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इतिहास के पन्नों से

असंख्य है भारत के बलिदानियों की संख्या

भारत की वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले बलिदानियों की संख्या असंख्य है। जिन करोड़ों लोगों का धर्मांतरण किया गया, उनकी दारुणकथा पर कोई ध्यान नहीं देता। इसके अतिरिक्त जिन करोड़ों लोगों ने अपना धर्म परिवर्तन करने से इनकार किया और इसके लिए उन्हें अपने सर काटने पड़े, पूरे के पूरे परिवारों ने अपना बलिदान दिया, उन असंख्य बलिदानियों को भी कोई याद नहीं करता। यह कहानी भारतीय उपमहाद्वीप की ही नहीं है, यह संपूर्ण भूमंडल की कहानी है। क्योंकि ईसा मसीह और मोहम्मद के आने से पहले संपूर्ण भूमंडल पर आर्यों का राज्य था। इन दोनों मजहबों ने वैदिक धर्मी हिंदुओं को संसार के कोने कोने से मार काटकर भगाना या उनका धर्मांतरण कर अपने मजहबी लोगों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयोग किया। भेड़ बकरियों की भांति मारे काटे गए उन वैदिक धर्मी हिंदुओं की दारुण कथा पर यदि शोध किया जाए तो उनकी दारुण कथा और उनके बलिदानों की गाथा को देखकर आंखें फटी की फटी रह जाऐंगी। इस कैलेंडर के माध्यम से हम जो कुछ भी दे रहे हैं, वह तो भारत के बलिदानियों के समुद्र में से मात्र दो बूंद ले लेने के समान है।

…..तब समझा जा सकता है भारत के बलिदानों को

हमसे हमारा बलिदानी इतिहास छुपाया गया है। हमारी स्पष्ट मान्यता है कि भारत के इतिहास का विकृतिकरण नहीं विलुप्तीकरण हुआ है। रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक “वैदिक संपत्ति” डॉक्टर भगवत दत्त जी का “भारत का इतिहास” गुरुदत्त जी का भारतीय इतिहास पर लेखन, डॉ पुरुषोत्तम नागेश ओक जी और इसी प्रकार के अनेक महान लेखकों को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि भारत के आर्यों का विश्व साम्राज्य था। श्री राम जी ने मनु महाराज के वैश्विक साम्राज्य की सुरक्षा करते हुए संपूर्ण भूमंडल से राक्षस शक्तियों का विनाश किया था। श्री राम जी द्वारा स्थापित की गई वह व्यवस्था ईसा मसीह के जन्म तक पूरे यूरोप, एशिया सहित संसार के उन उन क्षेत्रों में काम करती रही जहां-जहां मानव बस्तियां थीं। इन सबसे स्पष्ट होता है कि श्री राम जी द्वारा स्थापित की गई उस व्यवस्था को मिटाने के लिए विधर्मियों ने कितने लोगों का खून बहाया था ? जिन लोगों का खून बहाया गया था वह कोई और नहीं, वह हमारे पूर्वज आर्य ही थे। जिन्हें दुनिया के कोने-कोने से मिटाया गया। इतिहास पर अनुसंधान करने के लिए केवल आज के छोटे से भारत को समझने की आवश्यकता नहीं है, इस भारत को बीज रूप में देखते हुए इसके विशाल स्वरूप अर्थात संपूर्ण संसार के मानव इतिहास पर दृष्टिपात करना होगा। तब कुछ – कुछ दिखाई देगा कि हमारे बलिदानों की संख्या कितनी है और हमें मिटाने वाले कौन थे ?

…….उससे अधिक गद्दार और कौन होगा?

