ओ३म् “आर्यसमाज की ईश्वरीय ज्ञान वेदों के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख मान्यतायें”

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हमारा यह संसार किससे बना और कौन इसे संचालित कर रहा है, इसका उत्तर खोजते हुए हम इसके कर्ता व पालक ईश्वर तक पहुंचते हैं। सौभाग्य से हमें सृष्टि के आदि में उत्पन्न व प्रचारित चार वेद आज भी अपने मूल स्वरूप तथा शुद्ध अर्थों सहित प्राप्त व विदित हैं। इन वेदों का अध्ययन कर ऋषि दयानन्द और अनेक अन्य विद्वानों ने वेदों के संबंध में अपने निष्कर्ष निकाले हैं। सारा संसार वेदों को विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ स्वीकार करता है। ऋषि दयानन्द वेदों के मर्मज्ञ थे। उन्होंने भी वेदों पर गहन खोज की तो पाया कि वेद सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों को ईश्वर से प्राप्त ज्ञान के ग्रन्थ हैं। सृष्टि को परमात्मा ही बनाता है। सृष्टि को बनाने वाली सत्ता परमात्मा व उस परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता दृश्यमान जड़ व चेतन जगत का रचयिता नहीं है। यदि परमात्मा से इतर कोई सत्ता होती तो उसका प्रत्यक्ष या अनुमान अवश्य होता। परमात्मा का प्रत्यक्ष व अनुमान दोनों होता है। ऋषि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश को पढ़ व समझ कर इसकी पुष्टि होती है कि हमारा यह संसार वा ब्रह्माण्ड एक सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अनादि, नित्य सत्ता व शक्ति परमात्मा से ही बना है व संचालित हो रहा है।

वेद सृष्टि को परमात्मा से उत्पन्न बताते हैं। हमारे ऋषियों ने अपने वेदज्ञान के आधार पर सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ी सभी शंकाओंका भी समाधान किया है। उनके अनुसार संसार में कुल तीन अनादि पदार्थ हैं। इनके नाम हैं ईश्वर, जीव और प्रकृति। यह तीनों अनादि तथा नित्य सत्तायें हैं। इनकी कभी किसी निमित्त या उपादान कारण से उत्पत्ति नहीं हुई है। अभाव से भाव की उत्पत्ति नहीं हुआ करती। यदि यह कभी उत्पन्न हुए होते तो इनके पूर्व किसी व किन्हीं अन्य अनादि पदार्थों को मानना पड़ता। वास्तविकता यही है कि अनादि काल से ही यह तीन पदार्थ विद्यमान हैं। इन्हीं से सृष्टि की रचना व पालन होता है। ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकर, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक सत्ता है। जीव एक चेतन सत्ता है जो अणु परिमाण वाली है। यह अत्यन्त सूक्ष्म है। विचार व चिन्तन करने सहित वेद व दर्शन के प्रमाणों के अनुसार इस जीवात्मा का ईश्वर से व्याप्य होना ज्ञात होता है। संसार में अनादि, नित्य, अमर व अविनाशी जीवों की संख्या अनन्त है। इनकी गणना नहीं की जा सकती परन्तु ईश्वर के ज्ञान में यह गण्य हैं। ईश्वर को प्रत्येक जीवात्मा का ज्ञान है तथा इसके अतिरिक्त वह सभी जीवों के अतीत के पूरे इतिहास व कर्मों सहित उनकी जन्म व मृत्यु आदि का भी पूरा-पूरा यथार्थ ज्ञान रखते हैं।

