*सूर्य, जो सरकता है*”

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लेखक आर्य सागर खारी🖋️

सूर्य 14 लाख किलोमीटर व्यास का हाइड्रोजन व हिलियम गैस का गोला है ।चार अरब से अधिक वर्षों से जल रहा है हमें जीवन देने के लिए। भारी इतना 3 लाख 30 हजार पृथ्वीयो में जितना भार है उतना एक अकेले सूर्य में होता है या यूं कहे 13 लाख पृथ्वी सूरज में समा जाएगी। ग्रह उपग्रहों से यह अपनी परिक्रमा कराता है लेकिन यह भी आकाशगंगा के केंद्र की या यूं कहें अपने से भारी तारा समूह की परिक्रमा करता है जिसका एक चक्कर लगाने में इसे 23 करोड़ साल लग जाते हैं। अपने जन्म से लेकर आज पर्यंत यह केवल अभी 20 चक्कर ही आकाशगंगा के लगा पाया है, 7 लाख 20 हजार किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार होने पर भी। अपने केंद्र पर यह लगभग 25 पृथ्वी दिनो में अपनी धुरी का एक चक्कर लगा लेता है वही पृथ्वी 24 घंटे लेती है। प्याज की परतों की तरह यह कई गैसीय सतहों से मिलकर बना है इसके गर्भ का तापमान जहां दो करोड़ डिग्री सेल्सियस होता है तो वहीं इसकी सबसे बाहरी सतह का तापमान 5500 डिग्री सेल्सियस रहता है लेकिन सबसे चौंकाने वाला खगोलीय रहस्य यह है इसकी सतह से अधिक इसके वायुमंडल का तापमान 20 लाख डिग्री सेल्सियस रहता है जो आज भी खगोल भौतिकी में अबूझ पहेली बना हुआ है। प्रत्येक उत्पन्न होने वाला पदार्थ चाहे तारा ही क्यों ना हो एक दिन नष्ट होता है तो ऐसे में यह अनोखा औसत आकार का तारा भी नष्ट होगा यह लाल दानव बन जाएगा इसका आकार लाखों गुना बढ़ जाएगा पृथ्वी सहित अनेको ग्रहों को यह निगल लगा इसके केंद्र का सारी हाइड्रोजन खत्म हो जाएगी। वह लाल दानव अरबों वर्ष इसी अवस्था में रहेगा फिर एक दिन वह सिकुड़ कर सफेद बोना तारा बन जाएगा ऐसा ही बोना तारा जो रात्रि आकाश में टिमटिमाते रहते हैं जिनमें अधिकांश को हम देखते भी हैं लेकिन इसके टिमटिमाने को हम नहीं देख पाएंगे हम देख पा रहे हैं तो इसकी युवा अवस्था इसकी तेजस्विता को। इसके केंद्र से प्रकाश पुंज जब इसकी बाहरी सतह तक पहुंचता है तो प्रकाश के प्रत्येक मूलभूत कण फोटोंन को 170000 वर्ष लग जाते हैं इसकी सबसे बाहरी सतह तक पहुंचने में जिसे प्रकाश मंडल फोटो स्पेयर कहते हैं और फिर उस प्रकाश पुंज को हम तक पहुंचने में 8 मिनट 15 सेकंड केवल लगते हैं यह सब कुछ कितना चौंकाने वाला हैरतअंगेज है। वैदिक वांग्मय में वैदिक साहित्य में सूर्य के अनेकों नाम का उल्लेख मिलता है प्रत्येक नाम का अलग ही वैज्ञानिक महत्व है सूर्य के अध्ययन को हेलिओ फिजिक्स कहते हैं भारत के ऋषियों पूर्ववर्ती आचार्यों ने सूर्य पर बेहद गहन अध्ययन किया था । निरुक्त व‌ शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रंथ इसका प्रमाण है। दुर्भाग्य है आज हमारा आज हमें अपने वैज्ञानिक तकनीकी संस्थानों में हिंदी शब्दावली के शब्द नहीं मिलते वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली शब्दकोश के अभाव का रोना रोया जाता है लेकिन ऋषियों ने अंतरिक्ष से लेकर समस्त लोक के अनेकों पदार्थों के वेद के आलोक में अनेक नाम रखें भिन्न गुण धर्मो के आधार पर।

पाणिनी के व्याकरण के अनुसार सृ गतौ, षू प्रेरणे धातु से यह शब्द बना है। सूर्य को सूर्य नाम इसी कारण मिला है क्योंकि यह अंतरिक्ष में सरकता है, मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है आखिर खुद भी यह प्रचंड पुरुषार्थी है ।
यह सूर्य ही लैटिन भाषा में जाकर सोल हो गया और अंग्रेजी में जाकर सन बन गया मूल शब्द सूर्य ही है।

नोट —इस लेख में वर्णित वैज्ञानिक तथ्य नासा की ऑफिशयल वेबसाइट से लिए गए हैं। सूर्य की आयु एक विवादस्पद विषय है फिजिक्स की कैलकुलेशन ऑब्जरवेशन के आधार पर इसकी आयु ज्ञात की गई है। वही वैदिक मान्यताओं ज्योतिष के आलोक में सृष्टि की उत्पत्ति को ही लगभग दो अरब वर्ष हुए हैं तो ऐसे में सूर्य की आयु 4 अरब वर्ष कैसे हो सकती है? यह गहन मीमांसा का विषय है ।

लेखक आर्य सागर

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