हमने सिकंदर को हराया। राजा पुरु ने भारत के पौरुष का परिचय देते हुए उसे युद्ध के मैदान में पराजय की धूल चटाई। हमने राजा दाहिर सैन के नेतृत्व में मोहम्मद बिन कासिम को पराजित किया, हमने गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के नेतृत्व में अरब आक्रमणकारियों की सेना के रुख मोड़ दिए, हमने राजा भीमदेव के नेतृत्व में महमूद गजनवी को सोमनाथ को तोड़ने का मजा चखाया, हमने बहराइच के राजा सुहेलदेव के नेतृत्व में सलार मसूद की 11 लाख की सेना को गाजर मूली की तरह काटकर समाप्त किया, हमने हंसवर की रानी जयराजकुंवरि के नेतृत्व में अयोध्या के राम मंदिर को तोड़ने वाले मीरबकी खान का सर कलम किया, राजा महताब सिंह के नेतृत्व में लाखों लोगों ने राम मंदिर की रक्षा के लिए अपने बलिदान दिए, उसके पश्चात भी राम मन्दिर के लिए लगभग 76 युद्ध लड़कर अपने राष्ट्रीय धर्मस्थल के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा प्रकट करते हुए अनेक बलिदान दिए, हमने राणा संग्राम सिंह के नेतृत्व में बाबर को पराजित किया और उसके पश्चात अप्रतिम वीरता का परिचय देते हुए अपने बलिदान दिए, हमने महाराणा प्रताप के नेतृत्व में हल्दीघाटी में अकबर को पराजित किया, हमने छत्रसाल की वीरता को दे, हमने वीर बंदा बैरागी, गुरु गोविंद सिंह गुरु ,तेग बहादुर के बलिदानों की झड़ी लगती हुई देखी, हमने वीर शिवाजी के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्र का निर्माण किया और अंत में अंग्रेजों को भी यहां से भगाने में सफलता प्राप्त की। क्या संघर्ष और बलिदान की इस गाथा को केवल भुलाने के लिए लिखा गया था ? निश्चित रूप से जिस कलम ने इस बलिदानी इतिहास को भुलाने का पाप किया है ,उससे अधिक गद्दार भला और कौन होगा?

संसार में सबसे अधिक बलिदान हमने दिए हैं

जो लोग समाज में किसी वर्ग या समुदाय के अधिकारों का हनन करने का काम करते हैं, उनका सामूहिक रूप से विरोध और विनाश करने का आदेश वैदिक संस्कृति प्रदान करती है। वैदिक संस्कृति में विश्वास रखने वाले लोगों का यह मौलिक संस्कार है कि वह ऐसे लोगों का विरोध और विनाश करें। यही कारण रहा कि भारत ने कभी भी उन विदेशी आक्रमणकारियों और उनके शासकों को भारत में शासन न करने देने का संकल्प लिया जो समाज के सभ्य , शालीन और सुसंस्कृत लोगों के अधिकारों का या तो हरण कर रहे थे या उनके प्राण ले रहे थे या उनका धन हरण कर रहे थे या उनकी महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार कर रहे थे। भारत के इस मौलिक संस्कार को जब तक इतिहास में महिमामंडित कर सम्मानजनक स्थान नहीं दिया जाएगा, तब तक भारत को भारत के वास्तविक स्वरूप में समझ पाना असंभव होगा। भारत ने अपने इसी मौलिक संस्कार से प्रेरित होकर अपना दीर्घकालिक स्वाधीनता संग्राम लड़ा और प्रत्येक उस विदेशी आक्रमणकारी या विदेशी शासक का विरोध किया, जो इस देश पर बलात शासन कर रहा था या करने का प्रयास कर रहा था। अपने इस आदर्श के लिए भारत ने बलिदान देने में कभी संकोच नहीं किया। संसार का भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने स्वधर्म, स्वदेश ,स्वभाषा, स्वराज्य , स्वराष्ट्र और स्वसंस्कृति के लिए सबसे अधिक बलिदान दिए हैं। निश्चित रूप से यह हमारे लिए गर्व और गौरव का विषय है।

