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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति – 301 वेदमंत्रों के उपदेश

(यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नमक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य
(अध्यक्ष ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे…..

इसके आगे यज्ञ में किन किन पदार्थों की आहुतियाँ देनी चाहिये, यह बतलाते हैं-

धानावन्तं करम्भिणमरूपयन्तमुक्थिनम् । इन्द्र प्रातुर्जुषस्व नः । (ऋग्वेद ३।५२०१)

अर्थात् हमारे धानवाले, दधिदूधवाले, मालपुएवाले और स्तोत्रवाले ढेरों को हे इन्द्र ! प्रातःकाल के समय सेवन कीजिए ।

पूषण्यते ते चकृमा करम्भं हरिवते हर्यश्वाय धानाः ।

अपूपमद्धि सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर बिद्वान् ।। (ऋ० ३।५२१७)

अर्थात् हे वृत्र के मारनेवाले विद्वान् शूर ! तेरी पोषण करनेवाली किरणों के लिए हमने जो दिया है, उस दूद्य, दधि, धान मालपुवा आदि को खा तथा मरुतों के साथ सोम को पी। इसके आगे हवन किए हुए पदार्थों के विषय में र्वद उपदेश करते हैं कि जो धन यज्ञ में लगाया जाता है, यही सुकृत होता है। क्योंकि –

न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति ।

देवांश्व याभिर्यजते ददाति च च्योगित्ताभिः सचते गोपतिः सह ।।
(ऋ०६/२८३)

अर्थात् जो देवों को दिया जाता है और जिससे यज्ञ किया जाता है, उसका न नाश होता है, न उसे चोर चुरा सकते हैं, न उसका कोई शत्रु होता है और न उस पर कोई आफत डाल सकता है। उसके द्वारा यजमान सदैव हो गोपति के साथ रहता है, अर्थात् वह धनवान बना रहता है। सत्य है, ऐसे सार्वजनिक पुण्यकार्य में घन खर्च करने से ही घन का सदुपयोग कहा जा सकता है। घन के सदुपयोग से अधिक धन की वृद्धि होती है, इसमें सन्देह नहीं। इस प्रकार से यज्ञों के द्वारा सार्वजनिक बीमारियों से रक्षा पाने की युक्ति बतलाकर अब प्राकृतिक उत्पातों से रक्षा प्राप्त करने का जो उपाय वेदों ने बतलाया है, उसका वर्णन करते हैं।

वैद्यक और यशों के द्वारा व्यक्तिगत व्याधि और समाजगत चेपी रोगों की रक्षा हो सकती है, परन्तु इनके द्वारा प्राकृतिक विश्वों से-भूकम्प, ज्वालाप्रपात, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, पाला, पत्थर और वज्रपात श्रादि से-रक्षा नहीं हो सकती। इन उत्पातों से रक्षा करनेवाला परमात्मा ही है। इसलिए ऐसे समयों में परमात्मा की प्रार्थना करने का ही वेद में उपदेश है। यहाँ हम ऐसी प्रार्थनाओं के कुछ नमूने लिखते हैं, जो इस प्रकार हैं-

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिग्धवः। माध्वीर्न:सन्स्वोषधीः ॥२७॥

मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पाविव रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥२८॥

मधुमात्रो वनस्पतिमंधुम २ अस्तु सूर्यः । माध्यीर्गावो भवन्तु नः ॥२६।। (यजुर्वेद १३१२७-२१)
अर्थात् हे परमात्मन् ! संसार में वायु मधुर होकर बहें, नदियाँ मधुर होकर बहें, औषधियाँ मधुर होकर उगें। रात मधुर हो, प्रभात मधुर हो, पृथिवी मधुर हो और हमारा द्यौ पिता मधुर हो। वनस्पतियाँ मधुर हों, सूर्य मंधुर हो और गौवें मधुर हो। इसके आगे फिर प्रार्थना है कि-

यतो यतः समीहसे ततो नो अभय कुरु ।
शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं न पशुभ्यः ।। (यजु० ३६।२२)

अर्थात् जहाँ जहाँ हमारे लिए जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो, वहाँ वहाँ हमें हर प्रकार से अभय करिये तथा प्रजा और पशुओं की ओर से भी हमें सुखी और अभय कीजिये ।

अभय न करस्यन्तरिक्षमभय द्यावापृथिवी उमे इमे ।

अभय पश्चादभय पुरस्तादुत्तरावधरावभय’ नो अस्तु ।।५।।

अभय मित्रादभयममित्रावभव ज्ञातादभय पुरो यः ।

अभय नक्तमभय दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु ।।६।

(अथर्व० १६।१५१५-६)

अर्थात हमें अन्तरिक्ष अभय करे, द्यावा तथा पृथिवी हमें अभय करें और नीचे ऊपर तथा आगे-पीछे से भी हमें अभय प्राप्त हो । मित्र से अभय हो, अमित्र से अभय हो। जाने हुए से अभय हो और अज्ञात से अभय हो। रात से अभय हो और दिन से अभय हो। अर्थात् हमारी समस्त आशाएँ वा दिशाएँ अभय हों।

क्रमशः

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