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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

सांसदों के निलंबन की कार्यवाही और ‘लोकतंत्र की हत्या ‘

फोटो साभार
संसद के शीतकालीन सत्र को विपक्ष ने विधिक कामों में अड़ंगा डालने की अपनी चिर परिचित शैली को समर्पित करते हुए संसद में सेंधमारी के प्रकरण को तिल का ताड़ बनाने में गंवाने का पूरा प्रबंध किया । सरकार ने भी इस बात को समझ लिया है। बस, इसी कारण 18 दिसंबर को संसद के इस सत्र से विपक्ष के कुल 78 सांसदों को निलंबित कर दिया गया। उसके बाद यह संख्या और बढ़ गई। जिससे विपक्ष के कुल 146 सांसदों को संसद से निलंबित कर दिया गया। संसद में सेंधमारी की घटना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। इस विषय पर संसद के पक्ष विपक्ष के सभी सदस्यों को मिलकर किसी अचूक रणनीति को तय करने की आवश्यकता थी। पर अभी हाल ही में 5 राज्यों की विधानसभाओं के संपन्न हुए चुनावों में जिस प्रकार कांग्रेस सहित सारे विपक्ष का लगभग सफाया हुआ है, उससे सहम गए विपक्ष को इस घटना ने कुछ शोर मचाने का मौका प्रदान कर दिया है । जिसे नकारात्मक दिशा देते हुए विपक्ष ने संसद की सुरक्षा को लेकर बनाई जाने वाली किसी रणनीति पर विचार न करते हुए इसे तिल का ताड़ बनाने का निर्णय ले लिया। यदि पक्ष और विपक्ष अपने वेतन और भत्ते बढ़ाने पर एकमत हो सकते हैं और उसके लिए फटाफट कानून बना सकते हैं तो अपनी सुरक्षा बढ़ाने पर एकमत क्यों नहीं हो सकते ?
लोकसभा में विपक्ष के कुल 33 सांसद बचे सत्र के लिए निलंबित किए गए तो राज्यसभा के 45 सांसदों को निलंबित कर दिया गया है। अब तक कुल 146 सांसदों को संसद के शेष सत्र के लिए निलंबित किया जा चुका है।
अब जितनी देर भी संसद का सत्र चलेगा, वह बेकार की राजनीति का शिकार होकर रह जाएगा। हम सड़कों पर , चौराहों पर ,टीवी चैनलों पर विपक्ष के सांसदों को या विपक्ष की पार्टियों के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं को यह कहते हुए सुनते रहेंगे कि सरकार की दादागिरी चल रही है या तानाशाही और अधिनायकवादी दृष्टिकोण अपनाने पर केंद्र की सरकार अडिग है । उधर सत्तारूढ़ पार्टी या उसके गठबंधन के लोग भी कहते रहेंगे कि विपक्ष को सरकार के कामों में बाधा डालने के अतिरिक्त कुछ और नहीं आता। इससे देश का कोई भला होने वाला नहीं है। देश के जनप्रतिनिधियों को एक दूसरे की टांग खींचने या तानाशाही दिखाने या एक दूसरे को कोसते रहने में समय नष्ट करने के लिए जनता अपना कीमती वोट देकर चुनकर नहीं भेजती। जनता की इच्छा होती है कि देश की संसद में बैठकर सकारात्मक सोच के साथ पक्ष और विपक्ष चिंतन करें और राष्ट्रहित में जो भी उचित हो उस पर एकमत होकर निर्णय लें । लोकतंत्र विपक्ष को आलोचना का विशेष अधिकार प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त उसे सरकार के लिए नकेल के रूप में अपना काम करने की खुली छूट भी देता है। इसके उपरांत भी इस छूट का अर्थ यह नहीं है कि देश की संसद पर प्रतिदिन होने वाले करोड़ों रुपए के खर्च को विपक्ष केवल शोर शराबे की भेंट चढ़ा दे। विपक्ष के कुछ सांसदों ने राज्यसभा के सभापति और देश की उपराष्ट्रपति जब दीप धनखड़ का मजाक उड़ाया है वह निश्चय ही एक अशोभनीय घटना है। इस घटना से राहुल गांधी की छवि भी धूमिल हुई है।
निलंबन की कार्रवाई को हमारे लोकसभाध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के द्वारा मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। इसकी नियमावली है और नियमावली से अध्यक्ष सभापति और सांसद सभी बंधे हुए होते हैं। आवश्यकता उन नियमों को कठोरता से लागू करने की होती है। यदि नियमों को कठोरता से लागू कर दिया जाता है तो निश्चित रूप से जिस पक्ष पर ऐसे नियमों को कड़ाई से लागू किया जाता है, वह लागू करने वाले को तानाशाह होने का प्रमाण पत्र तो दे ही देता है। वर्तमान समय में जिस प्रकार संसद की कार्यवाहियों को शोर शराबे की भेंट चढ़ाया जा रहा है उसके दृष्टिगत अब कठोरता का प्रदर्शन समय की आवश्यकता है। देश इस बात को बहुत अधिक देर तक सहन नहीं कर सकता कि देश के लिए काम करने वाले लोग संसद में बैठकर शोर शराबा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लें । देश विधाई कार्यों को करने से आगे बढ़ता है। यदि कानूनी कामों को सरकार कर नहीं पाती है या सरकार को करने नहीं दिया जाता है तो पूरे देश की व्यवस्था गड़बड़ा सकती है। जिसके लिए अब किसी को भी स्वीकृति नहीं दी जा सकती।
