सम्बद्धता क्या है? : किसी मान्यता, सिद्धांत, वस्तु व्यक्ति आदि के प्रति सहज रूप में बिना किसी बाहरी दबाव के आपका जुड़ जाना उसके प्रति आपकी सम्बद्धता है। ऐसी मानसिकता के वशीभूत होकर आप पूर्ण मनोयोग और प्राणपण से कार्य करने के लिए तो सक्रिय रहेंगे ही साथ ही उस मान्यता, सिद्धांत, वस्तु, व्यक्ति आदि के प्रति आपकी श्रद्धा आपके भीतर सत्यनिष्ठा को बलवती करेगी और आप द्विगुणित उत्साह से ऊर्जान्वित होकर, पूर्ण समर्पण के साथ कार्य करने के लिए भी स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से प्रेरित भी होते रहेंगे । यह स्वतः स्फूर्त प्रेरणा आपको अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित कर देगी जिसे लोग कभी-कभी जुनून कहा करते हैं और अंत में यह जुनून ही आपको सफलता दिलायेगा।

एक विद्यार्थी बड़े सहज भाव से नियमतः प्रतिदिन 8-10 घंटे पढ़ता है और आईएएस की परीक्षा में सफल होता है। उसका यह सहज भाव से अपने लक्ष्य के प्रति जुड़ जाना और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नियमतः 8-10 घंटे प्रतिदिन पढ़ना उसका एक संस्कार है। यह संस्कार उस विद्यार्थी को अपने लक्ष्य से सम्बद्ध करता है। घनिष्ठता से जोड़ देता है। एक प्रभुभक्त इसी समय को अपने इष्ट की उपासना में व्यतीत करता है, उसे एक दिन अपने इष्ट से साक्षात्कार हो जाता है, इसलिए प्रभुभक्ति उस प्रभुभक्त का एक संस्कार है। एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में जाकर इतना ही समय नियमतः प्रतिदिन देता है और संसार के कल्याण के लिए नये-नये आविष्कार करता है। जो उसकी महामेधा का प्रतीक है। उसका महामेधावी होना एक संस्कार है। जबकि इसी समय को एक लेखक नियमित प्रतिदिन अध्ययन और लेखन में देता है जिससे संसार को नया चिंतन मिलता है, नई सोच और नई दिशा मिलती है। उसका चिंतनशील स्वभाव उसका अपना एक संस्कार है। इसी प्रकार एक व्यक्ति घर गृहस्थ की साधना में लगा हुआ है, एक शरीर की साधना में लगा हुआ है। एक धन की साधना में लगा हुआ है। सबको मनोवांछित फलांे की प्राप्ति हो रही है।

निश्चित रूप से ऐसा तभी संभव है जब व्यक्ति भीतर से सहज भाव से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो जाता है। उससे सम्बद्ध हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सम्बद्धता में सतत किंतु शांत संघर्ष है, सतत उन्नति का मार्ग साधक को दीखता और सूझता है। इसमें पग-पग पर निर्माण होता दीखता है। इसमें निर्माण की दीवार ज्यों-ज्यांे ऊंची होती जाती है, त्यों-त्यांे व्यक्ति के भीतर के दोषांे का शमन होता चला जाता है और समस्याआंे का सहज समाधान खोजता चला जाता है। ऐसे लोगांे पर ईश्वर की कृपा तो रहती ही है साथ ही उसे अपने संगी साथी भी इस प्रकार के मिलते हैं, जो कि उसकी समस्याओं के निदान में उसके सहायक बनते हैं।

प्रतिबद्धता क्या है? ः प्रतिबद्धता में व्यक्ति किसी बाहरी दबाव के कारण किसी मान्यता, सिद्धांत, वस्तु, व्यक्ति आदि के साथ जुड़ता है। बाहरी दबाव के हटते ही वह वहां से हट जाता है या उससे दूरी बना लेता है। एक विद्यार्थी माता-पिता अथवा शिक्षक के डर से विद्याध्ययन करता है, उनके हटते ही या तो सो जाता है या किताब को दूर फेंककर टीवी आदि देखने लगता है, या खेलने में व्यस्त हो जाता है। एक व्यक्ति, पूजा-पाठ इसलिए करता है कि उसे उसके पिता ने उस पूजा-पाठ को सिखाया और अब वह पूजा पाठ उसकी जीविकोपार्जन का साधन बन गयी है। यदि वह अब उसे छोड़ता है तो उसका जीवन चलना असंभव हो जायेगा इसलिए विवशतावश उसे वह कार्य करते रहना है। कोई व्यक्ति किसी संगठन से पिता द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा जोड़ दिया जाता है, पर वह मन से नहीं जुड़ता, समय मिलते ही वह उस संगठन को छोड़ देता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रतिबद्धता में बाहरी दबाव है, कोई विवशता है, बाध्यता है, इसमें भ्रांति है, लक्ष्य के प्रति समर्पण नहीं है, चित्त की चंचलता है, निश्चलता नहीं है। दिखावा है-छलावा है, सच्चाई नहीं है। इसमें सत्यनिष्ठा नहीं है, स्वार्थपरता है। हर चीज को स्वार्थपूर्ति के लिए प्रयोग करने की भावना है।

