Categories
आज का चिंतन

ओ३म् “प्रसिद्ध भजनोपदेशक पं. ओम्प्रकाश वर्मा जी का सम्पूर्ण ऋग्वेद कण्ठस्थ किए हुए एक सनातनी विद्वान विषयक महत्वपूर्ण संस्मरण”

===============
पं. ओम्प्रकाश वर्मा जी आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध भजनोपदेशक थे। विगत वर्ष उनका देहावसान हुआ है। उनकी धर्मपत्नी एवं परिवार के सदस्य हरयाणा के यमुनानगर में निवास करते हैं। वर्मा जी ने यमुनानगर के प्रसिद्ध विद्वान पं. इन्द्रजित् देव जी को अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण संस्मरण सुनाये व लिखाये थे। उन संस्मरणों को लेखबद्ध कर पं. इन्द्रजित् देव जी ने एक पुस्तक तैयार की जिसका प्रकाशन ‘‘रोचक व प्रेरक संस्मरण: वरिष्ठ भजनोपदेशक पं. ओम्प्रकाश वर्मा जी” नाम से मई, 2021 में आचार्य सेामदेव शास्त्री, स्वामी आत्मानन्द वैदिक गुरुकुल, मलारना चैड़, सवाई माधोपुर (राजस्थान) की ओर से किया गया है। पुस्तक में वर्मा जी के 35 संस्मरण हैं जो 120 पृष्ठों में पूर्ण हुए हैं। हमें अपने जीवन में देहरादून एवं दिल्ली आदि स्थानों पर वर्मा जी के भजनों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वर्मा जी का हमसे व हमारे परिवार के सदस्यों से स्नेह था। हम यहां पं.ओम्प्रकाश वर्मा जी की इसी पुस्तक से एक संस्मरण उद्धृत कर रहे हैं। संस्मरण व लेख का शीर्षक है ‘वेदार्थ दयानन्द ने सिखाये’। संस्मरण अविकल रूप से प्रस्तुत है।

यह सन् 1954 ई. की घटना है। महाराष्ट्र के नगर अम्बा जुगाई के आर्यसमाज का उत्सव था तथा इस में हैदराबाद आन्दोलन के नायक पण्डित नरेन्द्र जी भी पधारे थे। वे तब युवा थे। मैं भी तब युवा ही था।

कार्यक्रम में एक दिन पण्डित नरेन्द्र जी ने मुझे यह बताया कि यहां अम्बा जुगाई में एक ऐसे पण्डितजी रहते हैं जिन्हें पूर्ण ऋग्वेद कण्ठस्थ है तथा लोग उन्हें ऋग्वेदी पण्डित जी कहते हैं। यह वृत्त सुनकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई तथा मेरे मन में उन पण्डित जी के दर्शन करने की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हुई। जब मैंने अपनी इस अभिलाषा की चर्चा पूज्य पण्डित नरेन्द्र से कर दी तो उन्होंने भी ऋग्वेदी पण्डित जी के घर पर जाकर उनसे भेंट करने की सहमति प्रकट की। हम दोनों पण्डित जी के निवास का पता लेकर चल पड़ें।

जब हम उनके यहां पहुंचे, वे तब मसनद के सहारे एक पलंग पर बैठे थे। हमने उन्हें योग्य अभिवादन किया तथा उन्होंने हम दोनों को बैठने का संकेत किया तो हम दोनों उनके निकट बैठ गए व अपना परिचय दिया।

‘‘कैसे आए हैं?’’ उन्होंने पूछा।

‘‘आपके विषय में पण्डित नरेन्द्र जी ने बताया है कि ऋग्वेद आपको कण्ठाग्र है। यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई तो आपके दर्शन करने की इच्छा बलवती हो गई। इसलिए हम दोनों ही चले आए।”

‘‘अच्छी बात है। कोई सेवा हो तो बातइएगा।”

“हमें कैसे विश्वास हो कि आपको ऋग्वेद पूर्णतः कण्ठस्थ है?’’

‘‘अग्निमीडे पुरोहितं …… से लेकर समानी वः आकूतिः …… तक प्रकाशित यह ऋग्वेद संहिता पड़ी है। इसमें से कोई भी मन्त्र आप सुन सकते हैं। आप किसी भी मन्त्र का प्रथम शब्द बोलिए। मैं पूर्ण मन्त्र सुना दूंगा।” पं. जी ने ऋग्वेद हमारी ओर बढ़ाते हुए कहा।

मैंने बोला- ‘स्वस्ति …..’ तो उन्होंने ‘स्वस्ति पन्था मनु चरेन सूर्याचन्द्रमसाविव…’ वाला पूर्ण मन्त्र सुना दिया तथा बोले- ’’तुम आर्यसमाजियों को इस मन्त्र के सिवा ‘स्वस्ति’ शब्द से आरम्भ होने वाला अन्य कोई मन्त्र स्मरण ही नहीं है। इससे अधिक आर्यसमाजियों को आता ही क्या है?’’