उनके बलिदानों पर हमें गर्व है

जनरल नेपियर ने अंग्रेजों के द्वारा भारत में किए गए अत्याचारों के विषय में लिखा है – “भारत में अत्याचार अंग्रेजों की ओर से किए गए …. कभी भी किसी बड़ी जाति ने इससे अधिक नीच और क्रूर अन्याय के लिए अपनी शक्ति का उपयोग नहीं किया। भारत को विजय करने में हमारा लक्ष्य, हमारे समस्त अत्याचारों का लक्ष्य धन था, पैसा था। पिछले 60 वर्ष के काल में 1000 मिलियन पौंड अर्थात 10 अरब रुपया के लगभग भारत से निचोड़ा जा चुका है। इस धन का एक-एक शीलिंग खून में से उठाया गया है, उसे पोंछा गया है और हत्यारे ने उसे अपनी जेब में रख लिया है। किंतु हम इस धन को चाहे कितना भी क्यों न पोंछें और धोयें उस पर से खून का दाग नहीं मिट सकता। यह दाग उस पर सदा के लिए स्थापित रहेगा और यदि आसमान पर कोई खुदा है जिसके सामने किसी कौम के व्यापारिक हित नहीं देखे जाते तो निश्चित है कि हमें कभी ना कभी अपने पाप का दंड मिलेगा, अन्यथा हम खुद को जो कुछ समझ बैठे हैं और आशा करते हैं वह सब मिथ्या है। … इस महान कौम ( अंग्रेज ) की दृष्टि में न्याय और धर्म मजाक की चीज हैं। इस प्रकार की कौम का सच्चा खुदा धन है। हो सकता है मेरा विचार विचित्र लगे , पर वास्तव में ईस्ट इंडिया कंपनी के स्वेच्छाचारियों की अपेक्षा स्वेच्छाचारी नेपोलियन को मैं अधिक पसंद करता हूं।”
इस अंग्रेज लेखक की नजरों में इस नीच जाति अंग्रेज से लड़ने वाले हमारे क्रांतिकारी कितने महान थे ? जिन्होंने इतनी निर्दयी और नीच कौम को इस देश से भगाया। उनके बलिदानों पर हमें गर्व है।

बलिदानी पूर्वजों के हम बलिदानी उत्तराधिकारी

हम तैमूर लंग की तलवार का सामना करने वाले जोगराज सिंह गुर्जर और उनके 80 हजार बलिदानी साथियों को भुला नहीं सकते। इसी प्रकार रामप्यारी गूजरी और उनकी बलिदानी सेना की 40000 वीरांगनाओं को भी हम भुला नहीं सकते जिन्होंने तैमूर लंग जैसे विदेशी आक्रमणकारी का सामना करने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान किया था और देवीदीन पांडे के उस बलिदान को भी हम नहीं भुला सकते जिसने राम मंदिर को गिराने वाले बाबर और उसकी सेना का सामना अपने 70000 वीर बलिदानियों के साथ मिलकर किया था। राजा चंपत राय रानी सारंधा , अमर सिंह राठौड़, छत्रसाल, वीर पुत्र पृथ्वीसिंह का शौर्य, दुर्गादास राठौड़, हाड़ी रानी, गोरा बादल का बलिदान , भाई सती दास और मती दास का बलिदान , लखीशाह का बलिदान, फतेह सिंह जोरावर सिंह का बलिदान , गोकुल देव जाट और उनके अन्य अनेक बलिदानी साथी आदि हमारे ऐसे बलिदानी है, जिनको हम कभी नहीं भूल सकते। भारत के तिरंगे में केसरिया रंग सबसे ऊपर रखा गया है। मानो यह केसरिया उनके बलिदानी खून का पता आज भी हमें दे रहा है। तभी तो तिरंगे पर मर मिटने का अमिट भाव आज भी हमारे भीतर उमड़ आता है। यह तिरंगा, यह भगवा हमारे बलिदानों की अमर गाथा है। उसकी अमर निशानी है। जिसमें बलिदानों की लंबी गाथा के सूत्र पिरोए गए हैं। आज हम इस तिरंगे के प्रहरी हैं तो समझिए कि अपने बलिदानी पूर्वजों के हम बलिदानी उत्तराधिकारी हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत समाचार पत्र

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