Categories
आज का चिंतन

ओ३म् “ईश्वर, वेद, महर्षि दयानन्द और मूर्तिपूजा”

==========
ईश्वर, जीव और प्रकृति तीन अनादि तत्व हैं। ईश्वर अजन्मा, कभी जन्म व मरण को प्राप्त न होने वाला, और जीव जन्म-मरण के बन्धनों में बंधा हुआ है। जीवात्मा के जन्म व मरण का कारण कर्मों का बन्धन है। जीव में इच्छा, राग, द्वेष, सुख व दुःख, इन्द्रियो व अन्तःकरण के अनेक प्रकार के विकार होते हैं। इनसे प्रेरित होकर मनुष्य पुण्य व पाप अथवा शुभ व अशुभ कर्मों को करता है और उन कर्मों के बन्धनों फंसता है। उदाहरण के लिये हम कह सकते हैं कि हमने पुरुषार्थ कर धन अर्जित किया। धन अर्जित करने के लिये ही हम पुरुषार्थ करते हैं। धनोपार्जन के कुछ अन्य उद्देश्य दान व परोपकार भी होते हैं जिनसे हमारी इच्छायें व भावनायें जुड़ी होती हैं। यदि हमने शुभ कर्मों से धनोपार्जन किया है तो इसका फल सुख और यदि अशुभ कर्म किये हैं तो ईश्वर की व्यवस्था से इसका फल दुःख प्राप्त होता है।

सुख भी एक बन्धन है और दुःख भी एक बन्धन है। हमें अशुभ कर्म नहीं करने चाहिये जिससे ईश्वर की व्यवस्था से हमें दुःख प्राप्त हों। यदि हम सद्कर्म करते हैं और उनसे मिलने वाले फलों की इच्छा रखते हैं तो यह भी हमारे जन्म व मृत्यु का कारण होते हैं। इसके लिये हमें मुमुक्षु बनना होगा। सद्कर्मों का उद्देश्य सुख प्राप्ति न होकर हमें उन कर्मों को परमार्थ से जोड़कर ईश्वर को समर्पित करना होगा। हम संन्ध्या करते हैं और समर्पण मन्त्र में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे दया के भण्डार ईश्वर! आपकी कृपा से हम जो अनेक प्रकार से आपके नाम व गायत्री मंत्र का जप व उपासना आदि कर्म करते हैं उससे हमें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति शीघ्र प्राप्त हो। जप व उपासना आदि कर्मों में भौतिक पदार्थों की प्राप्ति की इच्छा से किये जाने वाले शुभ कर्म भी सम्मिलित हैं। समर्पण मन्त्र में मनुष्य केवल मोक्ष की इच्छा परमात्मा से नहीं कर रहा है अपितु वह धर्म, अर्थ व काम की इच्छा व आंकाक्षा भी कर रहा है। धर्म ईश्वर व माता-पिता-आचार्यों सहित देश व समाज के प्रति वेद-विहित कर्तव्यों के पालन को कहते हैं। हम इन कार्यों को करते रहें, यह प्रार्थना ईश्वर से की गई है। ‘अर्थ’ में सभी प्रकार के साधन सम्मिलित कर सकते हैं। धन भी अनेक कार्यों की पूर्ति का साधन होता है। धन से हम भोजन, वस्त्र, शिक्षा, निवास, वाहन, घर में आवश्यक साजो-समान आदि को प्राप्त करते हैं। अतः हम अर्थ व सुखादि के साधनों की भी प्रार्थना परमात्मा से करते हैं। ‘काम’ का अर्थ हमारी मानसिक इच्छायें होती हैं। हम चाहते हैं कि हमारा परिवार स्वस्थ एवं सद्मार्गानुगामी हो। हम सब सुखी, सम्पन्न, स्वतन्त्र, श्रेष्ठ कर्मों को करने वाले हों। इस प्रकार की प्रार्थना भी हम समर्पण मन्त्र में परमात्मा से करते हैं। समर्पण मन्त्र में मोक्ष की प्रार्थना भी की गई है। मोक्ष में वह कर्म आते हैं जिसमें मुख्यतः जप व उपासना तथा अग्निहोत्र यज्ञादि को सम्मिलित मान सकते हैं। यदि हम इन कर्मों का सेवन नहीं करेंगे तो मोक्ष की प्राप्ति असम्भव है। दर्शनों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि मोक्ष के लिये समाधि को सिद्ध करना आवश्यक है। यदि हम समाधि अवस्था को प्राप्त नहीं होते तथा हमें ईश्वर का साक्षात्कार नहीं होता, तो हमें मोक्ष मिलना कठिन व असम्भव होता है। मोक्ष ही मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। मोक्ष को प्राप्त होकर हमें 31 नील, 10 खरब तथा 40 अरब वर्षों के लिये जन्म व मरण से अवकाश वा छुट्टी मिल जाती है और इस अवधि में हम ईश्वर के सान्निध्य में रहकर ईश्वरीय आनन्द का भोग करते हैं। अतः जीवात्मा का लक्ष्य मनुष्य जीवन में सुखों की प्राप्ति सहित मोक्ष को प्राप्त करना है जिसका आधार ईश्वरोपासना, धर्म, यज्ञ-अग्निहोत्र, सद्कर्म व समाधि अवस्था की प्राप्ति होती है।