हम खिसिया गए तथा कुछ समय तक मौन बैठे रहे।

थोड़े समय के पश्चात् मैंने कहा- ‘‘पण्डित जी! इस मन्त्र का अर्थ भी बता दीजिएगा।”

‘‘इसका अर्थ मुझे पता नहीं है, क्योंकि मेरे कुल में यह परम्परा थी कि ऋग्वेद पिता से पुत्र तक रटवाकर ही सुरक्षित रखा जाता था। मैंने इसी परम्परा का निर्वहन किया है। मेरा पुत्र है, पौत्र है तथा प्रपौत्र भी है। मेरे प्रपौत्र को ऋग्वेद छः मण्डल तक पूर्णतः स्मरण है। वह इस मन्त्र का अर्थ भी बता देगा। मेरा पुत्र 85 वर्षों का, पौत्र 50 वर्षों का तथा प्रपौत्र 16-17 वर्षों का है। प्रपौत्र ही नहीं, मेरे पुत्र व पौत्र भी इस मन्त्र का अर्थ सुनाकर आपकी इच्छा पूर्ण कर सकते हैं।”

‘‘परन्तु परिवार में आप तो सबसे बड़े हैं। आप मन्त्रार्थ क्यों नहीं जानते?”

‘‘मैंने जब ऋग्वेद रटा था, तब महर्षि दयानन्द नये-नये वेद प्रचार हेतु कार्यक्षेत्र में उतरे थे। तब हम हिन्दू वेदपाठियों को वेदार्थ करने की आवश्यकता ही नहीं थी। समाज में वेदकण्ठस्थ कर लेना ही बहुत पर्याप्त समझा जाता था, परन्तु ज्यों-ज्यों महर्षि दयानन्द के द्वारा वेदों का भाष्य व प्रचार बढ़ता गया, त्यों-त्यों आर्यसमाजी तथा अन्य वेदपाठियों को वेदार्थ भी स्मरण करने पर विवश होना पड़ा। वेदार्थ अब महर्षि दयानन्द के कारण आवश्यक हो गए हैं।”

‘‘यह ठीक है परन्तु महर्षि दयानन्द ने अपने साहित्य में आप जैसे वेद कण्ठाग्र करने वाले पण्डितों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है क्योंकि आप जैसों के कारण ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी वेद सुरक्षित रहे हैं तथा आज हम तक पहुंचे हैं।”

पण्डित जी प्रसन्न दिख रहे थे। वातावरण बहुत सहज व आत्मीय हो गया था। हम दोनों ने उन्हें योग्य अभिवादन करके विदा ली।

खेद है, मुझे उनका नाम अब स्मरण नहीं रहा। उनके पुत्र का नाम विश्वनाथ था, यह स्मरण है। (यहां पण्डित ओम्प्रकाश वर्मा जी का संस्मरण समाप्त होता है।)

हमें यह संस्मरण महत्वपूर्ण इस लिये लगा कि सनातनी विद्वानों में उन दिनों सम्पूर्ण ऋग्वेद को स्मरण किए हुए एक व्यक्ति विद्यमान था और उनके पुत्र व पौत्र आदि को भी परम्परा से इस वेद को स्मरण करने सहित इसके अर्थों का भी, ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य के आधार पर, ज्ञान था। हमें नहीं पता कि वर्तमान समय में सनातनी विद्वानों सहित आर्यसमाज के विद्वानों वा गुरुकुल के किसी ब्रह्मचारी को सम्पूर्ण ऋग्वेद स्मरण है या नहीं? सामवेद, यजुर्वेद तो आर्यसमाज के गुरुकुलों के अनेक ब्रह्मचारियों को स्मरण हैं, ऐसा हमने सुना व देखा है। स्थानीय गुरुकुल पौंधा-देहरादून में भी कुछ ब्रह्मचारियों को सामवेद एवं यजुर्वेद स्मरण रहे हैं। एक ब्रह्मचारी ने अथर्ववेद को भी स्मरण करने का संकल्प लिया था।

सृष्टि के आरम्भ में आदि चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को चारों वेद परमात्मा से प्राप्त हुए थे और उन्हें वह स्मरण हो गये थे। उन्होंने ईश्वर से प्राप्त एक-एक वेद वा उसके मन्त्रों को ब्रह्मा जी को सुनाया था। ब्रह्मा जी को भी चारों वेद वा उनके अर्थ स्मरण व ज्ञात थे। उसके बाद युग-युगान्तरों तक श्रुति परम्परा में लोग वेदों को कण्ठाग्र करते रहे। महाभारत व उसके बाद भी वेदों को सस्वर स्मरण करने की परम्परा चलती रही। वर्तमान समय में दक्षिण भारत के सनातनी विद्वानों में भी वेदों को स्मरण करने व उनका सस्वर पाठ करने की परम्परा के बारे में सुनने को मिलता है। वेदों की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने कितना तप व श्रम किया है यह तथ्य हमें आह्लादित करता है, इसे विचार कर हमें सुखद आश्चर्य होता है।

पं. ओम्प्रकाश वर्मा जी की पुस्तक रोचक व प्रेरक संस्मरण एक पठनीय ग्रन्थ है। इससे आर्यसमाज के अतीत की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं को जानने में सहायता मिलती है। पाठकों को इसका अध्ययन करना चाहिये, यह हमारी सम्मति है। हम पुस्तक के प्रकाशक आचार्य सोमदेव शास्त्री, सवाई-माधोपुर तथा इसके लेखक व सम्पादक पं. इन्द्रजित् देव जी का हृदय से धन्यवाद करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
Hitbet giriş
xbahis
xbahis
vaycasino
vaycasino
bettilt giriş
bettilt giriş
Hitbet giriş
millibahis
millibahis
betnano giriş
bahisfair giriş
betnano giriş
bahisfair giriş
bahisfair giriş
bahisfair giriş
betnano giriş