और कहा कि तुमको पक्का वैराग्य तब होगा कि जब अपने पास की सब वस्तुएं पुण्य कर दोगे। उनके कहने से मैंने सब दे दिया । इसका वृत्तांत इस प्रकार है कि मार्ग में एक वैरागी ने एक मूर्ति जमा रखी थी । हाथ में सोने की अंगूठियां डाल कर वैराग्य की सिद्धि कैसे हो सकती है, इस प्रकार (कहकर) मुझे चिढ़ा कर मेरी ओर से वे तीनों अंगूठियां उसने मूर्ति के समर्पण करा लीं ।

नैष्ठिक ब्रह्मचारी शुद्ध चैतन्य बने, दूसरे नकली वैरागी से बचे-

तत्पश्चात् लाला भक्त के स्थान में जो सायले ग्राम’ में हैं (यह ग्राम अहमदाबाद-मोरवी रेलवे के स्टेशन मोली से चार कोस और आर्यसमाज कस्बा रानपुर से ११ कोस है) वहां बहुत साधुओं को सुनकर चला गया। उस स्थान पर एक ब्रह्मचारी मिला, उसने कहा कि तुम नैष्ठिक ब्रह्मचारी हो जाओ और उसने मुझे ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी और ‘शुद्ध चैतन्य’ ब्रह्मचारी मेरा नाम रखा और मेरे पहले वस्त्र उतरवा कर अपने समान मुझे काषायवस्त्र कराकर गेरुआ कुर्ता पहना दिया और हाथ में एक तूंबा दे दिया और मैं उनके थोक (समूह) में मिल गया और वहां योगसाधना करने लगा। रात को जब एक वृक्ष के नीचे बैठा था ऊपर पक्षियों ने धू-धू करना आरम्भ किया। सुनकर मुझे भूत का भय लगा और मैं पीछे मठ में आ गया। इस नये वेष में वहां से चलकर ‘कोट कांगड़ा’ नामक एक छोटे से कस्बे में (जहां छोटा-सा राज्य भी है), जो अहमदाबाद, गुजरात के समीप है, आया। वहां बहुत से वैरागी थे और कहीं की रानी भी उनके फन्दे में फंसी हुई थी, उन्होंने मेरे वेष को देखकर ठट्ठा करना प्रारम्भ किया और मुझे अपने में फांसने लगे परन्तु मैं उनके फन्दे से छूटकर भागा। रेशमी किनारे की धोतियां उन्हीं वैरागियों के कहने से वहां फेंक दी और तीन रुपये पास थे उन्हें खर्च करके साधारण धोतियां लीं और वहां ब्रह्मचारी के नाम से प्रसिद्ध रहा। मैं वहां तीन मास रहा था।

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