बहिष्कार तो नेहरू ने ही शुरू कर दिया था, नौवीं फेल तेजस्वी का बाप मंदिर नहीं गया

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सुभाष चन्द्र
दिसंबर में खबर आई थी कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट 22 जनवरी को होने वाले रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए देश के सभी राष्ट्रीय दलों के अध्यक्षों और पूर्व प्रधानमंत्रियों को आमंत्रित कर रहा है। सोनिया गांधी को न्यौता दिया गया था। इसके अलावा खड़गे, अधीर रंजन चौधरी, मनमोहन सिंह, राहुल गाँधी और देवेगौड़ा के अलावा अरविन्द केजरीवाल, मायावती एवं अखिलेश यादव का भी नाम था लिस्ट में। निमंत्रण गया लेकिन अस्वीकार करना इनके चुनावी हिन्दू होने का चेहरा भी सामने आ गया है।

राममंदिर पक्षकारों ने राममंदिर विरोधियों यानि विपक्ष को निमंत्रण देकर सांप और छछूंदर वाली स्थिति में ला दिया है। कोट पर जनेऊ डाल हिन्दू होने का स्वांग भी सामने आ गया। दूसरे हिन्दू क्षेत्रों में हाथ में कलावा बांधना और मुस्लिम क्षेत्रों में कलावा गायब कर दोगली सियासत करने वालों को देखना है कि कौन हिन्दू इनको वोट देता है। पाखंडी यानि चुनावी हिन्दू बनने का भी स्वांग जनता के सामने आ गया है।
इसके बाद अपने लेख में मैंने 21 दिसंबर को ही लिख दिया था कि कोई भी ‘सेकुलर’ नेता इस समारोह में नहीं जाएगा और एक महीने के समय में बहाने बना लिए जाएंगे। यही हुआ और सबसे पहले सीताराम राम येचुरी ने निमंत्रण ठुकरा कर सिलसिला शुरू किया।

लेखक
कांग्रेस की तरफ से सोनिया खड़गे अधीर रंजन सभी नेताओं ने कहते हैं निमंत्रण को ठोकर मारने से पहले मुस्लिम नेताओं से विचार विमर्श कर उन्हें टटोलने की कोशिश की थी जिसकी जिम्मेदारी सलमान खुर्शीद को दी गई थी। उसने रिपोर्ट दी कि यदि प्राण प्रतिष्ठा में गए तो मुस्लिम वोट बैंक हाथ से सरक सकता है। लिहाजा ठीकरा फोड़ दिया गया BJP/RSS पर, और जाने से मना कर दिया गया।
2014 के चुनाव में हार की समीक्षा करने वाली ए के अंटोनी समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि कांग्रेस की छवि हिन्दू विरोधी पार्टी की बनी जिसकी वजह से चुनाव हारे। लेकिन आज भी कांग्रेस अपने को सुधारने के मूड में नहीं है क्योंकि उसे केवल मुस्लिम वोट पर नियंत्रण चाहिए, हिन्दू तो उसकी चाल समझता ही नहीं और वोट देता रहेगा।

कांग्रेस ने किस विषय पर बहिष्कार नहीं किया, उसने द्रौपदी मुर्मू का अपमान किया, नई संसद का बहिष्कार किया, इतना ही नहीं प्रतिज्ञा भी कर ली कि सत्ता में लौटे तो पुरानी संसद फिर शुरू कर देंगे, सरदार पटेल की मूर्ति, कर्तव्य पथ पर बोस की मूर्ति और National War Memorial एवं Police Memorial का भी बहिष्कार किया।

यह बहिष्कार की प्रथा तो नेहरू ने शुरू की थी जब नवंबर 1947 में हुए सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए निमंत्रण को ठुकरा ही नहीं दिया, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को भी पत्र लिख कर जाने से मना किया लेकिन राजेंद्र प्रसाद फिर भी गए। नतीजा यह हुआ कि नेहरू ने उनसे संबंध इस हद तक बिगाड़ लिए कि उनकी मृत्यु पर न खुद गए और अपने अधिकारियों को भी जाने से रोका।

लेकिन Fact Checkers इस बात को झूठ बताते हैं कि 1955 में सऊदी अरब के राजा की बनारस यात्रा के दौरान नेहरू ने बनारस के सभी मंदिरों को तिरपालों से ढकने के आदेश दिए थे लेकिन जब नेहरू सोमनाथ का बहिष्कार कर सकते थे तो कोई बड़ी बात नहीं बनारस के मंदिर भी ढकवा दिए हों।

नौवीं फेल तेजस्वी कह रहा है कि बीमार पड़ोगे तो मंदिर जाएंगे या अस्पताल, मंदिर जाएंगे तो वहां तो दान मांग लेंगे। अरे निकम्मे निर्लज्ज, तेरे बाप ने भगवान राम से बैर मोल लिया था और नतीजा देख ले, क्या मिला, मंदिर नहीं गया लेकिन अस्पताल में ही पड़ा रहा जब जब गिरफ्तार होने की बारी आई और अपनी Kidney भी नहीं बचा सका।

अखिलेश यादव स्वामी प्रसाद मौर्य पर कुछ कंट्रोल नहीं कर सकता, मालूम था अखिलेश तो मंदिर में जाएगा ही नहीं और जाए कैसे, उसके बाप ने राम भक्तों के शव बिछा दिए, उसे राम से क्या काम हो सकता है और मौर्य आज भी कह रहा है कि मुलायम ने जो किया वह ठीक किया।

एक बार याद कर लो, सैफई में आवारागर्दी के जलसों पर अखिलेश राज में 2012 में खर्च हुआ था 195 करोड़, 2013 में 216 करोड़, 2014 में 256 करोड़, 2015 में 271 करोड़ और 2016 में हुआ 300 करोड़, और 2016 से आज तक अखिलेश द्वारा सैफई मेला नहीं किया गया और मायावती 1400 करोड़ हाथियों की मूर्तियां बनवाने में पेल दिए थे।

इंडिया फर्स्ट से साभार

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