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आर्य समाज एक क्रांतिकारी संगठन ( कल ,आज और कल) स्वामी दयानंद जी के इतिहास ज्ञान के आदि स्त्रोत , भाग 1

स्वामी दयानंद जी महाराज के इतिहास संबंधी ज्ञान के आदि स्रोत के रूप में उनके 79 वर्षीय गुरु बिरजानंद जी, बिरजानंद जी के 129 वर्षीय गुरु पूर्णानंद जी और पूर्णानंद जी के 160 वर्षीय गुरु आत्मानंद जी थे। इन तीनों ही महान विभूतियों से स्वामी जी का साक्षात्कार हुआ था। बात को समझने के दृष्टिकोण से इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि स्वामी आत्मानंद जी महाराज के पास उस समय पिछले 160 वर्ष का जीता जागता अनुभव किया हुआ इतिहास संबंधी ज्ञान था। उनका जन्म सन 1697 में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान हुआ था। इस कालखंड में भारत की संस्कृति को मिटाने का बहुत ही खतरनाक प्रयास किया गया था। तब तक की सारी जानकारी उनके पास थी। आत्मानंद जी के भीतर देश को स्वाधीन कराने की गहरी वेदना थी। इसका अभिप्राय है कि वह मुगल काल के उन अनेक अत्याचारों से भी भली प्रकार परिचित थे जिनके कारण भारतीय संस्कृति को गहरे आघात झेलने पड़े थे।
इस प्रकार स्वामी दयानंद जी महाराज को किसी इतिहास की पुस्तक से इतिहास पढ़ने की आवश्यकता नहीं थी, बल्कि उन्हें इतिहास का सीधा सच्चा ज्ञान स्वामी आत्मानंद जी से मिला। जिन्होंने बताया कि मुगलों के शासनकाल के दौरान और उसके पश्चात अंग्रेजों के शासनकाल में हमारे साथ किस प्रकार के अत्याचार होते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं? इन विदेशी शक्तियों के शासनकाल में वैदिक संस्कृति का किस प्रकार विनाश करने का षड़यंत्र रचा गया है और रचा जा रहा है ? इन सब बातों पर उन्होंने एक प्रकार से स्वामी जी के हृदय में घटनाओं का सीधा प्रसारण / स्थापन किया। उन्हें बताया कि हमें किस प्रकार से मिटाया जा रहा है और इस मिटाने के षड़यंत्र भरे उद्देश्य का हम सबको किस प्रकार सामना करना है ?

इसी प्रकार स्वामी पूर्णानंद जी महाराज ने भी स्वामी दयानंद जी महाराज को इतिहास संबंधी ज्ञान उपलब्ध कराया। उन्होंने 1757 ई0 के पलासी के युद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध काम किया था। उसकी अनेक प्रकार की कही – अनकही, सुनी – अनसुनी दास्तानों को उन्होंने भी स्वामी दयानंद जी के हृदय में अक्षरश: स्थापित किया। इस प्रकार की अनेक घटनाओं से स्वामी दयानंद जी महाराज जब प्रेरित – उत्प्रेरित हुए होंगे तो निश्चय ही उनके भीतर खून खौल उठा होगा।
1982 में जब आर्य महासम्मेलन हुआ तो उस समय सत्यकेतु विद्यालंकार जी द्वारा इस बात पर शोध किया गया कि 1857 की क्रांति के समय स्वामी पूर्णानंद जी महाराज की अवस्था कितनी थी ? उन्होंने ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया कि 1757 ई0 के पलासी के युद्ध के समय स्वामी पूर्णानंद जी महाराज की अवस्था 29 वर्ष थी। स्पष्ट है कि 1857 की क्रांति के समय स्वामी पूर्णानंद जी महाराज की अवस्था 129 वर्ष थी। यद्यपि अन्यत्र इसे 110 वर्ष लिखा जाता रहा है। हमें इस तथ्य की जानकारी ‘सर्वखाप पंचायत का इतिहास’ नामक पुस्तक से प्राप्त होती है। यह पुस्तक श्री निहाल सिंह आर्य जी द्वारा बड़े शोध अनुसंधान के पश्चात लिखी गई थी।
विद्यालंकार जी के शोधपूर्ण परिश्रम के पश्चात हमें इस तथ्य को शुद्ध कर लेना चाहिए। पूर्णानंद जी महाराज के द्वारा भी 1757 की घटनाओं को और उसके पश्चात की अनेक दर्दभरी दास्तानों को स्वामी जी को मौखिक रूप से बताया समझाया गया। इसी प्रकार क्रांतिकारी स्वामी बिरजानंद जी महाराज के द्वारा भी स्वामी जी महाराज को जहां संस्कृत व्याकरण आदि का ज्ञान दिया गया वहीं उन्हें इतिहास के माध्यम से भी यह चिंतन प्रस्तुत किया गया कि जब तक विदेशी शक्ति के रूप में अंग्रेज हमारे शासक बने बैठे हैं तब तक हम वैदिक संस्कृति का उद्धार और उत्थान करने में सफल नहीं हो सकते।