हम जिस सृष्टि को देखते हैं इसके सभी पदार्थ प्रकृतिरूपी उपादान कारण में परमात्मा द्वारा विकार उत्पन्न कर बनाये गये हैं। सृष्टि उत्पत्ति के आरम्भ में प्रकृति से महत्तत्व बुद्धि, इससे अहंकार, पांच तन्मात्रायें, दश इन्द्रिया, मन, पृथिव्यादि पांच भूत आदि बनते हैं। यह विकार व सृष्टि परमात्मा द्वारा अपनी सर्वज्ञता व सर्वशक्तिमतता से की जाती है। सृष्टि के बनने के बाद वनस्पति जगत और इसके बाद प्राणी जगत की सृष्टि होती है। सृष्टि की रचना के क्रम में अन्तिम उत्पत्ति मनुष्यों की होती है। परमात्मा मनुष्यों व अन्य सभी प्राणियों को अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न करते हैं। अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों को अपने जीवन को चलाने के लिये भाषा व ज्ञान की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति व प्राप्ति भी परमात्मा द्वारा ही कराई जाती है। परमात्मा इन उत्पन्न मनुष्यों में से चार श्रेष्ठ ऋषि आत्माओं अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान उनकी आत्मा में अपने जीवस्थ स्वरूप से प्रेरणा देकर कराते हैं। यह चार ऋषि ब्रह्मा जी नाम के ऋषि को वेदों का ज्ञान देते हैं और इन्हीं से माता, पिता व आचार्य की भांति सृष्टि के शेष स्त्री व पुरुषों को वेदों का ज्ञान कराया जाता है जिससे सभी आदि मानव व उनकी सन्ततियां वेदज्ञान से युक्त होकर पंच-महायज्ञों व अपने जीवन के अन्य सभी कर्तव्यों का पालन करते हैं जैसा कि हमें वेद व ऋषियों के उपनिषद, दर्शन तथा मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में पढ़ने को मिलता है।

सृष्टि की आदि में परमात्मा से उत्पन्न यह वेदज्ञान ही पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के समय तक अपने शुद्धस्वरूप में विद्यमान था। हमारे सभी ऋषि-मुनि समाज में वेदों का प्रचार करते थे। वेदों से इतर किसी मनुष्य व आचार्य द्वारा वर्तमान की तरह का कोई मत व सम्प्रदाय नहीं था। महाभारत युद्ध के बाद देश में ज्ञान व विज्ञान का पतन हुआ। वेदों का अध्ययन व अध्यापन न होने से समाज में अविद्या उत्पन्न हुई जिसका परिणाम देश व समाज में अन्धविश्वासों तथा कुरीतियों का उत्पन्न होना हुआ। यह अज्ञान व पतन उत्तरोतर बढ़ता ही गया। देश विदेशी आक्रान्ताओं का दास बन गया। अंग्रेजों की दासता के समय 12 फरवरी, सन् 1825 को ऋषि दयानन्द जी का जन्म हुआ था। उन्होंने ईश्वर की प्रेरणा से बोध को प्राप्त होकर धर्म के वास्तविक रूप की खोज की जिसमें वह सफल हुए। उन्हें अपने विद्यागुरु प्रज्ञाचक्षु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से वेदांगों का अध्ययन कर वेदों के सत्यस्वरूप का ज्ञान प्राप्त हुआ। स्वामी दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा तथा अपनी भावनाओं के अनुरूप देश देशान्तर में वेदों के सत्यस्वरूप का प्रचार किया। वेद का सत्यस्वरूप अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्डों तथा मिथ्या कुरीतियों व परम्पराओं से सर्वथा मुक्त है। अन्धविश्वासों व कुरीतियों से मनुष्य को अन्यान्य हानियां होती हैं। अतः मनुष्यों में ज्ञान व विज्ञान की उन्नति तथा उनके समस्त दुःखों का निवारण करने के लिये ऋषि दयानन्द ने वेदों का प्रचार करते हुए अज्ञान से युक्त अन्धविश्वासों, पाखण्डों तथा कुरीतियों का खण्डन किया। सबको वेदाध्ययन करने का अधिकार दिया व प्रेरणा की। उनके समय में स्त्री व शूद्रों को वेदों का अध्ययन व मन्त्रों का उच्चारण करने का अधिकार नहीं था। ऋषि दयानन्द ने सबको वेदाध्ययन व वेद मन्त्रों का पाठ करते हुए सन्ध्या व यज्ञ करने का अधिकार भी दिया है जिससे मनुष्य की आत्मिक उन्नति होकर उसे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष प्राप्त होते हैं। मनुष्य जीवन में यही चार पदार्थ धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्राप्तव्य होते हैं। यदि इन्हें प्राप्त नहीं किया तो हमारा मनुष्य जीवन असफल वा अधूरा रहता है।

