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प्राण प्रतिष्ठा –एक विवेचन* भाग 3

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(इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है ,लेकिन इस विषय पर वैदिक विचार रखना भी जरुरी है )
डॉ डी के गर्ग
भाग-3
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प्राण प्रतिष्ठा का क्या मतलब है?
प्राण प्रतिष्ठा का मतलब है कि मूर्ति में प्राणों की स्थापना करना या जीवन शक्ति को स्थापित करके किसी भी मूर्ति को देवता के रूप में बदलना. प्राण प्रतिष्ठा के दौरान मंत्रों का उच्चारण और विधि-विधान से पूजा करके मूर्ति में प्राण स्थापित किए जाते हैं। और इसके बाद उस मूर्ति को भोग लगाना ,नहाना ,वस्त्र पहनाना ,आरती करना ,आशीर्वाद मांगना फिर सुरक्षा के लिए ताले में बंद कर देना सुरु हो जाता है। मूर्ति के उपासक उससे मन्नत मांगते है , कुछ धन देकर ,कुछ लम्बी लाइन में लगकर मूर्ति को ईश्वर मानकर आशीर्वाद मांगते है।

विश्लेषण :
१) यदि प्राण प्रतिष्ठा मूर्ति में हो जाती है तो मूर्ति सप्राण हो जाएगी,वह भी प्राणवंत की तरह हरेक कार्य कर सकेगी। जैसे खाना, पीना, हंसना, खेलना,दौड़ना, मौज,मस्तीकरना,नींद लेना जागना, जगाना,दातुन करना,कपड़े पहनना, नहाना टॉयलेट जाना, छींकना,सांस लेना, थूकना, बोलना, पढ़ना, लिखना, भाषण देना अर्थात सभी क्रियाओं का प्रयोग हो सकेगा। यदि एक प्राणवंत के साथ सभी क्रियाओं का प्रयोग हो सकता है तो फिर मंदिर के पुजारी की आवश्यकता क्या है? पुजारी नहलाएंगे,कपड़े पहनाएंगे,भोग लगाएंगे, सुलाएंगे, जगाएंगे जैसे एक मां बच्चे को सहयोग करती है। एक बच्चे से मां बड़ी होती है।क्या पूजारी मां की भूमिका निभाएंगे? क्या भगवान शिशु की तरह सामर्थ्यहीन है और पुजारी मां की तरह सशक्त है अर्थात् ईश्वर से बड़ा पुजारी होता है। एक शिशु मां के पेट से सप्राण बाहर आता है और आज तक किसी मनुष्य ने किसी शिशु में प्राण प्रतिष्ठा नहीं की। यदि ऐसा हो सकता तो मृत शिशु में भी प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है और मृत किसी भी अवस्था के मनुष्य में भी प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है ।लेकिन आज तक किसी शंकराचार्य के निष्प्राण पार्थिव देह को भी किसी शंकराचार्य ने , पुजारी ने,वैदिक विद्वान् ने या किसी भी आस्था वादी ने,साधु संत महात्मा,ऋषि, मुनि, महर्षि ने भी किसी व्यक्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर जीवित किया हो,या कर सकने का दावा किया हो,ऐसा उल्लेख नहीं मिलता है।और न ही वेदों में ऐसा कोई मंत्र है जिसे बोलने से कोई पुनः उठ खड़ा हो।महामृत्युंजय मंत्र त्रयंबकं यजामहे भी मौत से किसी को बचा नही सकता है। पाषाणादि मूर्त्ति विषयक वेदों में एक मन्त्र भी नहीं वैसे ‘स्नानं समर्पयामि’ इत्यादि वचन भी नहीं है। अर्थात् इतना भी नहीं है कि ‘पाषाणादिमूर्त्तिं रचयित्वा मन्दिरेषु संस्थाप्य गन्धादिभिरर्चयेत्।’ अर्थात् पाषाण की र्मूर्त्ति बना, मन्दिरों में स्थापन कर, चन्दन अक्षतादि से पूजे। ऐसा लेशमात्र भी नहीं।
– महर्षि दयानंद

2) किसी भी वेद (ऋग्वेद , यजुर्वेद, साम वेद, अथर्व वेद), वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, और ज्योतिष – जिसमें अंक गणित, बीज गणित , भूगोल , खगोल , और भूगर्भ विद्या है), उपांग (योग, सांख्य, न्याय, वैशेषिक, वेदांत, और पूर्व मीमांसा) आदि ग्रंथों में कही नहीं लिखा हुआ है कि – ” मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद वह देवता बन जाता है और वह प्राण प्रतिष्ठा से पहले देवता नहीं होता। केवल कह देने मात्र से बात की सिद्धि नहीं होती है।
“लक्षण प्रमाणाभ्याम् वस्तु सद्धि न तु प्रतिज्ञा मात्रेण” लक्षण और प्रमाण के द्वारा वस्तु की सिद्धि की जाती है, केवल कह दिया इससे वस्तु की सिद्धि नहीं होती। इसीलिए प्रमाण दीजिये और तर्क की कसौटी पर कसिए।

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