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कविता

ऋषि का सर्वोच्च बलिदान

लेखक – स्वामी भीष्म जी महाराज घरोंडा वाले

जो जगाने आए थे वो तो जगा कर चल दिए,
लुप्त वेदों का खजाना था बता कर चल दिये ।

जब चले गुजरात से कितना भंयकर वक्त था ।
जैनी, बोद्ध, ईसाई, मुस्लिम का सामना सख्त था ।
था परतन्त्र देश भारत ताज था ना तख्त था।
सब पै इकले ने आक्रमण कर दिया एक लख्त था।
कर में वेदों की पताका को उठा कर चल दिए ।

दे गए सबको कसौटी सत्यासत्य की हाथ में ।
है सत्यार्थ वेद की कुँजी ये रखना साथ में ।।
पर पाखण्डी पापियों की क्या बताऊँ बात मैं।
दुष्ट पापी स्वार्थी मिलकर लगे थे घात में।।
दिव्य दीपक बन दया ज्योति जगा कर चल दिए ।

सत्य की ले शतघनी वो इकला दुनिया से लड़ा ।
वेद के मंत्रों का गोला दुर्ग पाखण्ड पर पड़ा ।।
उल्लुओं ने आँख मींची वेद मानू जब चढ़ा ।
पादरी गिरजे में रोवे, मुल्ला मस्जिद मे खड़ा ।।
शेर को लख श्यार सारे दुम दबा कर चल दिए ।

मान जाते बात स्वामी की तो होती हानि क्यो ।
नीलकण्ठ बनते इसाई और मुस्लमान क्यों ।।
ऋषियों की भूमि में गऊएं होती यू कुर्बान क्यों ।
माता का सिर काट कर के बनता पापिस्थान क्यों ।।
विष को खाकर चल दिए कोई गोली खाकर चल दिए।

लुटने पीटने पर न अब तक होश आया आपने ।
पूज कर इन पत्थरों को फल क्या पाया आपने ।।
मुर्ति तोड़ी गई सब कुछ लुटाया आपने ।
फिर पुजारी जी ये क्यों घण्टा बजाया आपने ।।
देवता बैठे रहे तुम घर लुटा कर चल दिए ।

छान मारा दुनियां ने भूमि और आकाश है।
पर पौराणिक दल बना फिर रूढ़ियों का दास है ।।
स्वर्ग है आकाश में ये पोप का विश्वास है ।
सागर में है विष्णु लक्ष्मी भी पास है ।।
तीर्थो पर घूमने बिस्तर उठा कर चल दिए ।

भूगोल और खगोल विद्या जानते ।
आप गर वेद पथ से भ्रष्ट हो हमसे ना झगड़े ठानते ।।
स्वर्ग सुख और नर्क दुख है आप गर पहचानते ।
भ्रम भुत भग जाता गर बाते हमारी मानते ।।
ताली बजा कर चल दिए गर्दन हिला कर चल दिए ।

आप गर सुख चाहे तो सुन लो इधर को ध्यान कर ।
सत्यार्थ की कस कसौटी सत्या सत्य पहचान कर ।।
सबसे पहला काम है ये अखण्ड हिन्दुस्तान कर ।
वरना क्यों दुख पा रहे और हम दिए परेशान कर ।।
आप सुन कर चल दिए “भीष्म” सुना कर चल दिए।

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