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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति-296 (चतुर्थ खण्ड – वेदाे की शिक्षा) समाज और साम्राज्य की रक्षा (वेद मंत्र)

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं )

प्रस्तुति: देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’ )

गतांक से आगे..

इससे आगे संसार की दोनों ताकते – सर्दी और गर्मी – इस प्रकार बतलाई हैं-
अप्सु मे सौमो अब्रवीदन्तविश्वानि भेषजा ।
अग्नि च विश्वशम्भुवम् ।। (ऋ० १०१६ ६)
अर्थात् मुझसे सोम ने कहा कि पानी में सब औषधियाँ हैं और अग्नि सबको आरोग्य देता है । इस मन्त्र में बतलाया गया है कि अग्नि और जल ही अर्थात् सर्दी और गर्मी ही दो दवाएँ हैं । इसीलिए शतपथ ब्राह्मण मैं लिखा है कि- ‘अग्नियोमावेवाभिसम्बभूव सव्र्व विद्याः सव्र्व यशः सव्र्वमन्नाद्य सव्र्वश्रीम्’ अर्थात् संसार में अग्नि और सोम (जल) दो ही पदार्थ हैं, इन्हीं से सब वैद्यविद्या, यश, धन और शोभा प्राप्त होती है। इसीलिए वेद में सर्दी की दवा गर्मी और गर्मी की दवा सर्दी बतलाई गई है। वेद में लिखा है कि-

कः स्विदेकाको चरति क उ स्विजायते पुनः ।
कि स्विद्धिमस्य भेषजं किम्वावपनं महत्॥९॥
सूर्य एकाको चरति चन्द्रमा जायते पुनः ।
अग्निहिमस्य भेषजं भूनिरावपनं महत् ॥१०॥ (यजु० २३०२-१० )

अर्थात् कौन अकेला चलता है ? कौन बार बार पैदा होता है ? सर्दी की दवा क्या है और बीज बोने का सबसे बड़ा स्थान क्या है ? सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा बार बार पैदा होता है अग्नि (गर्मी) सर्दी की दवा है है और पृथिवी हो बीज बोने का सबसे बड़ा स्थान है।
इस मन्त्र में सर्दी की दवा गर्मी बतलाई गई है, परन्तु अर्थापत्ति से यह बतला दिया गया है कि गर्मी की दवा सर्दी है। इसके आगे समस्त शरीर के भीतरी बाहरी अंगों का वर्णन इस प्रकार किया गया है-

केन पार्णी आभृते पूरूषस्य केन मांसं संमृतं केन गुल्फी ।
केनाङ्गुली: पेशनी: केन खानि केनोच्छलकौ मध्यतः कः प्रतिष्ठाम् ॥१॥
कस्मान्न गुल्फायधराव कृण्वन्नष्ठीवन्तावुत्तगौ पुरुषस्य ।
जड़घे निऋर्त्य न्यदधुःक्वस्वज्जानुनोः सन्धी क उ तचिकेत ।। २ ।।
चतुष्टयं युज्यते संहितान्तं जानुभ्यामूर्ध्व शिथिरं कबन्धम् ।
श्रीणी यवूरू क उ तरजज्जान यांभ्या कुसिन्धं सुद्दढं बभूव ।। ३ ।।
कति देवाः कतमेन्त आसन् य उरो ग्रीवाश्रिक्युः पूयस्य ।
कति स्तनों व्यदधुःकः कफोडौ कति स्कन्धान्कति पृष्टीरचिन्वन् ।। ४।।
को अस्य बाहू समभरद् वीर्य करवादिति ।
अंसौ को अस्य तद्देवः कुसिन्धे अभ्या दधौ ॥ ५ ॥
कः सप्त खानि विततर्द शीर्षणि कर्णाविमो नासिके चक्षणी मुखम् ।
येषां पुरुत्रा विजयस्य महानि चतुष्पादो द्विपदो यन्ति यामम् । ६ ।। हन्वोर्हि जिह्वामदधात् पुरूचीमधा महीमधि शिधाय वाचम् ।
स आ वरीवर्ति भुवनेश्वस्तरपो वसानः क उ तच्चिकेत।। ७ ।।
मस्तिष्कमस्य यतमो ललाटं ककाटिकां प्रथमो यः कपालम् ।
चित्वा चित्यं हन्वो: पुरुषस्य दिवं रूरोह कतमः स देवः ।। ८ ।। ( अथर्व०१०/२/१ -८)
अर्थात् किसने पैर को दोनों एड़ियों में मांस भर कर पुष्ट किया ? किसने मांस जोड़ा ? किसने दोनों टखने जौड़े, किसने उंगलियों के जोड़ों को जोड़ा, किसने नख और किसने पाँव के दोनों तलवों को जोड़ा है ? किसने पैर के नीचे के दोनों टखने, ऊपर के दोनों घुटने, दोनों टाँगे और दोनों घुटनों के भीतर दोनों जोघौ को जोड़ा है? और किसने दोनों कूल्हों और जाँघौ को चार प्रकार से सटी हुई नोको के ऊपर इस ढीले घड़ को जोड़ा है ? किस ने मनुष्य की छाती और गले को मिलाया किसने दोनों स्तनों को बनाया और किसने दोनों गालों,कन्धों और पसलियों को एकत्र किया ? किसने इन वीरकर्म करनेवाले भुजाओं को पुष्ट किया है और कन्धों के साथ मिलाया है? किसने शिर में दो आखें, दो कान, दो नासाछिद्र और एक मुख को बनाकर सात गोलकों में जोड़ा, जिसके सहारे द्विपद और चतुष्पाद प्राणी अपना अपना कार्यनिर्वाह करते हैं ? किसने दोनों जबड़ों के बीच में बहुतसी बोलनेवाली जिव्हा को जोड़ा है ? किसने इसके मस्तिष्क, ललाट, शिर के पिछले भाग और कपाल को दोनों जबड़ों के साथ मिलाया है ? यहाँ तक इन मन्त्रों में मनुष्य के पैर से लेकर शिरपर्यंत समस्त आवश्यक अंगों का वर्णन है। इसी प्रकार का शारीरिक वर्णन वेद के ओर भी कई स्थलों में आया है, जिससे प्रतीत होता है कि वेद में शरीर के अवयवों का वर्णन है । इसीलिए सुश्रुत शारीरस्थान ५।१८ में लिखा है कि ‘त्रोणि सषष्टीन्यस्थिशतानि वेदवादिनो भाषन्ते’ अर्थात् वैदिक लोग शरीर की हड्डियों की संख्या तीन सौ साठ बतलाते हैं। इससे प्रकट होता है कि वेद में शरीर का पूरा वर्णन है । क्योंकि शरीर के अन्तर्भाग हो में तो वैदिक लोग जीव और ब्रह्म को भी ढूंढ निकालते थे।

क्रमशः

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