ऐसे व्यक्ति किसी के साथ तब तक चलते हैं जब तक कि अपने स्वार्थों की पूर्ति होती है। स्वार्थों की पूर्ति होते ही वह अपना स्थान परिवर्तन कर लेते हैं, निष्ठा बदल देते हैं या व्यक्ति का साथ छोड़ देते हैं। प्रतिबद्धता में निर्माण नहीं परिवर्तन करने की एक प्रक्रिया है जिसमें कुछ नया नहीं बनता, अपितु बने बनाये को मिटाया जाता है। इसलिए प्रतिबद्धता संस्कार से नहीं अपितु प्रतिकार से जन्मती है।

एक व्यक्ति अपने भाई का जन्म भर साथ देता है और भाई के दोषों को सहज रूप में भूलता जाता है जबकि एक व्यक्ति अपने भाई के साथ अपने स्वार्थ की पूर्ति तक साथ चलता है। स्वार्थ पूर्ण होते ही अपना हाथ झटक लेता है, अपने ही भाई के प्रति शिकायतांे का ढेर अपने भीतर एकत्रा किये रखता है। यह क्या है? यह ऐसे भाई का प्रतिकारी स्वरूप है, बने बनाये भवन को गिरा देता है, दिलांे में दीवार खड़ी कर देता है, निर्माण को विध्वंस में परिवर्तित कर देता है।

जब मंथरा कैकेयी को प्रतिकार से भर देती है तो राजा दशरथ का सारा बना बनाया खेल बिगड़ जाता है। श्रीराम वन को चले जाते हैं, दशरथ प्राण त्याग देते हैं। यह कैकेयी के अपने वचनांे के प्रति प्रतिबद्ध होने के कारण हुआ। वह रघुकुल की परंपरा के प्रति सहज सम्बद्ध नहीं हो पायी। परंतु हम क्या देखते हैं कि उसी रानी कैकेयी का पुत्रा भरत अपने कुल की गौरवमयी परंपरा के प्रति गहन निष्ठा से भरा हुआ था। इसलिए उसने कह दिया कि बड़े भाई के रहते हुए अनाधिकार चेष्टा नहीं करूंगा। जिस पर जिसका अधिकार है, उसे छल बल से प्राप्त करने का पाप कभी नहीं करूंगा।

फलस्वरूप प्रतिकार से भरी रानी कैकेयी के संस्कारवान पुत्रा भरत ने साम्राज्य को लेने से इंकार कर दिया। अतः संस्कार की प्रबलता से इतिहास में एक शानदार उदाहरण का नाम भरत हो गया।

प्रतिकार की प्रबलता के प्रवाह में बहती रानी कैकेयी जिस सृजना को मिटाने पर उतारू हो गयी थी, उसे उसी के पुत्रा भरत ने निर्माण की इतनी Åंचाई प्रदान कर दी कि उसे आज तक कोई लांघ नहीं पाया है।