ईश्वरोपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र, सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग आदि मनुष्यों के प्रमुख कर्तव्य है। इसका कारण यह है कि ईश्वर के हमारे ऊपर सबसे अधिक ऋण है। ईश्वर ने हमारे लिये यह सृष्टि बनाई है, इसके सभी पदार्थ हमें निःशुल्क दिये हैं तथा सृष्टि के आरम्भ में हमारे पूर्वजों को वेदों का ज्ञान दिया जिससे हमें अपने कर्तव्यों व अकर्तव्यों का बोध होता है। ईश्वर की कृपा से ही हमारे जन्म-मरण व कर्मानुसार सुख-दुःख आदि की व्यवस्था होती है। वही हमें माता-पिता, आचार्य, बन्धु-भगिनी, मित्र व हितैषी जनों को उपलब्ध कराता है। परमात्मा ने ही हमें अन्न, जल, वस्त्रों तथा निवास आदि की सामग्री इस सृष्टि में बनाकर उपलब्ध करा रखी है, अतः ईश्वर के इन ऋणों से उऋण होने के लिये हमें ईश्वर की उपासना वा भक्ति करना कर्तव्य है। अग्निहोत्र भी वायु व जल आदि सहित मन, बुद्धि, चित्त व जीवात्मा की शुद्धि व पवित्रता के लिये किया जाता है। हमारे ही कारण वायु एवं जल आदि से निर्मित पर्यावरण प्रदूषित होता है। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम पर्यावरण की शुद्धि व पवित्रता के लिये कार्य करें। यही कार्य अग्निहोत्र के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इसे करने से हम रोगादि से उत्पन्न दुःखों से भी बचते हैं। यह यज्ञ का अतिरिक्त लाभ होता है। यज्ञ करने से यज्ञकर्ता को सुख मिलता है। इसका कारण यह है कि यज्ञ करने से मित्र व शत्रुओं सहित प्राणी मात्र को लाभ व सुख पहुंचता है जिससे हमें हमारे परमार्थ के लिए किए गये कार्यों से सुखों की प्राप्ति होती है। इन कर्मों को करके हम ईश्वर, प्रकृति वा पर्यावरण के ऋणों से उऋण होते हैं और हमें हमें सुखों की प्राप्ति होती है। जो लोग ईश्वरोपासना तथा अग्निहोत्र यज्ञ को वैदिक विधिपूर्वक करते हैं वह अत्यन्त सौभाग्यशाली प्रतीत होते हैं। उनका वर्तमान एवं भविष्य का जीवन सुरक्षित रहता है। ईश्वर भक्ति व अग्निहोत्र-यज्ञ न करने वाले व्यक्तियों को जन्म-जन्मान्तर में वह लाभ प्राप्त नहीं होते जो इन प्रमुख कर्तव्यों के पालन करने वालों को होते हैं। इसीलिये वैदिक धर्म व संस्कृति संसार के सभी अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों से श्रेष्ठ है क्योंकि इसी वैदिक धर्म में ही मनुष्य के इन कर्तव्यों को करने का विधान है।

वेदों में ईश्वर की उपासना को योग की विधि से करने का विधान है परन्तु इसके विकल्प के रूप में जड़ मूर्तिपूजा का विधान कहीं नहीं हैं। ऋषि दयानन्द और उनके बाद के आर्य विद्वानों ने वेदों का अध्ययन, अनुसंधान व परीक्षा की है परन्तु वेद के किसी मन्त्र व मन्त्रों की सूक्तियों में मूर्तिपूजा का विधान दृष्टिगोचर नहीं हुआ। इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर प्रदत्त ज्ञान की पुस्तक वेदों में मूर्तिपूजा विहित नहीं है। इसके साथ ही विचार, चिन्तन, तर्क तथा युक्तियों के आधार पर भी मूर्तिपूजा का करना वेदसम्मत वा वेदानुकूल सिद्ध नहीं होता। ऋषि दयानन्द जी ने वेदों के आधार पर ईश्वर की उपासना के लिये सन्ध्या एवं अग्निहोत्र सहित आर्याभिविनय आदि अनेक पुस्तकें लिखी हैं। सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थों में भी ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना आदि पर प्रकाश डाला है। इससे उपासना व भक्ति का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। इसके अनुकूल स्तुति, प्रार्थना, उपासना, आचरण व व्यवहार करने से ईश्वर की भक्ति हो जाती है और इसके विपरीत जड़-मूर्तिपूजा करने से ईश्वर की आज्ञा भंग होती है जिसका परिणाम दुःख व पराधीनता आदि होता है। इसी कारण से हम महाभारत के बाद गुलाम हुए और हमने अपमान, अन्याय व अत्याचार आदि अनेकानेक दुःखों को सहा है। इन सब दुःखों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिये ऋषि दयानन्द को मूर्तिपूजा का सत्यस्वरूप प्रस्तुत करना पड़ा। इसी कारण उन्हें मूर्तिपूजा से होने वाली हानियों से समाज को जागृत व सावधान करना पड़ा और साथ ही प्राचीन काल में ऋषियों की पद्धति से उपासना का विधान कर उपासना की विधि की पुस्तक उन्होंने हमें प्रदान की है। हम अनुभव करते हैं कि हम जितना ऋषि दयानन्द के ईश्वर और वेद के अनुकूल विचारों का आचरण करेंगे, उतना ही हम सुख और कल्याण को प्राप्त होंगे और वेदविरुद्ध आचरण करने से हम दुःखों, पराधीनता, विधर्मियों के द्वारा अपमान और वैदिक धर्म एवं संस्कृति के पतन का कारण बनेंगे। आश्चर्य एवं दुःख है कि महर्षि दयानन्द के सावधान करने पर भी हिन्दू समाज ने न तो उनके विचारों को अपनाया ही है और न ही इतिहास से कोई शिक्षा ली है।