संविधान में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि संसद के व्यवहार किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं।
स्पष्ट है कि यदि 92 सांसदों को निलंबित कर दिया गया है तो ये 92 सांसद या उनके राजनीतिक दल लोकसभाध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के इस निर्णय के विरुद्ध किसी न्यायालय के दरवाजे को नहीं खटखटा सकते। इसके चलते सांसदों के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि उन्हें संसद की नियमावली का पालन करना ही होगा। कार्यवाही में वह अपना आचरण वैसा ही संतुलित और मर्यादित रखने के लिए बाध्य हैं जैसा नियम उनके लिए अनिवार्य घोषित करते हैं। यदि इसके उपरांत भी सांसद अपने व्यवहार को असंतुलित दिखाते हैं या दिखाने का प्रयास करते हैं तो लोकतंत्र की हत्या करने के लिए कोई अध्यक्ष या सभापति जिम्मेदार नहीं माना जा सकता बल्कि ऐसा करने वाले प्रत्येक सांसद को ही इसके लिए जिम्मेदार माना जाएगा।
हम पक्ष और विपक्ष दोनों से ही कहना चाहेंगे कि देश की जनता ने यदि सरकार को देश चलाने का जनादेश दिया है तो इसका अभिप्राय है कि 5 वर्ष तक उसे विपक्ष को झेलना ही होगा साथ ही यदि देश की जनता ने विपक्ष के भी कुछ सांसदों को बैठने का अवसर देश के पंचायत घर के लिए दिया है तो सरकार को भी उन्हें झेलना और समझना पड़ेगा। इसलिए दोनों को ही जिम्मेदारी पूर्ण आचरण करना पड़ेगा। किसी को भी अपनी सीमाओं को लांघने की अनुमति नहीं दी जा सकती । जहां तक वर्तमान प्रकरण का संबंध है तो इस समय निश्चित रूप से विपक्ष का आचरण गैर जिम्मेदारी भरा है।
गैर जिम्मेदारी के इस आचरण से लोकसभा के 2024 के चुनावों की वैतरणी पार नहीं की जा सकती। देश की जनता गंभीर आचरण की अपेक्षा रखती है। इस समय देश के लिए अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार से जवाब तलब किया जा सकता है या सरकार को घेरा जा सकता है। केवल एक मुद्दे को लेकर सारे सत्र को उसकी भेंट चढ़ा देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।
संसद की नियमावली को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन सदस्यों के निलंबन किया जा सकता है जो सदन में जानबूझकर व्यवधान डालते हैं, नारे लगाते हैं, तख्तियां दिखाते हैं, आसन के करीब आते हैं, अमर्यादित आचरण करते हैं। सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाने वाले विपक्षी दल और उनके नेता क्या यह बता सकते हैं कि जब नियमावली इस प्रकार की है तो विपक्षी दलों के सांसदों की निलंबन की कार्यवाही में सरकार की तानाशाही कहां है ? उन सदस्यों को नियमानुसार निलंबित किया ही जाएगा जो नियमों का पालन नहीं करते। संसदीय अनुशासन की अवमानना करते हैं। उनके व्यवहार और कृत्य से संवैधानिक परंपराओं को ठेस पहुंचती है। संसदीय परंपराएं प्रभावित होती हैं। जब सब कुछ पारदर्शी है तो फिर उसे पारदर्शी को पारदर्शी बनाए रखना पक्ष विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है विपक्ष पारदर्शिता को भांग करें नियमों को तोड़े और फिर सरकार पर तानाशाही दिखाने का आरोप लगाए ऐसा आचरण भी लोकतंत्र की हत्या के समान ही माना जाना चाहिए।
राजनीतिक दल या तो स्वयं सुधरें नहीं तो जनता उनको सुधार देगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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