दूसरा उदाहरण महाभारत का लें। राजा शांतनु मल्लाह की बेटी सत्यवती पर आसक्त हो गये। कामबाण से घायल राजा ने सत्यवती के पिता से उसकी पुत्राी का हाथ मांग लिया। जिसे सत्यवती के पिता ने देने से इंकार कर दिया। राष्ट्र में ये संस्कार प्रबल था कि राजा भी किसी की बेटी को बिना उसके अभिभावक की सहमति के अपनी पत्नी नहीं बना सकता था। आज के शांतनु और सत्यवती तो बालिग होने का प्रमाणपत्रा प्रस्तुत करते हैं और विवाह में बंध जाते हैं। परंतु उस समय के शांतनु का साहस ये नहीं हुआ कि वह राष्ट्र के प्रबल संस्कार का सामना कर सके। फलस्वरूप वह उदास रहने लगे। उनकी उदासीनता को बेटे देवव्रत ने समझा और सत्यवती के पिता से अपने जीवन को दांव पर रखकर अपनी सारी कामनाआंे और महत्वाकांक्षाआंे को दांव पर लगाकर राष्ट्र के संस्कार की रक्षा की और पिता के विवाह में स्वयं सहायक हो गया। सत्ता और शक्ति के मद में देवव्रत ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिससे राष्ट्र के संस्कार का हनन हो। ऐसी भीषण प्रतिज्ञा का जीवन भर निर्वाह करने वाला देव व्रत भीष्म बन गया और आज भी वह राष्ट्र के लिए ‘पितामह’ भीष्म बना हुआ है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे देश में प्राचीन काल में संस्कारांे का कितना महत्व था। संस्कार कर्तव्य और अधिकार दोनांे का अदभुत संगम है, जो इन दोनों को धर्म की शरणागति में ले जाता है और राष्ट्र में धर्म का शासन स्थापित कराने में सहायक सिद्ध होता है। प्रतिबद्धता अप संस्कृति का निर्माण कराती है, जिससे संसार में दानवता का विकास होता है। जबकि सम्बद्धता संसार में संस्कारित मानव समाज का निर्माण कराती है, जिससे मानवता का विकास होता है। संसार में मजहब व्यक्ति को मता ग्रही बनाता है। इसलिए व्यक्ति उसके प्रति सम्बद्ध नहीं अपितु प्रतिबद्ध होता है, जबकि धर्म व्यक्ति को मानवतावादी बनाता है। इसलिए किसी मजहब से प्रेरित होकर भी उसके प्रति मताग्रही नहीं होते अपितु वह मानवता के प्रति समर्पित होते हैं। बस, संस्कार और प्रतिकार में यही अंतर है।

बच्चांे को कैसे बनायंे संस्कारित ः माता-पिता के लिए बच्चांे को संस्कारित बनाना उनका बहुत बड़ा दायित्व है। प्रत्येक बच्चा मां के गर्भ से ही पूर्व जन्मांे के संस्कारांे को लेकर आता है। जिसे हम प्रारब्ध कहते हैं। इसके उपरांत भी वह माता-पिता और गुरQ से भी बहुत कुछ सीखता है जिसे वह आजीवन स्मरण रखता है। इसलिए माता-पिता और गुरQ को बच्चे का प्राकृतिक मित्रा भी कहा जा सकता है। माता-पिता और गुरQ के संसर्ग और संपर्क से बच्चे पर संस्कारांे का प्रभाव पड़ता है। इसलिए माता-पिता और गुरQ को बच्चे के लिए ‘देवता’ बताया गया है।

मां को गर्भकाल में हमारे )षि लोग कुछ विशेष निर्देश दिये करते थे जैसे- धर्मचिंतन करो, ईश करो, प्रकृति के निकट रहो, घर में महापुरQषों के चित्रा रखो। ये निर्देश इसलिए दिये जाते थे कि आने वाले बच्चे का जीवन उज्ज्वल और महान बने। प्रत्येक मां राष्ट्रमाता है, क्यांेकि प्रत्येक मां की कोख में आने वाले कल का राष्ट्र विकसित होता है। इसलिए राष्ट्र के प्रति सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व माता का ही बनता है।

अपने इसी उत्तरदायित्व को समझते हुए मां गर्भकाल में अपने शिशु के प्रति समर्पित हो जाती है। वह आत्मिक रूप से अपने बच्चे के साथ जुड़ जाती है, सम्बद्ध हो जाती है। मां के प्रेम का यह संस्कार एक नया सृजन करता है और वह राष्ट्र को एक अच्छा नागरिक देती है।

आत्मिक रूप से गर्भकाल में ही मां और बच्चे के जुड़ जाने का परिणाम ये होता है कि जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो वह मां के लिए अजनवी नहीं होता। मां को ऐसा लगता है कि जैसे पहले से ही इससे जान और पहचान है। यही स्थिति बच्चे की होती है। किराये की कोख से जन्म देने वाली मां की आने वाले किसी बच्चे के प्रति यह मानसिकता नहीं होती। इस प्रकार हम देखते हैं कि मां की ममता भी बच्चे में एक संस्कार का निर्माण करती है। बच्चे के लिए मां की ममता एक संस्कार बन जाती है, जो उसे अन्य लोगांे से प्रेम करना सिखाती है।