महर्षि दयानन्द महाभारत के बाद विगत पांच हजार वर्षों में वेदों के सर्वोच्च विद्वान थे। उन्होंने डिण्डिम घोषणा की थी कि जड़-मूर्तिपूजा वेद विरुद्ध है। इसके साथ ही उन्होंने पौराणिक सनातनी विद्वानों को मूर्तिपूजा के पक्ष में वेदों से प्रमाण दिखाने के लिये कहा था। दिनांक 16 नवम्बर सन् 1869 को काशी वा वाराणसी के ‘आनन्द बाग’ में पंचास हजार लोगों की उपस्थिति तथा काशी नरेश श्री ईश्वरी नारायण सिंह की अध्यक्षता में मूर्तिपूजा को वेदानुकूल सिद्ध करने के लिये शास्त्रार्थ हुआ था। स्वामी दयानन्द जी अकेले थे और विपक्षियों में वेदों को प्रमण मानने वाले तीस से अधिक मूर्तिपूजा के समर्थक विद्वान थे। इस शास्त्रार्थ की शब्दशः कथा काशी शास्त्रार्थ नाम से उपलब्ध है। ऋषि दयानन्द के पं0 लेखराम एवं पं0 देवेन्द्रनाथ मुखोध्याय रचित जीवन चरितों में इस शास्त्रार्थ का विस्तार से उल्लेख है और उस समय के विद्वानों व प्रमुख लोगों की सम्मतियां भी इन ग्रन्थों में है। शास्त्रार्थ में पौराणिक पण्डित वेदों से मूर्तिपूजा का समर्थक कोई प्रमाण नहीं दे सके थे। उन्होंने विषय को बदलने का प्रयास किया था और बीच में ही हुड़दंग मचा दिया था। इस प्रकार से शास्त्रार्थ समाप्त हो गया था और कहा गया था काशी के पण्डितों की विजय हुई है। इस प्रकार पौराणिक बन्धुओं ने छल एवं अपने संख्या बल का प्रभाव दिखाया परन्तु आज तक भी वह मूर्तिपूजा को वेदों के प्रमाणों से सिद्ध नहीं कर सकें और न ही मूर्तिपूजा से होने वाली उन हानियों का खण्डन कर सके जो स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में प्रकाशित की हैं। 16 नवम्बर, 2023 को ऋषि दयानन्द के मूर्तिपूजा पर काशी शास्त्रार्थ के एक सौ चव्वन वर्ष पूरे हो गये हैं। आर्यसमाज के विद्वानों को मूर्तिपूजा दूर करने तथा वेद व योग दर्शन के अनुसार ईश्वर की उपासना को समाज वा विश्व में प्रवृत्त करने के लिए अपने सुझाव देने चाहियें। ऋषि दयानन्द जी हमें वेद व योगदर्श के अनुकूल उपासना पद्धति की पुस्तक ‘‘सन्ध्या” दे गये हैं। दैनिक अग्निहोत्र में भी उपासना का उल्लेखनीय अंश सम्मिलित होता है। वेद एवं ऋषियों की मान्यता के अनुसार दैनिक यज्ञ वा अग्निहोत्र भी प्रत्येक गृहस्थ मनुष्य को प्रतिदिन करना चाहिये। सन्ध्या एवं दैनिक अग्निहोत्र सहित वैदिक साहित्य का दैनन्दिन स्वाध्याय ही मूर्तिपूजा के वेदसम्मत विकल्प हैं। आर्यसमाज को वेदप्रचार के कार्य को गति देनी होगी। वेद प्रचार से ही अविद्या दूर होकर वेदविरुद्ध कर्मकाण्ड को नियंत्रित कर वेदानुकूल कर्तव्यों का आचरण करने में सफलता प्राप्त की जा सकती है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet
bettilt giriş
bettilt giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
Hitbet giriş
xbahis
xbahis