इस प्रकार भारतीय संस्कृति के इन तीन महान शिल्पकारों की कुशल शिल्प कला के माध्यम से स्वामी जी का निर्माण हुआ था।
उन्हें मुगलों और अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे उन अत्याचारों की जानकारी हुई जिनसे आर्य जाति का पतन हुआ या पतन हो रहा था । उन्हें किसी इतिहास लेखक के पक्षपातपूर्ण विवरण को पढ़ने और उससे कोई पक्षपाती निर्णय लेने या जानकारी लेने के स्थान पर सीधे अपने गुरुओं के माध्यम से मिला यह ज्ञान उनके लिए बहुत अधिक उपयोगी रहा। इसी का परिणाम था कि स्वामी जी महाराज सीधे विदेशी सत्ता के विरुद्ध क्रांति करने पर उतर आए।
स्वामी बिरजानंद जी महाराज क्रांतिकारी विचारों के पुंज थे। अपने समय में उनका संपूर्ण भारतवर्ष में विशेष सम्मान था। हिंदू – मुस्लिम दोनों समुदायों के धर्म गुरुओं की दृष्टि में स्वामी बिरजानंद जी महाराज का विशेष आदर का भाव था।
1856 ईस्वी में मथुरा में एक विशेष पंचायत का आयोजन किया गया था। जिसकी अध्यक्षता के लिए स्वामी बिरजानंद जी महाराज को ही नियुक्त किया गया था। उनकी गौरवपूर्ण उपस्थिति में हिंदू – मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों ने देश को आजाद करने की योजना पर विचार किया था। सबने यह भी निर्णय लिया था कि हम सब आपस के मतभेदों को भुलाकर विदेशी सत्ता को भारत से मिटा देने के प्रति संकल्पित होकर काम करेंगे। स्वामी जी महाराज को उस पंचायत में भाग लेने के लिए एक पालकी में लाया गया था। दोनों वर्गों के लोगों द्वारा
उनका हृदय से स्वागत सत्कार किया गया था। लोगों ने स्वामी जी महाराज को सम्मानवश कुछ अशर्फियां भी भेंट की थीं। पंचायत में उपस्थित लोगों को मिरासी जी द्वारा बताया गया कि इन महात्मा सन्यासी का नाम स्वामी बिरजानंद है। वह अल्लाह ताला के मोहतकिद अर्थात भक्त हैं। इस कार्यक्रम के संबंध में एक पत्र प्राप्त होता है। जिसे निहाल सिंह आर्य जी द्वारा ‘सर्वखाप पंचायत का इतिहास’ नामक पुस्तक में उल्लेखित किया गया है। उस पत्र में लिखा है कि ‘सन् 1856 बमुताबिक सम्वत् 1913 को एक पंचायत मथुरा के तीर्थगाह पर पुनः अकिद हुई, उसमें हिन्दू, मुसलमान और दूसरे मजहब के लोगों ने शिरकत की थी। इस पंचायत में एक नाबीना हिन्दू दरवेश (स्वामी विरजानन्द) को पालकी में बिठाकर लाया गया था। उनके आने पर सब लोगों ने उनका अदब किया। जब उन्हें एक चौकी पर बैठाया गया, तब हिन्दू-मुसलमान फकीरों ने उनकी कदम बोसी (पैर धोना) की। इसके बाद हाजरीन पंचायत के लोगों ने उनका अदब किया। सबके अदब के बाद नानासाहब पेशवा, मौलवी अजीमुल्ला खान, रंगू बाबू और शहंशाह बहादुरशाह के शाहजादा इन सबने अदब में उन्हें कुछ अशर्फियाँ पेश कीं। इसके बाद एक हिन्दू और एक मुसलमान फकीर ने कहा कि हमारे उस्ताद साहिबान की जबान मुबारिक से जो तकरीर होगी, उसे तसल्ली के साथ सब साहिबान सुनें और वह इस मुल्क के लिए बहुत मुफीद (सार्थक ) साबित होगी और यह वली अल्लाह साधु बहुत जबानों/ भाषाओं का आलिम/जानकार हमारा मुल्क का बुजुर्ग है। खुदा की मेहरबानी से ऐसे बुजुर्ग हमें मिले, यह ख़ुदा का हम पर बड़ा अहसान है।’
इस उद्धरण से स्पष्ट है दंडी स्वामी बिरजानंद जी महाराज की राष्ट्रव्यापी ख्याति थी और लोग उनका स्वाभाविक रूप से सम्मान करते थे। यहां तक कि मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर भी उनकी विद्वत्ता को नमन करता था। यही कारण था कि उनकी उक्त सभा में मुगल बादशाह के शाहजादे भी सम्मिलित हुए थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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