प्रेम के विभिन्न स्वरूप हैं, मां के कदम में ये ममता है, पिता के हृदय में यह वात्सल्य है, भाई बहन के हृदय में यह एक दूसरे के लिए स्नेह है, गुरQ शिष्य के मध्य यह श्रद्धा है, भक्त और भगवान के मध्य यह भक्ति है इत्यादि। कहीं यह कर्तव्य है, कहीं यह त्याग है, कहीं यह सेवा है, कहीं यह परोपकार है। क्यांेकि कर्तव्य की पूर्ति भी व्यक्ति तभी करता है जब जिस व्यक्ति के प्रति वह कर्तव्य निर्वाह कर रहा है, उसके प्रति हृदय में प्रेम हो।

इसी प्रकार त्याग सेवा और परोपकार के बारे में विचार करना चाहिए। त्याग सेवा और परोपकार किसी अजनवी के प्रति भी किये जाते हैं, तब यह प्रेम की भावना मानवता के रूप में प्रस्फूटित होती है।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मां के गर्भ में डाला गया संस्कार जीवन भर हमारे लिए कितना काम आता है। मनोविज्ञानी )षियांे के इस मनोविज्ञान पर यदि चिंतन किया जाये तो स्पष्ट होता है कि एक जन्म लेेने वाले बच्चे को हम उसके गर्भकाल में ही कितना कुछ सिखा देते हैं। इसलिए मां का गर्भ कोई जेल नहीं है, अपितु आने वाले के लिए निश्चित रूप से एक सुधारगृह है, सुधारगृह को जेल कहना उसका और मातृ शक्ति का अपमान करना है। जो बातें हमें कभी किसी ने नहीं बतायी है। परंतु हमारी आस्था उनके प्रति फिर भी है तो हमें मानना चाहिए कि ऐसी बातें कई बार हमारी माता ने सुधारगृह में हमारे निर्माण के समय बता दी थीं। इसके उपरांत भी बच्चांे का निर्माण करना आज की बड़ी समस्या है। इसके कई कारण हैं। कामकाजी और नौकरी पेशे वाली महिलाएं गर्भकाल में बच्चे का निर्माण करने के अपने दायित्व को कार्य के दबाव में पूर्ण रूपेण नहीं निभा पातीं। इसके अतिरिक्त टीवी से वासनात्मक लगाव और तनावपूर्ण जीवन शैली जैसे इसके कई कारण हैं। शिक्षित महिला होना एक अलग बात है, जबकि एक जवाबदेह संस्कारित मां होना एक अलग बात है। आज आवश्कता एक जवाबदेह संस्कारित मां बनने की है। यह राष्ट्र की पुकार है। बच्चों के निर्माण के समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि आपका बच्चा पड़ोसी के बच्चे से अलग है। उसकी परिस्थिति और आपके बच्चे की परिस्थिति अलग-अलग है। उसका परिवेश, खान-पान, मानसिकता, माता-पिता आदि सब कुछ अलग-अलग हैं। इसलिए कभी भी अपने बच्चांे की तुलना पड़ोसी के बच्चे से नहीं करो कि अमुक का बच्चा ऐसा है, तू तो ऐसा है वैसा है? अगले अंक में ः हम व्यवहार में देखते हैं कि एक व्यक्ति कहता है कि मैंने बच्चांे को सदा मारपीट कर ठीक रखा और उसका परिणाम ये आया कि आज ये बिल्कुल ठीक है। जबकि दूसरा व्यक्ति कहता हे कि बच्चांे को मारना पीटना नहीं चाहिए अन्यथा वह बिगड़ जायेंगे।

हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम राष्ट्र की नींव के निर्माता है। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया कहीं बाहर से नहीं अपितु हमारे और केवल हमारे घर से प्रारंभ होती है। इस बात को प्रत्येक गृहस्थी को ध्यान में रखना चाहिए। लोग कहते हैं कि ये तो सबकी इच्छा है कि आज पुनः सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की आवश्यकता है परंतु ये किसी अन्य के घर में होने चाहिए। हमारा मानना है कि हम सब ये सोचें कि हर घर में सुभाष भगत सिंह और आजाद पैदा हो जाये ताकि शोषण, अत्याचार और दमन का कहीं नामोनिशान ही न रहे। अब भी हम सुभाष आदि का निर्माण शहीद होने के लिए ही क्यांे करना चाहते हैं? अब तो हम आजाद हैं। इसलिए अब तो उनके लिए कामना करनी चाहिए कि वह भी आजादी का Qलोपभोग करें। इस प्रकार के सुभाष, भगत सिंह और आजाद का निर्माण हम प्रभुभक्त और राष्ट्रभक्त दिव्य संतति का निर्माण करके कर सकते हैं। राष्ट्र में संस्कारांे की दिव्यता की आवश्यकता है और यदि इस दिव्यता को Qैलाने के लिए हर घर में सुभाष, भगत सिंह और आजाद पैदा हो जांये तो राष्ट्र दिव्यता से आलोकित हो उठे। आप सबके ऐसे सुभाष, भगत सिंह और आजाद चिरंजीवी हो, प्रभु से यही प्रार्थना है।

राजनीतिक प्रतिबद्धताएं और संस्कार ः राजनीति आजकल व्यापार हो गयी है। धान कमाना और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीकर मौज लेना आज के राजनीतिज्ञांे का जीवन दर्शन बन गया है। इसलिए राजनीति के व्यापारीकरण के इस युग में आदर्शों की बात करना उसी प्रकार बेमानी हो गयी है जिस प्रकार Qैशन के दौर में किसी जूते चप्पल के खूब देर तक चलने की गारण्टी की बात करना बेमानी हो गई है। इस प्रकार राजनीति भी आदर्शों के सिंहासन से उतरकर जूते, चप्पल चलाने वालों की जमात ही बनकर रह गयी है।

राजनीति आज प्रतिबद्ध है किन्हीं विशेष उद्देश्यांे, परिवारांे, व्यक्तियांे और संगठनांे के प्रति। कांग्रेसी यदि देश में छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसे अपने उद्देश्यांे के प्रति समर्पित हैं और नेहरू गांधाी परिवार का कोई व्यक्ति उन्हंे Åर्जान्वित करता हैं तो यही स्थिति भारत के लगभग हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल की बनी हुई है। ये लोग देश से पहले दल के प्रति समर्पित रहने के लिए संकल्पबद्ध रहते हैं। ये ही इनकी सबसे बड़ी प्रतिबद्धता है। संस्कार हमें प्रतिबद्धता नहीं सम्बद्धता सिखाता है। उसकी मांग रहती है कि राष्ट्रहित के लिए सार्वजनिक जीवन में उतरो, अपना पहला जीवनादर्श जनहित को बनाओ और तदनुरूप कार्य करो। राजनीति का भी पहला आदर्श यही है। इस प्रकार राजनीति और संस्कार दोनों एक ही आदर्श को लेकर चलते हैं। इस आदर्श का राजनीति के साथ परिमार्जित स्वरूप राजधार्म है। यहां राजनीति और संस्कार एकरूप हो जाते हैं। दोनांे का अस्तित्व स्थूल रूप में मिट जाता है और सूक्ष्म रूप में दोनांे एकाकार होकर लोकहित की साधाना में रत हो जाते हैं। लोकहित की साधाना में रत कोई भी राजनीतिज्ञ राजधार्म के अपने कार्य संपादन को जब भली प्रकार निर्वाह करता है तो वह भी राजनीतिज्ञ न रहकर राजनेता हो जाता है। देश के पहले दल राजनीति की विकृति है। देश और दल दोनांे साथ-साथ राजनीति की प्रकृति है और दल से पहले देश राजनीति की संस्कृति है। भारत की स्वाधाीनता के उपरांत के इतिहास का यदि हम अवलोकन करें तो ज्ञात होता है कि हम राजनीति की विकृति में ही अधिाक Qंसे पड़े रहे, कभी-कभी किन्हीं विशिष्ट क्षणांे या अवसरांे पर लगा कि देश और दल दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। जबकि दल से पहले देश की स्थिति तो कभी आयी ही नहीं। राजनीतिक दल दम घोंटने का माध्यम है ‘ः ये राजनीतिक दल दम घोंटने का माध्यम हैं। निकम्मे और प्रमादी लोग जब किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति की पूंछ पकड़ कर सांसद या विधायक बन जाते हैं तो उनकी अंतरात्मा मर जाती है। पूंछ पकड़ कर जन प्रतिनिधि बने लोग राजनीति में पूंछ हिलाने की संस्कृति को फैलाते हैं। पूंछ हिलाने की यह संस्कृति ही राजनीतिक लोगांे को किसी दल या व्यक्ति के प्रति उन्हंे प्रतिबद्ध करती है। यह प्रतिबद्धता राजनीति का प्रतिकार ;संस्कार की विपरीत व्यवस्थाद्ध है। इस प्रतिकार की मानसिकता ने राजनीति को वैश्या तक कहलवाया है। क्यांेकि ऐसे निकम्मे और प्रमादी प्रतिनिधि अवसरवादी होते हैं जो समय आते ही अपनी निष्ठा को अपने दल और व्यक्ति के प्रति तुरंत बदल डालते हैं। ऐसे जन प्रतिनिधि किसी दल या व्यक्ति की कठपुतलियां होती हैं। जो वैसे ही नाचती हैं, जैसे उन्हें नचाया जाता है। सारी राजनीति आज इसीलिए कठपुतलियांे का खेल बनकर रह गयी है। संस्कार विहीन राजनीति दिशाहीन हो जाती है। इस अव्यवस्था से यही सिद्ध होता है।