वेद विषयक ऋषि दयानन्द की तर्क एवं युक्ति सहित ज्ञान व विज्ञान से पूर्ण प्रामाणिक मान्यता है कि चार वेद संहितायें सृष्टि की आदि में ईश्वर से चार ऋषियों को प्राप्त सब सत्य विद्याओं का ज्ञान हैं जिससे मनुष्य मात्र का पूर्ण कल्याण व हित होता है। वेदों का अध्ययन करना तथा उसी के अनुसार जीवन व्यतीत करना सभी मनुष्यों का परम धर्म व परम कर्तव्य है। सभी मनुष्यों को वेदों के सत्यस्वरूप को जानकर वेदों को दूसरों को पढ़ाना तथा सुनाना भी चाहिये। अपने से बड़े विद्वानों से वेदों के सत्य अर्थों को सुनना भी चाहिये। वेदों के प्रचार के लिये ही ऋषि दयानन्द ने 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज नामी संगठन की स्थापना की थी। आर्यसमाज के दस नियम हैं। यह सभी नियम वेद की सत्य मान्यताओं का प्रचार करने तथा देश व समाज को दुःखों से दूर कर सुखी बनाने के लिये ही बनाये गये हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति भी आर्यसमाज के नियमों के पालन से होती है। वेदों के आधार पर आर्यसमाज सब मनुष्यों के लिये पंच-महायज्ञ करने का विधान, समर्थन और प्रचार करता है। आर्यसमाज के सभी सदस्य व अनुयायी भी पंचमहायज्ञों को नित्यप्रति करते हैं। इन यज्ञों को करने से मनुष्यों की सर्वांगीण उन्नति होती है।

वेदों के प्रचार से समाज से अविद्या का निवारण व नाश होता है। हम जितना वेदों से दूर होते हैं उतना ही अविद्या से ग्रस्त होते जाते हैं। अतः वेदों का प्रतिदिन स्वाध्याय तथा वेदों पर वैदिक विद्वानों के विचार सुनने हेतु आर्यसमाज में जाना लाभप्रद होता है। आजकल नैट आदि पर भी अनेक विद्वानों के व्याख्यान तथा भजन आदि सुलभ होते हैं। यह भी मनुष्य की नास्तिकता को दूर कर उसे आध्यात्मिक जीवन का मार्ग बताते हैं। इनका भी लाभ उठाया जा सकता। वेदों से लाभ प्राप्त करने का प्रमुख उपाय है कि हम प्रतिदिन एक से दो घण्टा सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का अध्ययन करें और इसको पूरा करने के बाद ऋषि दयानन्द और आर्य विद्वानों के वेदभाष्य का भी अध्ययन, स्वाध्याय, चिन्तन व मनन करें। ऐसा करके हमारी अविद्या दूर होने के साथ हमारे आचरण व व्यवहार में भी गुणात्मक परिवर्तन आयेगा और हम स्वस्थ व सुखी होने सहित धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होकर अपने जीवन को सफल कर सकते हैं। आर्यसमाज की वेदों के सम्बन्ध में प्रमुख मान्यता यही है कि वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होने से सर्वथा सत्य व मनुष्यों के सुख के प्रमुख साधन हैं। वेद सम्पूर्ण ज्ञान हैं। वेद स्वतः प्रमाण हैं तथा अन्य ग्रन्थ वेदानुकूल होने पर ही परतः प्रमाण की कोटि में आते हैं। वेदों के ज्ञान व आचरण से ही मनुष्य का जीवन सफल हो सकता है तथा जन्म व परजन्म में उन्नति हो सकती है। अतः हमें मत-मतान्तरों के साम्प्रदायिक ग्रन्थों को छोड़ कर वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन कर वैदिक जीवन अपनाकर अपने जीवन के लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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