जनता को मूर्ख बनाते हैं ः राजनीति का राजधर्म बड़ी सोच के बड़े लोगांे के क्रियाकलापांे, जीवन व्यवहार, आचार विचार और कार्यशैली से बनता है। वहां भाषा, प्रांतः क्षेत्रा, जाति, सम्प्रदाय आदि सभी छोटी बातें गौण हो जाती हैं। व्यक्ति उन्हें किसी खास उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए पृष्ठभूमि में धकेल देता है। यदि कहीं से इन सारी छोटी बातांे को बनाये रखने की आवाज उठती है, या इनको लेकर कहीं उत्पात होता है तो वह उस आवाज को राष्ट्रहित में शांत करता है और अपने राष्ट्र के किसी सामूहिक उद्देश्य के प्रति देश की जनता को आंदोलित कर उस ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। उसका यह जीवनव्रत राष्ट्र का एक संस्कार बन जाता है। जिससे सारा राष्ट्र प्रेरित हो उठता है। स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी आदि हमारे राष्ट्रीय नेता हमें क्या बता रहे थे। यही कि भारत निर्माण के लिए संघर्ष करो, उठो, खड़े होवो और उद्देश्य की प्राप्ति तक संघर्ष करो। सारा राष्ट्र इनके संकल्प से इनके जीवन व्रत से इनके राष्ट्रीय संस्कार से प्रेरित हो उठा। भाषा, प्रांत, क्षेत्रा, जाति, सम्प्रदाय आदि सभी छोटी बातें तो उस समय भी थीं पर लोगांे ने कहा कि हम इनके लफड़े में नहीं पड़ते, क्यांेकि हमें आगे बढ़ना है। लोग कह सकते हैं कि गांधीजी के रहते सम्प्रदाय के आधार पर देश का विभाजन हुआ क्या यह छोटी सोच का परिणाम नहीं था? हम भी मानते हैं कि गांधी जी के रहते देश का बंटवारा हुआ और यह लोगांे की छोटी सोच का परिणाम ही था परंतु यहां पर यह भी दृष्टव्य है कि यह विभाजन गांधी जी की विचारधारा का परिणाम नहीं था, अपितु उनकी नीतियांे का परिणाम था। छोटी सोच उन लोगांे की थी जो विभाजन में ही अपना हित निहित मानते थे। अस्तु।

लोगांे को आगे बढ़ाना ही राजनीति का उद्देश्य है। राजनीति मील का पत्थर है जो देश के निवासियांे को उनके जीवनोद्देश्य की मंजिल की सही सही दूरी इंगित करती है। राजनीति जाति, भाषा, क्षेत्रा, सम्प्रदाय आदि के चैराहांे पर दिग्भ्रमित हुए जन समुदाय को तीर का निशान बताकर पुनः सबको सही मार्गदर्शन कराने का उचित मंच है। मील का पत्थर बन जाना और तीर का निशान बनकर सबका मार्गदर्शन करना राजनीति का संस्कार है। राजनीति के इसी संस्कार को हम सभी नागरिकों के मध्य समानता का व्यवहार कहकर पुकारते हैं। व्यवहार में हमारे राजनीतिज्ञ हमें मूर्ख बनाते हैं। जनता को सामूहिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयांे, मुद्दों और बिंदुआंे पर एकमत करने के स्थान पर हमें जाति, सम्प्रदाय, भाषा, प्रांत आदि को लेकर लड़ना, झगड़ना सिखाते हैं।

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